मंजिल

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चलते चलते थक गए
तन मन दोनों पाँव
व्याकुल होकर ढूंढ रहे
मिल जाये अब छांव।।
मंजिल का कुछ पता नहीं
होने को है शाम।
पथरीली यह राह है
 पल भर का विश्राम।।
अंधियारा है दूर तक
साथ दे रहा चांद।
झुरमुट तक बिखरी हुई
परछाई है साथ।।
– डॉ दिलीप अग्निहोत्री

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