Share Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp Post Views: 624 कारे कारे बादरा, उमड़-घुमड़ रह जाएं। गरजे पर बरसे नहीं, नाहक जिया जरायें।। नाहक जिया जरायें, बादरा मानसून के, सांसत में है जान, ना आए पल सुकून के, नेताओं की तरह, तुम्हारे लक्षन सारे। हाथी के दांत बादरा कारे कारे।। -सीएम त्रिपाठी
‘पुस्तकें मन को एकाग्र कर परंपराओं से जोड़ती हैं’-ब्रजेश पाठक; ईशा-मीशा रतन की कथक प्रस्तुति ने मोहा मन
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Lovely sentiments.