घोटालों की जांच पर राजनीति

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भ्रष्‍टाचार और भ्रष्‍टाचारियों से मुक्‍त‍ि के लिए उठाने पड़ेंगे जरूरी सख्त कदम


जी के चक्रवर्ती
काग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार पूर्व केंद्रीय वित्त एवं गृहमंत्री पी चिदंबरम भ्रष्टाचार के आरोपों से उसी वक्त घिर चुके थे, जब केंद्र सत्ता पर काबिज भाजपा के मोदी सरकार का कार्यकाल अपने प्रथम चरण के दौर से गुजर रहा था। अचानक उनकी मुश्किलें उस समय और अधिक बढ़ गई जब शीना वोरा हत्याकांड में आरोपित इंद्राणी मुखर्जी आइएनएक्स मीडिया मामले में सरकारी गवाह बन गईं। यदि हम जांच एजेंसियों की मानें तो 2007 में जब चिदंबरम वित्त मंत्री थे तब उन्होंने पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी की कंपनी आइएनएक्स मीडिया में विदेशी निवेश की अनुचित मंजूरी विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड से दिलवाया गया।
विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड की आड़ में चल रहे इस गोरखधंधे का खुलासा शायद कभी भी न हो पाता यदि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के सिलसिले में एयरसेल मैक्सिस डील की जांच करने की शुरूआत नहीं हुई होती। एयरसेल मैक्सिस डील में मनी लांड्रिंग की जांच पड़ताल कर रही ईडी की टीम का अचानक ध्यान मैक्सिस से जुड़ी कंपनियों से तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम से जुड़ी हुई कई कंपनियों में रुपयों के आने पर गया।
वहीं से रिश्वतखोरी की पर्ते दर पर्ते खुलते चले जाने के बाद जब इसकी गहराई से जांच की गई तो यह बात उभर कर आया कि एफआइपीबी क्लीयरेंस की आड़ में जमकर रिश्वतखोरी के अनेकों मामलों पर से पर्दा उठते देर न लगी, आइएनएक्स मीडिया मामले में इंद्राणी मुखर्जी ने सरकारी गवाह बनने के बाद पूरे खेल का भंडाफोड़ कर दिया। उसी वक्त से पी चिदंबरम की गिरफ्तारी तय मानी जाने लगी थी।
एफआइपीबी क्लीयरेंस से जुड़ी 3500 फाइलों की पड़ताल:
ईडी के जांच अधिकारियों ने पाया कि निवेश संवर्धन बोर्ड ने एयरसेल मैक्सिस में महज 180 करोड़ रुपये के निवेश की अनुमति दी थी, लेकिन इसकी आड़ में मैक्सिस ने कुल 3500 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश किया था। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले और एयरसेल मैक्सिस डील की जांच कर रहे ईडी के एक जांच अधिकारी इसके बाद सतर्क होते रहते हुए उन्होंने एफआइपीबी से पी चिदंबरम के वित्तमंत्री रहने के समयावधि में दी गई सभी क्लीयरेंस से जुड़ी फाइलें तलब कर ली। एफआइपीबी क्लीयरेंस से जुड़ी लगभग तीन हजार पांच सौ फाइलों की जांच-पड़ताल के बाद कुल आठ मामलों में गड़बड़ी के पुख्ता सबूत उनके हाथ लगे।
सीबीआइ के इस जांच अधिकारी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक रिपोर्ट पेश की गई उसके बाद सीबीआइ को इन मामलों की जांच के लिए भेजा गया। इनमें से दो मामलों एयरसेल मैक्सिस डील और आइएनएक्स मीडिया में सीबीआइ ने एफआइआर दर्ज कर जांच शुरू की। छह अन्य मामले अब भी सीबीआइ के पास पड़े हुए हैं।
