डॉ दिलीप अग्निहोत्री
भारत कभी विश्व गुरु हुआ करता था। यह प्रतिष्ठा यहाँ शिक्षा और ज्ञान के प्रसार के कारण मिली थी। तब यहां के वन, पर्वत, नदियों के तट ही अनुसंधान के केंद्र थे। शोध और जिज्ञाषा से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं था। यहाँ के समृद्ध पुस्तकालयों में जब आक्रांताओं ने आग लगाई थी, तब वह कई महीने तक जलती रही थी। किसी राष्ट्र की गणना में ढाई सौ वर्षों का कोई महत्व नहीं होता। करीब इतने ही वर्ष पहले अंग्रेजों द्वारा बनाई गई एक समिति की रिपोर्ट हकीकत को सामने लाने वाली थी। इसमें बताया गया था कि भारत के करीब सभी गांव पूर्णतया शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वावलंबी है। इसका मतलब था कि यहां शिक्षा पर किसी वर्ग विशेष का एकाधिकार नहीं था। इसी व्यवथा पर ब्रिटिश शासन ने कुठाराघात किया था। कुटीर उद्योग नष्ट किये गए। जिससे ब्रिटेन में निर्मित सामानों की यहाँ खपत हो सके।भारतीय शिक्षा प्रणाली को नष्ट किया गया, जिससे मानसिक रूप से गुलाम बनाने वाली ब्रिटिश शिक्षा की यहाँ स्थापित किया जाए। इस तरह शिक्षा का क्षेत्र बहुत सीमित हो गया। यह शिक्षा केवल बाबू बनाने वाली थी। उस दौर में भी अनेक भारतीय महापुरुषों व शासकों ने भारतीय शिक्षा के प्रचार प्रसार का कार्य किया। क्षत्रपति शाह जी ऐसे ही लोगों में शामिल थे। उनकी जयंती पर लखनऊ में समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें राज्यपाल राम नाईक मुख्य अतिथि थे। वह अठ्ठाइस विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति है। राज्यपाल और कुलाधिपति के रूप में कार्यभार ग्रहण करने के बाद से ही वह उच्च शिक्षा के सुधार को वरीयता दी। उसके पहले यहां उच्च शिक्षा की स्थिति ठीक नहीं थी। आब प्रदेश की उच्चशिक्षा पटरी पर आ गई है।

राम नाईक ने आज छत्रपति शाहूजी महाराज जयंती के अवसर पर किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में छत्रपति शाहूजी महाराज स्मृति मंच द्वारा आयोजित कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। कार्यक्रम में प्रदेश के श्रम एवं सेवायोजन मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के कुलपति एमएलबी भट्ट, संस्था के अध्यक्ष रामचन्द्र पटेल, प्रो एस एनशंखवार, पद्मश्री प्रो एस एन कुरील सहित अन्य विशिष्टजन उपस्थित थे।
इस अवसर पर राम नाईक की जागरूकता और प्रत्येक विषय पर सही दृष्टि से विचार करने की विशेषता भी दिखाई दी। उन्होंने कहा भी की पहले उत्तर प्रदेश में छत्रपति शाहूजी महाराज का जन्म दिवस छब्बीस जुलाई को मनाया जाता था। जबकि महाराष्ट्र में छब्बीस जून को उनका जन्म दिवस मनाया जाता है। इस संबन्ध में राम नाईक ने भी एक निर्णय पर पहुंचने के प्रयास की पहल की, उसमें योगदान दिया। छत्रपति शाहूजी महाराज की जयंती के संबंध में मतभेदों के चलते महाराष्ट्र सरकार ने विशेषज्ञों की एक समिति बनाई। जिसने शोध के बाद स्पष्ट किया था कि छब्बीस जून को ही छत्रपति शाहूजी महाराज की प्रमाणिक जन्मतिथि है। इस संबंध में राम नाईक ने ही एक पत्र महाराष्ट्र सरकार को भेजकर प्रमाणिक तिथि बताने का अनुरोध किया था। जिस पर महाराष्ट्र सरकार ने ऐतिहासिक रूप से प्रमाणिक तिथि छब्बीस जून को ही छत्रपति शाहूजी महाराज का जन्म दिवस होने की पुष्टि की। तब से उत्तर प्रदेश में भी छब्बीस जून को ही छत्रपति शाहूजी महाराज की जयंती मनायी जा रही है। राम नाईक ने कहा कि छत्रपति शाहूजी महाराज के दिखाये मार्ग पर चलने का संकल्प लेना चाहिए।
