उठो कि अब ये ख़ामोशी का शहर जलने को आया है!
तुम्हारे महल के आँगन में आफ़ताब ढलने को आया है!!
बहरे कानों के दरवाज़े अब खोल दो ऐ हुक्मरानों!
तख़्त के नीचे दबी चीख़ों का ज़लज़ला चलने को आया है!!
मन की बात बहुत हुई, अब जन की बात करो राजन्!
. . मन की बात बहुत हुई, अब जन की बात करो राजन् !!
तुम्हें गुरूर था कि जनता बेज़बान रहेगी सदा।
तुम्हारे झूठे वादों के साए में हैरान रहेगी सदा।।
मगर सुनो कि अब सब्र का प्याला छलक चुका है।
मज़लूमों के सीने में जलता अंगारा दहक चुका है।।
ज़ुल्म की हद नापो मत, ये पैमाना टूटने को है।
तुम्हारी सत्ता की नींद का हर ख़्वाब छूटने को है!!
जिद त्यागो, उठो चहुँ ओर निहारो, अपनी आँखें खोलो राजन्!
मन की बात बहुत हुई, अब जन की बात करो राजन्!!
अहंकार के सिंहासन से ज़रा नीचे उतरो राजन्!
जन आंसुओं के सैलाब को भी देखो राजन्!!
ग़ैरों को खूब लुटाने वाले, अपनों के अब हो लो राजन्!
मन की बात बहुत हुई, अब जन की बात करो राजन्!!
देश का भविष्य तो मांग रहा न्याय और छोटे-छोटे हक राजन् !
बदले में उन्हें मिल रही बेबसी, बर्बादी और जलालत राजन्!!
धर्म, मजहब, जातियों में यहां सब खूब लड़े, नफरत के शहर भी यहां खूब फले!
देवों से भी आगे बढ़, जन-जन में जयकारे भी खूब करा लिए राजन् !!
लेकिन नई पीढ़ी जाग रही राजन्, अब ये देश हित के सपने बुन रही राजन्!
अब कैसे चलेगा ज़हर और शहद का वो खेल पुराना राजन् !!
उठो, कि इससे पहले कोई देर हो न जाए राजन्!
मन की बात बहुत हुई, अब जन की बात करो राजन्!!
- राहुल कुमार