एयरसेल मैक्सिस मामले की जांच के दौरान यह पता चला कि मात्र 180 करोड़ का निवेश दिखाकर 3500 करोड़ रुपये का निवेश इसीलिए किया गया ताकि मामला निवेश से संबंधित कैबिनेट कमेटी के पास तक नहीं पहुंच पाये।
इस प्रकार चिदंबरम अपने पद का दुरुपयोग किया कियुंकि एफआइपीबी नियमों के अनुसार वित्तमंत्री को केवल 600 करोड़ रुपये तक का विदेश निवेश की मंजूरी देने का अधिकार था। इससे अधिक के विदेश निवेश पर कैबिनेट की मुहर लगना जरूरी था। जाहिर सी बात है कि 180 करोड़ का निवेश दिखाकर चिदंबरम ने खुद ही इसकी मंजूरी दे दी और जबकि चोर दरवाजे से 3500 करोड़ रुपए का निवेश आने दिया गया।
ईडी को मिले पुख्ता सबूतों के जांच के दौरान ईडी को मैक्सिस की सहयोगी कंपनियों से कार्ति चिदंबरम से जुड़ी कंपनियों में धन आने के पुख्ता सबूत भी मिले। मनी लांड्रिंग से बनाई गई कुछ संपत्तियों को ईडी ने जब्त भी कर लिया था। यही नहीं मनी लांड्रिंग एडजुकेटिंग ऑथरिटी ने इन संपत्तियों की जब्ती को सही ठहराते हुए ईडी के सबूतों पर अपनी मुहर लगा दी।
इंद्राणी मुखर्जी की कार्ति चिदंबरम से मुलाकात:
इसी तरह आइएनएक्स मीडिया मामले में भी केवल चार करोड़ रुपये की निवेश की एफआइपीबी क्लीयरेंस मिलने के बाद इंद्राणी मुखर्जी और पीटर मुखर्जी 305 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश ले आए। एफआइपीबी और आयकर विभाग के अधिकारियों ने इस तरह की गड़बडियों को पकड़ लिया और उस पर कार्रवाई शुरू भी कर दी गई लेकिन इस बीच इंद्राणी मुखर्जी ने कार्ति चिदंबरम के मार्फत पी चिदंबरम से दिल्ली के एक होटल ‘हयात’ रेजेंसी में मुलाकात भी की।
सरकारी गवाह बनी इंद्राणी मुखर्जी ने मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज अपने बयान में कहा था कि पी चिंदबरम ने उनसे कार्ति के संपर्क में रहने का निर्देश दिया था। इसके बाद से कार्ति चिदंबरम से जुड़ी कंपनियों में पैसे दिये गए और पी चिदंबरम ने आइएनएक्स मीडिया में एफआइपीबी क्लीयरेंस पर मुहर लगवा दिया। अपनी बेटी की हत्या के आरोप में मुंबई की जेल में बंद इंद्राणी मुखर्जी ने खुद इस मामले में सरकारी गवाह बनने की इच्छा जताई और अदालत ने इसे स्वीकार भी कर लिया था।
केंद्र में पूर्व वित्त मंत्री रह चुके पी चिदंबरम के साथ ही उनके बेटे कार्ति भी अनेक गंभीर आरोपों से घिरे हुए हैैं। दूसरी ओर पी चिदंबरम की धर्म पत्नी भी ‘शारदा’ घोटाले के शामिल होने के संदेह की जांच का सामना कर रही हैैं। पी चिदंबरम सीबीआइ एवं ईडी जैसे संस्थान की जांच में होने वाले गिरफ्तारी से बचने के लिए हर संभव कोशीशें लगातार करते रहे। इस परिपेक्ष्य में उन्हें रुक-रुक कर अग्रिम जमानत मिलती रही, लेकिन पिछले दिनों उनकी अग्रिम जमानत नामंजूर हो जाने के बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली और उन्हें सीबीआइ की गिरफ्त में जाना पड़ा।
सीबीआइ की पूछताछ से मुक्त हुए तो ईडी की पूछताछ का सामना करने के पहले उन्हें तिहाड़ जेल जाना पड़ा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें अग्रिम जमानत देने से मना करते हुए यह भी कहा कि आर्थिक अपराध के मामले में ऐसा करना सही नहीं होगा। संप्रग सरकार के सत्ताधिन रहने के दौरान पी चिदंबरम एक प्रभावशाली नेता माने जाते थे। वह वित्त मंत्री रहने के साथ ही गृह मंत्री भी रह चुके थे। उनका भ्रष्टाचार में इस तरह गिरफ्तार होना और जेल जाना न केवल उनके, बल्कि कांग्रेस के लिए भी अति शर्मनाक बात है।
