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    Home»ब्लॉग

    संवेदना और समाज का नीरज काव्य

    By July 22, 2018 ब्लॉग 2 Comments7 Mins Read
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    Post Views: 836
    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    हृदय तक पहुंचने वाले काव्य की रचना में गोपाल दास नीरज को महारथ हासिल थी। काव्यपाठ की नायाब शैली भी चार -चांद लगाने वाली थी। कानपुर डीएवी में बतौर शिक्षक मैंने दो महान विभूतियों की खूब चर्चा सुनी थी। दोनों इस महाविद्यालय से कुछ समय तक जुड़े थे, दोनों को अलग अलग क्षेत्रों में खूब ख्याति मिली,दोनों परस्पर मित्र थे, दोनों की वाणी पर सरस्वती की विशेष कृपा रही, इन दोनों को सुनकर लोग मंत्रमुग्ध होते थे, लोगों को बांधे रहने की इनमें जबरदस्त क्षमता थी। ये थे राजनीति के अजातशत्रु अटल बिहारी वाजपेयी और कवि सम्मेलनों राजकुंवर गोपाल दास नीरज।
    अटल जी जब बोलते थे तब उनके वीरोधी भी ध्यान से सुनते थे। नीरज को कवि सम्मेलनों में प्रायः देर रात में काव्यपाठ के लिए बुलाया जाता था। लोग उनको सुनने के लिए जागते रहते थे,रुके रहते थे। उन्नीस सौ पैंतालीस छियालीस में अटल बिहारी वाजपेयी वाजपेयी डीएवी से राजनीति शास्त्र एमए कर रहे थे। गोपाल दास इस महाविद्यालय के कार्यालय में कार्यरत थे। अटल  और नीरज दोनों कविता लिखते थे। इनकी उम्र भी बराबर की थी। इसी कारण इनकी मित्रता भी थी। दोनों अक्सर साइकिल से घूमने जाते थे। कभी पैसा हुआ ,तो तांगे का लुफ्त भी उठा लेते थे। जो लिखते थे, एक दूसरे को सुनते थे।
    गोपाल दास जन्मजात कवि ही थे। बचपन इतनी गरीबी और संघर्ष में बिता की लिखने का मौका नहीं मिला। लेकिन इसी ने उन्हें संवेदनशील बना दिया। इसी संवेदी ह्रदय से कविता प्रस्फुटित होने लगी। डीएवी कार्यालय में कार्य करते समय अक्सर जब उनके मन में कोई कविता जन्म लेती थी ,तो वह तत्काल उस फाइल के एक कोने में लिख लेते थे। इसके लिए उन्हें प्रिंसिपल की डांट भी सुनने को मिलती थी। प्रिंसिपल को क्या पता था जिसे वह कविता लिखने से मना कर रहे है, वह एक दिन महान कवि के रूप में प्रसिद्ध होगा। कुछ समय बाद ही नीरज ने यह नौकरी छोड़ दी थी।
    ये सब बात डीएवी कानपुर में सुनने को मिलती थी। बाद में एक बार अखिल भारतीय कवि सम्मेलन के कवरेज का अवसर मिला। इसके कई वर्षो बाद लखनऊ में उनका साक्षात्कार लेने का सौभग्य हासिल हुआ। कानपुर डीएवी में सुनी गई सभी बातों की ताकीद हो गई। अपने सबसे प्रसिद्ध गीत -करवा गुजर गया गुबार देखते रहे कि रचना उन्होंने उसी दौर में कई थी। इसके बाद नीरज जिस भी कवि सम्मेलन में जाते थे,इसी गीत की फरमाइश होती थी।
    स्वप्न झरे फूल से,
    मीत चुभे शूल से,
    लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
    और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
    कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
    नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
    पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
    पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
    चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
    गीत अश्क़ बन गए,
    छंद हो दफ़न गए,
    साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
    और हम झुके-झुके,
    मोड़ पर रुके-रुके
    उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
    कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।
    डीएवी कालेज में एक कार्यक्रम के दौरान अटल जी की कविता नीरज ने सुनी ,इसी के बाद दोनों दोस्त बन गए। ग्वालियर के कवि सम्मेलन में दोनों के जाने का मजेदार प्रकरण भी यहां सभी जानते थे। ट्रेन ग्वालियर इतने बिलंब से पहुँची की कवि सम्मलेन ख़त्म हो चुका था। वापस लौटने के लिए भी पैसे नही थे।
     पैदल जा रहे थे, रास्ते में कवि सम्मेलन के आयोजक मिल गए।  उन्होंने इनके रुकने का प्रबंध किया और अगले दिन एक कवि सम्मलेन में काव्य पाठ आमंत्रण दिया। यहां प्राप्त पारिश्रमिक से कानपुर लौटने का इंतजाम हुआ।कवि सम्मेलनों में अब के सावन में, इतने बदनाम हुए, जैसे अनेक गीत पढ़ना नीरज जी को पढ़ना अच्छा लगता था। इसी के साथ श्रोता भी इन्हें सुनकर मंत्रमुग्ध होते थे।
    अब के सावन में ये शरारत मेरे साथ हुई
    मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई
    आप मत पूछिए क्या हम पे सफ़र में गुज़री
    था लुटेरों का जहाँ गाँव, वहीं रात हुई।
    नीरज जी का स्वास्थ जब तक बढ़िया रहा वह ,ऐसे गीतों को तरजीह देते थे जिसमें श्वास को देर तक खींचना उनकी शैली में शामिल था। जब स्वास्थ कमजोर हुआ तब ,अब न वो दर्द जैसी कविता को पढ़ना ज्यादा सुगम था-
