ग़ज़ल:
जिसको सीने में जलना था,
आग, पेट में जलती वो
उनको मैं फ़रियाद सुनाऊँ, अपने बस की बात नहीं।
पत्थर से जा सिर टकराऊँ, अपने बस की बात नहीं।
नागफ़नी का संरक्षण हो, फूलों का उपहास जहाँ,
ऐसा मैं उद्यान सजाऊँ, अपने बस की बात नहीं।
सम्बन्धों को जीना है तो-गरल पचाना भी होगा,
बात -बात में गाल फुलाऊँ, अपने बस की बात नहीं।
जिनकी चर्चा भर-से, सारा कथ्य कलंकित हो, ऐसे –
सन्दर्भों को शीश झुकाऊँ, अपने बस की बात नहीं।
अवसर हो जब जन -जाग्रति का, अलसायी तरुणायी भी
मैं ऐसे में लोरी गाऊँ, अपने बस की बात नहीं ।
जिसको सीने में जलना था, आग! पेट में जलती वो-
यह उपलब्धि! और इतराऊँ, अपने बस की बात नहीं।
लॉकर में दिल जिनके बन्दी, करुणा जिनको छुई नहीं,
उनको अपनी ग़ज़ल सुनाऊँ, अपने बस की बात नहीं ।
भावुक, सन्नाटे में सरगम से







