सबरी

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सबरी जैसी जोहती
राम तुम्हारी राह।
है अभाव तो क्या हुआ
सजा है वन्दनवार।।
बेर सहेजे बैठी है
आंखें हैं बेहाल।
कृपा करो एक बार जो
स्वागत व सत्कार।।
– दिलीप अग्निहोत्री

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