पी चिदंबरम के अलावा कई अन्य कांग्रेसी नेता भी भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैैं। जहां एक ओर पी चिदंबरम तिहाड़ जेल में हैैं वहीं पर कर्नाटक के कांग्रेस के एक औरे बड़े नेता डीके शिवकुमार भी ईडी की गिरफ्त में आ चुके हैैं। एक अन्य मामले में अहमद पटेल के बेटे से और कमलनाथ के भांजे रतुल पूरीसे भी पूछताछ चल रही है। इसके अतिरिक्त स्वयं राहुल गांधी एवं सोनिया गांधी समाचार पत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ के मामले में जमानत पर चल रहे हैैं। जबकि कांग्रेस के प्रवक्ता इन सभी मामलों में हुई उनके नेताओं की गिरफ्तारी एवं पूछताछ के सिलसिले को बदले की राजनीति का दर्जा देने में लगे हुए है।
कांग्रेस के नेता आज वर्तमान समय में जिस तरह के भ्र्ष्टाचार के गंभीर आरोपों उनपर लगते रहे हैं ऐसे में वे चर्चा का विषय बनने से अपने आप को बचा रहे हैैं उससे सम्पूर्ण पार्टी भ्रष्टाचार में लिप्त रहने के सवालों पर बैकफुट पर खड़ी नजर आ रही है। शायद यही कारण है कि ज्वलंत मसलों पर उसकी बोलती बंद है। कांग्रेस इसकी अनदेखी नहीं कर सकती कि आज क्रोनी कैपिटलिज्म के जो तमाम आरोप सामने हैैं उनके पीछे संप्रग शासन का वह दौर है जब चिदंबरम वित्त मंत्री थे।
उसी दौरान बैैंकों ने संदिग्ध इरादों वाले कारोबारियों को अनाप-शनाप कर्ज भी दे डाला इन्हीं कारणों से बैैंकों का एनपीए दर बढ़ना शुरू हुआ और वर्तमान समय मे बढे हुए इस एनपीए का बुरा असर मौजूदा समय के अर्थव्यवस्था  पर दिख रहा है। यह किसी से भी छिपा नहीं कि संप्रग शासन के समय बैंकों ने अव्यावहारिक परियोजनाओं को मनमाने तरीके से कर्ज बांटे और कुछ मामलों में तो संकटग्रस्त कंपनियों को भी बार-बार नए कर्ज दिये जाते रहे हैं। इन सबके अलावा ऐसे लोगों को भी कर्ज बांटे गए जो उसे लौटाने का इरादा ही नहीं रखते थे।
पी चिदंबरम, डीके शिवकुमार आदि लोगों पर लगे आरोपों से मौजूदा समय मे कांग्रेस मुश्किल में पड़ी दिखाई दे रही है, लेकिन यदि जांच एजेंसियां इन नेताओं पर लगे आरोपों को साबित नहीं कर पाती है तो न केवल उनकी, बल्कि सरकार की भी किरकिरी होना तय सी बात है साथ ही कांग्रेस की बदले की राजनीति का आरोप लगाने वाली बात भी पुख्ता हो जाएगा। खैर जो भी हो, कांग्रेस को यह बात कभी नहीं भूलना चाहिए कि घपले-घोटाले और क्रोनी कैपिटलिज्म के तमाम मामले संप्रग शासन के दौर ही हुए हैैं। जिसमे  कुछ मामलों की जांच तो उसी वक़्त शुरू हो गई थी।
