प्रतिकूल हवाएं

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होती हैं जब प्रतिकूल हवाएं
मुंह फेर लेते है अपने
 हो जाते है पराए।
भंवर में फंस जाती है नाव
मार्ग में आ जाती है चट्टान
बाधाओं का अंबार
बन्द होने लगते हैं वह द्वार
कभी होता था जहां सत्कार
अब विवश-लाचार
दम तोड़ने लगते है अरमान
दूर तक कोई नहीं
किसको पुकारें
व्यथित मन की बात भी
 किसको बताएं
होती है जब प्रतिकूल हवाएं।।
– दिलीप अग्निहोत्री
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