छत्रपति शाहूजी महाराज कोल्हापुर से संबंधित हैं। राम नाईक भी मूलतः यहीं के है। छत्रपति शाहूजी महाराज ने शिक्षा, महिला उत्थान तथा शिक्षा के प्रकाश को घर घर पहुँचाने के लिए राज्य के खजाने खोल दिये थे। शाहूजी महाराज पहले राजा थे जिन्होंने उन्नीस सौ दो में सामाजिक समरसता एवं बराबरी देने के लिए आरक्षण की घोषणा की थी। जिसके फलस्वरूप कोल्हापुर ने सर्वाधिक शिक्षित क्षेत्र के रूप में पहचान बनाई थी। छत्रपति शाहूजी ने डाॅ आंबेडकर की प्रतिभा को पहचान कर उन्हें विदेश में शिक्षा ग्रहण करने में सहयोग किया। डाॅ आंबेडकर ने स्वतंत्रता के पश्चात् संविधान का निर्माण किया।
छत्रपति शाहूजी महाराज द्वारा किये गये कार्यों के दृष्टिगत सौ वर्ष पूर्व उन्नीस सौ उन्नीस में कानपुर में कुर्मी समाज का महाधिवेशन मेें उन्हें राजर्षि की उपाधि प्रदान की गयी थी। राज्यपाल ने कहा कि महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश का संबंध काफी पुराना है। प्रभु राम का जन्म अयोध्या में हुआ था पर वनवास के समय वे नासिक में रहे। हिन्दवी साम्राज्य की स्थापना करने वाले शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक काशी के विद्धान गागा भट्ट ने किया था। अठारह सौ सत्तावन के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को अंग्रेजों ने बगावत कहा था परन्तु स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने इसे प्रथम स्वतंत्रता समर बताया।
राज्यपाल ने अपने कार्यकाल की चर्चा करते हुए कहा कि वर्ष दो हजार चौदह में उन्होंने राज्यपाल पद की शपथ ली थी तब राजभवन के दरवाजे सभी लोगों के लिये खुले होने की बात कही थी। राज्यपाल ने बताया कि अब तक वे बत्तीस हजार लोगों से समय देकर मुलाकात कर चुके हैं। राज्यपाल के रूप में किये गये कार्यों से उन्हें बहुत समाधान है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के उन्नीस सौ सोलह में लखनऊ कांग्रेस के अधिवेशन दिये अजर-अमर उद्घोष ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा’ के एक सौ एक वर्ष पूर्ण होने पर उनके सुझाव पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र राज्य के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का अनुबंध हुआ। सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अनुबंध के तहत उत्तर प्रदेश में गीत रामायण के वाराणसी, आगरा, मेरठ एवं लखनऊ में आयोजन हुए। राज्यपाल ने कहा कि कुलाधिपति के रूप में उन्हें यह बताते हुये प्रसन्नता है कि सभी विश्वविद्यालयों के दीक्षान्त समारोह समय से सम्पन्न हो रहे हैं। कुलाधिपति राम नाईक के प्रयासों से उच्च शिक्षा के प्रति जागरूकता का माहौल बना है।
शैक्षिक सत्र दो हजार सत्रह अठारह में हुये दीक्षान्त समारोह में पन्द्रह लाख साठ हजार छात्र छात्राओं को उपाधियाँ प्रदान की गई हैं। जिसमें इक्यावन प्रतिशत छात्राएं थी। परन्तु परन्तु नकल रोकने हेतु की गयी सख्ती के कारण शैक्षिक सत्र दो हजार उन्नीस बीस में बारह लाख उन्यासी हजार विद्यार्थी ही परीक्षा में सम्मिलित हुये। इसमें छात्राओं का प्रतिशत छप्पन हो गया था। राज्यपाल ने कार्यक्रम में उत्कृष्ट कार्य करने वाले लोगों को सम्मानित भी किया। उन्होंने संस्था द्वारा पुस्तकालय स्थापित करने पर उनके पास छत्रपति शाहूजी से संबंधित ग्रंथ एवं पुस्तकों को दान देने का ऐलान किया।