अभी ताजा तरीन जिस एयरसेल-मैक्सिस मामले में पी चिदंबरम फंसे हैैं उसे लेकर तो विवाद पहले ही उभर आया था। यदि देखा जाय तो संप्रग काल की इस तरह की अनेकों अनियमितताओं की जांच-पड़ताल के आधार यह नही कहा जा सकता है कि बदले की राजनीति हो रही है? बीते पांच सालों में न जाने कितने ऐसे घपले-घोटाले उजागर हुए हैैं जो संप्रग शासन के दौरान ही हुए हैं। शायद संप्रग काल के इन्हीं मामलों के कारण कुछ समय पहले राहुल गांधी राफेल सौदे को उछालकर प्रधानमंत्री को चोर तक कहने का आरोप लगते रहे। अब वह शांत हैैं तो इसीलिए कि उनके द्वरा लगये जा रहे आरोपों में कोई सच्चाई ही नहीं थी। इसके ठीक विपरीत संप्रग शासन के दरमियान शायद ही कोई ऐसा शीर्ष भाजपाई नेता रहा हो जिस पर भ्रष्टाचार के इस तरह के आरोप लगे हों।
हमारे भारत में राजनीतिक में भ्रष्टाचार और भरस्टाचारी कोई नया विषय वस्तु नहीं है, लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि भ्रष्टाचार के आरोपों को अदालत में साबित कर पाना बहुत ही मुश्किल भरा काम होता है। यदि हम यह कहे कि नेताओं के मामले में यह और भी ज्यादा मुश्किल भरा है तो कुछ अतिशयोक्ति नही होगी। इसके उदाहरण स्वरूप यदि हम लालू प्रसाद यादव एवं ओम प्रकाश चौटाला के अतिरिक्त कुछ चंद ही नेता और हैैं जिन पर भ्रष्टाचार के आरोपों को अदालतों में साबित किए जा सका हैैं। जबकि हमारी जांच एजेंसियां राजनीतिक भ्रष्टाचाररियों  के भ्रष्टाचार की तह तक जाने एवं दोषी नेताओं को सजा दिलाने के मामलों में ज्यादातर नाकाम रही हैैं। इसके उद्धरण स्वरूप एक और मामले में देखा जाए तो जिस 2जी घोटाले के कारण मनमोहन सरकार बुरी तरह बदनाम हुई थी उसमें किसी को भी सजा नहीं हुई।
सीबीआइ की विशेष अदालत ने इस मामले में आरोपित ए राजा, कनीमोझी और अन्य कई लोगों को साफ बरी भी कर दिया है। यह जरूर है कि ऐसे फैसलों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है, लेकिन अभी तक उसमे सुनवाई तक नहीं हो सकी है।
आम तौर पर राजनीति में भ्रष्टाचार चुनावी कारणों में किया जाता रहा है। इसके अलावा अपने परिजनों एवं अपनी जिंदगी में शानो-शौकत भरा जीवन यापन करने के लिए भी भ्रष्ट तौर-तरीकों का प्रयोग हमेशा होता रहा है। यही पी चिदंबरम को लेकर जांच एजेंसियां जो दावा कर रही हैैैं उनकी मानें तो उन्होंने एवं उनके बेटे ने बहुत बड़ी धन राशि विदेश में संपत्ति खरीदने में खर्च किया है। अगर इस तरह का दावा सही निकला तो यह बहुत गंभीर बात एवं शर्म का विषय है।
आज भारतीय समाज को वर्तमान समय तक पहुंचते-पहुँचते जिस तरह से पंचायत से लेकर लोकसभा के चुनावों तक जिस तरह पैसे के दम पर लड़े जाते हैं वह हम किसी से छिपा नहीं है। यह भी जगजाहिर सी बात है कि देश मे होने वाले चुनावों में पैसा खर्च करने की जो सीमा मानदंड तैयार की गई है उसका भरपूर उल्लंघन होता है। यह सीमा बढ़ाने की बात तो होती है, लेकिन कोई ठोस मांग का रूप नहीं ले पा रही तो शायद इसीलिए कि नेताओं को लगता है कि कहीं देश के गरीबों को यह संदेश न जाए कि राजनीति में बहुत पैसा है। यदि हमें राजनीतिक भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों से मुक्ति पानी है तो चुनाव में खर्च होने वाले एवं एकत्रित किये जाने वाले धन के खर्चों में पारदर्शिता लाना पड़ेगा तभी हम अपने देश और देश वासियों के प्रति सच्ची विश्वसनीयता कायम करने के अतिरिक्त देश वासियों की सच्ची सेवा कर पाएंगे।
– यह लेखक के अपने खोजपरक विचार हैं

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