दरकार खून की है सियासत की प्यास में।
अँधेरा बहुत है दिखावट के उजास में।।
हर आम परेशान है, सुनता नहीं कोई,
सिमटा हुआ है लोक-तन्त्र, सिर्फ़ खास में।।
हर ओर है फैला हुआ, बस झूठ का जंजाल,
दिखता नहीं है सच, कहीं भी आस-पास में।।
न प्राण-वायु और नहीं पानी और भात,
यह मुल्क़ मर रहा है ज़िन्दगी की आस में।।
मुद्दों में गाय-भैंस हैं और ताज-शिवालय,
सरकार अभी व्यस्त है बस रंग-रास में।।
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“काजू भुने पलेट में, व्हिस्की गिलास में,
उतरा है राम-राज विधायक निवास में।।
– स्व. अदम गोंडवी- 1947- 1912