    अब न वो दर्द, न वो दिल, न वो दीवाने हैं
    अब न वो साज, न वो सोज, न वो गाने हैं
    साकी! अब भी यहां तू किसके लिए बैठा है
    अब न वो जाम, न वो मय, न वो पैमाने हैं।
    इन लाइनों में कतिपय बदलावों को लेकर उनकी व्यथा भी देखी जा सकती है। बहुत उच्च स्तरीय कवि सम्मेलनों में उनकी उपस्थिति एक प्रकार से अनिवार्य मानी जाती थी। उनके रहने मात्र से मंच की गरिमा बढ़ती थी। फिर उन्होंने मंच से काव्य के नाम पर चुटकुलों का दौर भी देखा। समाज में भी मर्यादा का ह्रास देखा।
    नीरज की कविता में संवेदना है। कुछ जगहों पर निराशा का भाव भी झलक सकता है, लेकिन वह मुख्यरूप से जिंदादिल थे। काव्य के प्रति समर्पित। अंतिम समय तक गुनगुनाते रहने की इच्छाशक्ति। इसीलिए वह उत्साह की प्रेरणा भी देते है-
    छिप-छिप अश्रु बहाने वालो, मोती व्यर्थ बहाने वालो
    कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है–
    लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
    शिकन न आई पनघट पर,
    लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
    चहल-पहल वो ही है तट पर,
    तम की उमर बढ़ाने वालो! लौ की आयु घटाने वालो!
    लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।
    नीरज को केवल श्रृंगार रस का कवि मानना उनके प्रति न्याय नहीं होगा। वह बेहतर समाज बनाने की प्रेरणा भी देते है। जिसमें मानवता और एक दूसरे के सहयोग की भावना हो। वह ऐसा समाज चाहते थे ,जिसमें भेदभाव और नफरत न हो। इसीलिए वह लिखते है-
    अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए 
    जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए 
    जिस की ख़ुश्बू से महक जाए पड़ोसी का भी घर 
    फूल इस क़िस्म का हर सम्त खिलाया जाए 
    आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी 
    कोई बतलाए कहाँ जा के नहाया जाए 
    प्यार का ख़ून हुआ क्यूँ ये समझने के लिए 
    हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए 
    मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा 
    मैं रहूँ भूका तो तुझ से भी न खाया जाए 
    जिस्म दो हो के भी दिल एक हों अपने ऐसे 
    मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए 
    नीरज समाज में भी उजियारा चाहते थे। वह इसकी कामना भी करते है-
    है बहुत अँधियार अब सूरज निकलना चाहिए 
    जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए
    नीरज जब लिखते है कि अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई , तो कहीं न कहीं सामाजिक, आर्थिक विषमता की ओर भी उनका ध्यान रहता था। यही कारण है कि अंतिम पंक्तियों में वह लिखते है –
    मैं ने सोचा कि मिरे देश की हालत क्या है 
    एक क़ातिल से तभी मेरी मुलाक़ात हुई।
    नीरज ने हिंदी गजल लेखन का अभिनव प्रयोग किया। इसे वह गीतिका कहते थे। कवि सम्मेलनों में उनकी इन गीतकाओं को बहुत सराहना मिली। उनकी प्रेरणा से आने युवा साहित्यकारों ने गीतिका लिखी। नीरज जी उन्हें प्रोत्साहित करते थे। सच कहने का उनमें सामर्थ्य था। नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद कथित असहिष्णुता के विरोध में सम्मान वापसी अभियान चला था। नीरज ने खुल कर इसका विरोध किया था। वह सच्चे अर्थों में कवि थे। बंधनों में रहना उनके स्वभाव में नहीं था। इसलिए अनेक स्थानों पर जीवकोपार्जन हेतु नौकरी की , लेकिन मन नहीं जमा , छोड़ते रहे। मुम्बई गए, हिंदी सिनेमा को लोकप्रिय गीत दिए-
    आदमी हूं, आदमी से प्यार करता हूं, लिखे जो खत तुझे, शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब, आज मदहोश हुआ जाए रे , ऐ भाई! जरा देख के चलो, दिल आज शायर है, जीवन की बगिया महकेगी, मेघा छाए आधी रात, खिलते हैं गुल यहाँ, फ़ूलों के रंग से, रंगीला रे तेरे रंग में, देखती ही रहो आज तुम दरपन, राधा ने माला जपी श्याम की, आदि अनेक अमर गीतों की रचना की थी। फिल्मी गीतों में भी उन्होंने काव्य की मर्यादा कायम रखी। सत्तर के दशक में लगातार तीन वर्ष तक उन्हें फ़िल्म फेयर सम्मान से विभूषित किया गया। यदि मुम्बई में  रह जाते तो अनगिनत गीतों की रचना करते ,आर्थिक फायदा भी होता।  लेकिन बंधनों में न रहने की प्रवृति वापस ले आई। अंतिम बार वह जीवन के बंधन भी तोड़ गए।

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    2 Comments

    1. Neha mishra on July 23, 2018 9:31 am

      बहुत बेहतरीन आर्टिकल

      Reply
    2. minecraft on October 5, 2018 11:52 am

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