सखी री! कहाँ गया वह गाँव

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गीत: अरविन्द कुमार ‘साहू’

जहाँ लहकती थी हरियाली , जहाँ चहकती थी गौरैया ,
जिस डाली पर झूला डाले ,पींग बढ़ाती थी सब सखियाँ ,
कहाँ गये वो लोकगीत , वो नीम की ठंडी छांव ?
सखी री ! कहाँ गया वह गाँव ?
वो अल्हड़ सी हंसी – ठिठोली , वो फागुन के खुले कहकहे ,
वो पनघट की चुहलबाजियाँ , मेलों के दिन कहीं ना रहे
कहाँ बह गई घाट किनारे से सपनों की नाव ?
सखी री ! कहाँ गया वह गाँव ?
बिन माँगे ही आ जाती थी जहाँ दुआएं सब के हिस्से
कहाँ गये दादी के नुस्खे , कहाँ गये नानी के किस्से
नहीं छू रहे बच्चे क्यों बूढ़े बरगद के पाँव ?
सखी री ! कहाँ गया वह गाँव ?
पीपल की ऊंची चोटी पर गिद्ध कहीं भी नहीं दीखते
बड़े बुजुर्गों से अब बच्चे परम्पराएँ नहीं सीखते
मुँडेरों से कहाँ गई कौए की कर्कश कांव ?
सखी री ! कहाँ गया वह गाँव ?
नहीं रहे वो पंच कभी जो परमेश्वर जैसे होते थे
जुम्मन चाचा कहाँ गये जो अलगू के दुख मे रोते थे
हड़प रहे हिस्सा छोटकू का , बड़कू देकर दांव ?
सखी री ! कहाँ गया वह गाँव ?

  • मोबाइल: 9451268214

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