अगर मैं मोर होता तो कोई झंझट न होता!

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अंशुमाली रस्तोगी

काश! मैं मोर होता! मगर दुर्भाग्य से हो इंसान गया। मुझे इंसान नहीं होना था। इंसान होने में बड़ी कठिनाइयां हैं। पल-पल संघर्ष है। जीवन अपना न होके, गिरवी का सा लगता है। न दिन में चैन रहता है न रात सुकून से कटती है। बस यही डर लगा रहता है कि डर को मात कैसे दी जाए। इधर चार-पांच महीने से तो जिंदगी नरक टाइप हो ली है। कोरोना ने ऐसा लपेटा है कि लिपट-लिपटकर थक चुका हूं। ऐसा लगता है, जैसे अवसाद चौबीस घंटे खोपड़ी पर तारी है। अखबार उठाओ तो कोरोना। बाहर जाओ तो कोरोना। टीवी देखो तो कोरोना। अब तो सपने भी मुझे कोरोना मय आने लगे हैं।

अगर मैं मोर होता तो कोई झंझट मेरे सिर न होता। आराम से किसी नेता या प्रधानमंत्री के हाथों दाना चुग रहा होता। वहीं उन्हीं के पास चैन की जिंदगी की काट रहा होता। न कोरोना का भय रहता न खाने-कमाने की चिंता। अपने खूबसूरत पंख फैलाए यहां-वहां नाचता रहता। अखबारों और टीवी में मेरी खूबसूरती के चर्चे होते। सभी के हाथों हाथों-हाथ लिया जाता। पर हाय री मेरी फूटी किस्मत कि मैं मोर न हुआ!

ईश्वर ने मेरे संग अन्याय किया मुझे इंसान का जीवन देकर। अमां, ये जीवन भी कोई जीवन है। दिन-रात मजदूरों की तरह पिलते रहो। तरह-तरह की चिंताएं और अवसाद पाले रहो। न खुद खुश रहो, न किसी को रहने दो। लानत है, ऐसे जीवन पर। मुझे आज तक यह समझ न आया कि इंसानों ने इंसानी जीवन पाकर ऐसा क्या खास कर लिया? इंसानों में न इंसानियत बाकी रही न संवेदनशीलता। बस जिए जा रहे हैं क्योंकि जीना है।

मोर इंसानों से कहीं बेहतर हैं। हर चिंता से मुक्त हैं। बदल बरसने का संकेत नाचकर देते हैं। आजाद रहते हैं। कभी इस डाल तो कभी उस डाल पर उछल-कूद मचाते रहते हैं। खास बात, मोर को कैद कर नहीं रखा जा सकता। सुना है, सात साल की सजा है।

यों भी, किसी न किसी बहाने मोर चर्चा में रहते ही आए हैं। पिछले दिनों एक वकील साहब ने मोर के सेक्स को लेकर अजीब-सा बयान दे डाला था। कितने ही फिल्मी गीतों में मोर का जिक्र रहता है। मोर के ठाठ हैं। इधर मोर जब से प्रधानमंत्री के साथ देखा गया है, उसके भाव और भी बढ़ गए हैं। मोर पर कितना कुछ कहा व लिखा जा रहा है। जिन्हें कल तक मोर का ओर-छोर न मालूम था, वे मोर की प्रजातियां ढूंढ़ने में जुट गए हैं। मोर ने फिलहाल सबको ‘मोर’ बना रखा है। मामला दिल मांगे मोर तक आन पहुंचा है।

अगर आज मैं भी मोर होता तो मेरे भी उसी मोर जैसे ठाठ होते। मैं खुद के मोर न होने पर खासा उदास रहता हूं। कभी खुद को, कभी आत्मा को कोसता हूं। हालांकि यहां आत्मा का कोई रोल नहीं। पर कोसने में क्या जाता है। कम से कम दिल का बोझ तो हल्का हो जाता है।

क्यों न मैं एक काम करूं। इंसान बनकर मोर बनने का प्रयास करूं। इससे मेरी मोर बनने की इच्छा भी न मरेगी और मैं अवसाद में जाने से भी बच जाऊंगा। खुद के मोर होने को मैं अपने महसूसने में शामिल किए लेता हूं। महसूस करना बड़ी चीज है। हो सकता है, इससे मेरे इंसान होने का दुःस्वप्न कुछ समय के लिए मिट जाए।

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