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    Home»इंडिया»Mumbai

    रामलाल: बांसुरी के जादूगर जिन्हें बॉलीवुड ने कभी पूरा न्याय नहीं दिया

    ShagunBy ShagunJuly 4, 2026 Mumbai No Comments3 Mins Read
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    Ramlal: The flute wizard to whom Bollywood never truly did justice
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    बनारस से मुंबई तक का सफर

    मुंबई : रामलाल चौधरी बनारस के एक संगीतप्रेमी परिवार से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने बड़े भाई से संगीत की शिक्षा ली और बांसुरी व शहनाई पर महारत हासिल की। एक दिन जब संगीतकार राम गांगुली के भाई बनारस आए, तो रामलाल उनसे मिले। राम गांगुली ने उनकी शहनाई सुनी तो मुंबई बुला लिया।

    पृथ्वी थिएटर में उन्हें मात्र अस्सी रुपए महीने की सैलरी पर नौकरी मिली। नाटकों के दौरान बांसुरी और शहनाई बजाना उनका काम था। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी।

    ‘आग’ फिल्म और पहली बड़ी पहचान

    जब राज कपूर ने फिल्म आग बनाई, तो राम गांगुली संगीतकार थे। रामलाल जी ने इसमें बांसुरी और शहनाई दोनों वादन किए। मुकेश के गाए गीत “जिंदा हूं इस तरह” में उनकी बांसुरी और शमशाद बेगम वाले गीत में शहनाई सुनकर फिल्म इंडस्ट्री में उनकी चर्चा हो गई। वी. शांताराम और वसंत देसाई जैसे दिग्गजों को उनका वादन बेहद पसंद आया।

    Ramlal: The flute wizard to whom Bollywood never truly did justice

    वी. शांताराम का ऑफर और राजकमल कला मंदिर

    एक दिन वी. शांताराम ने रामलाल जी को बुलाया। पूछा, “पृथ्वीराज कपूर तुम्हें कितना वेतन देते हैं?” रामलाल जी ने बताया कि डेढ़ सौ रुपए। शांताराम जी तुरंत बोले, “मैं तुम्हें दो सौ रुपए दूंगा। मेरे साथ काम करो।”

    रामलाल जी ने पृथ्वी थिएटर छोड़ दिया और राजकमल कला मंदिर जॉइन कर लिया। उनकी पहली फिल्म दहेज (1950) रही, जिसमें वसंत देसाई संगीतकार थे। इसके बाद वी. शांताराम की लगभग हर फिल्म में रामलाल जी का योगदान रहा।

    इंडिपेंडेंट संगीतकार बनने की जद्दोजहद

    वी. शांताराम के साथ काम करते हुए रामलाल जी अन्य प्रोडक्शन हाउसेस के लिए भी बांसुरी-शहनाई बजाते रहे। फिर उन्होंने स्वतंत्र संगीत निर्देशक बनने की कोशिश शुरू की।

    पी.एल. संतोषी की फिल्म तांगावाला (राज कपूर-वैयजयंतीमाला) उनकी पहली बड़ी कोशिश थी। कुछ गीत रिकॉर्ड भी हो गए, लेकिन फिल्म अधूरी रह गई। उन गीतों को रामलाल जी ने बाद में 1956 में आई फिल्म हुस्न बानो में इस्तेमाल किया, जिसके वे खुद संगीतकार थे।

    उन्होंने माया मछिन्द्र जैसी छोटी फिल्मों में भी संगीत दिया। दिलचस्प बात यह कि इसी फिल्म में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल उनके असिस्टेंट थे।

    वह ऐतिहासिक मुलाकात और शांताराम का टेस्ट

    एक दिन रामलाल जी को पता चला कि शांताराम बापू नई फिल्म बना रहे हैं और शंकर-जयकिशन से संपर्क कर रहे हैं। यह सुनकर वे सीधे शांताराम जी से मिलने पहुंच गए और बोले, “इस फिल्म का संगीत मुझे दीजिए।”

    शांताराम जी ने कहा: “देखो रामलाल, फिल्मों में तो काम कोई और करता है व नाम किसी और का होता है। मुझे तो तुम सामने बैठकर कुछ सुनाओ। तब मुझे पता चले तुम्हारी प्रतिभा के बारे में।”

    अगले दिन सुबह 9 बजे टेस्ट सेशन रखा गया। शांताराम जी ने स्थिति बताई, गाना समझाया और रामलाल जी ने पूरा जादू दिखा दिया।

    बड़ी सफलता: ‘सहरा’ और ‘गीत गाया पत्थरों ने’

    रामलाल जी का टेस्ट पास हो गया। फिल्म थी सहरा (1963)। लता मंगेशकर की आवाज में गीत “पंख होते तो उड़ आती रे” आज भी लोगों के दिलों में बसा है। इसके बाद उन्होंने वी. शांताराम की फिल्म गीत गाया पत्थरों ने का भी संगीत दिया, जिसके गीत आज भी क्लासिक माने जाते हैं।

    एक प्रतिभा जो गुमनाम रह गई

    19 साल पहले, 4 जुलाई 2007 को रामलाल जी इस दुनिया से चले गए। वे उन गुमनाम हीरोज में से एक हैं जिन्होंने बॉलीवुड को खूबसूरत संगीत दिया, लेकिन नाम के साथ न्याय नहीं मिला।

    रामलाल जी की कहानी सिर्फ एक संगीतकार की नहीं, बल्कि मेहनत, धैर्य और प्रतिभा की कहानी है। आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें शत-शत नमन।

    अब आपको उनकी कौन सी रचना सबसे ज्यादा पसंद है? कमेंट में जरूर बताएं।

    Shagun

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