के के अस्थाना
क्या हाल हैं धोती बहन ? बहुत दिन बाद दिखी” पाजामें ने अपने बगल में रस्सी पर लटकी धोती से पूछा। दोनों की आज बहुत दिनों बाद मुलाकात हुई थी। दोनों धोबी के यहाँ घुलने भेजे गये थे। ”क्या बताये पजामा भइया ! मेम साहब ने तो अब धोती पहनना ही छोड़ दिया है। सलवार सूट पहनने लगी हैं। अगले हफ्ते उनकी सासू माँ आने वाली हैं। सत्यनारायण की कथा है। उसमें मुझे पहनेगीं। इसलिये बक्से से ढूढ़ँ ढांढ़ कर निकाला है। इससे पहले पिछले साल निकला था, जब सुन्दर काण्ड कराया था। और तुम सुनाओ ! तुम तो साहब के साथ रोज शाम को रहते होगे।” उसने पाजामे का हाल चाल पूछा। ”अरे कहाँ धोती बहन! जब से तुम्हे बक्से में रखा गया उसके थोड़े दिन बाद ही मेरे दिन भी लद गये।
साहब ने पहले लोअर पहनना शुरू किया। फिर एक दिन मेम साहब बरमूडा ले आई। साहब ने एकाध दिन तो घर में संकोच से उसे पहना। बाहर जाते थे तो मुझे ही पहनना पसन्द करते थे। धीरे धीरे वह संकोच भी जाता रहा। मै खूंटी पर टंगा रहा। जब खूंटी पर टंगे टंगे बहुत दिन हो गये तो एक दिन मेम साहब ने मुझे भी बक्से के हवाले कर दिया।” पजामें ने अपनी व्यथा सुनाई। ”अच्छा! तुम्हारा भी वही हाल हुआ जो मेरा हुआ था?” धोती ने सहानुभूति जताई। ”हाँ धोती बहन! पिछली बार पुराने कपड़े बाँटने के लिये मेम साहब ने बक्से से कपड़े निकाले। पर मुझे यह कह वापस रख दिया कि होली दीवाली और पूजा पाठ में तो पजामा पहना ही जायेगा।
पता नहीं होली आने वाली है या दीवाली! अब तो बाहर की हवा साल में दो चार बार ही खाने को मिलती है।” पजामे ने ठण्ढी साँस ली। ”अरे धोती आण्टी! क्या कह रही हो? सिर्फ तुम्हे ही बक्से में नहीं रखा गया है। तुम्हारे बाद अब मैं भी बक्से में ही हूँ। कभी कभी मेम साहब का धोती पहनने का मन न हो और कोई बहुत औपचारिक पूजा कथा न हो तब मुझे बक्से से निकाला जाता है।” सूखने के लिये फैलाये जाने की रास्ता देख रही सलवार बड़ी देर से दोनों की बातें सुन रही थी। उसने चिल्लाकर अपना पक्ष रखा। ”तो फिर मेम साहब पहनती क्या हैं?” धोती को जिज्ञासा हुई। ”ऑफिस तो वेस्टर्न पहन कर जाती हैं। जींस और टॉप या कुर्ती। दावतों में ड्रेस पहनती हैं। मतलब फार्मल गाउन या कुछ ऐसा ही। और घर पे शार्ट््स या ढीला ढाला शरारा वगैरह। वैसे वह जो जो पहनती हैं उसके तो नाम मुझे तो क्या उन्हें तक नहीं पता हैं।
ना मालूम मॉल से क्या क्या ढीला ढाला झोल झाल जैसा उठा लाती हैं। और बड़े शौक से पहनती हैं।” सलवार सूट ने आखों देखा हाल सुनाया। ”तो घर में कामवाली आती है, वह तो सलवार पहनती ही होगी?” धोती ने आगे जानना चाहा। ”आण्टी, लगता है आपको बक्से में गये कुछ ज्यादा ही टाइम हो चुका है। अब तो घरों में काम वाली की लड़की भी जींस पहनने लगी है। मेरे पास में मोबाइल रखने की जेब जो नहीं होती।” सलवार ने अपना दुखड़ा सुनाया। पजामा बड़ी देर से आजकल के शहरी लोगों के कपड़ों के बारे में सुन रहा था। उसे अपना बचपन याद आ गया, जब उसके दादा जी की मोहरी बारह इंच हुआ करती थी। उसके ऊपर लोग कुर्ता या कमीज दोनों चीज पहना करते थे। उसके दादा जी का रंग तो सफेद था।
सम्भ्रान्त लोग उन्हें ही पसन्द करते थे। पर उसके कुछ रिश्तेदार पटरे वाले भी होते थे। वह गरीब लोगों के काम आते थे। उसके पैर छोटे करके घुटने तक कर दिये जाते थे तो वह अण्डर वियर बन जाता था। उसे तब प्यार से घुटन्ना कहा जाता था। हर अमीर-गरीब, गोरा-काला, मोटा-पतला, नाटा-लम्बा सब यही पहनते थे। पजामा भावुक हो गया।
”और पाजामा चाचा! आपको अण्डर ग्राउण्ड हुए भी बहुत दिन हो गये, लगता है। आपके सामने साहब ने बरमूडा पहनना ही शुरू किया था” सलवार रानी ने पाजामा चाचा से कहा।” उसके बाद तो बरमूडा ही नहीं और भी अजीब अजीब नाम वाले तरह-तरह के विदेशी पाजामों ने आपकी जगह ले ली है। एक होता है ‘कार्गो’। पचासों जेबें पूरे पॉयचे पर जड़ी रहती हैं। बड़े से बड़ा आदमी मोटर मैकेनिक लगता है। उससे थोड़ा छोटा पर पैण्ट जैसा होता है ‘पैडल पुशर’। लड़के लड़कियों सब पहनते हैं उसे।” सलवार ने पाजामे का सामान्य ज्ञान बढ़ाया। ”और भी ऐसे ही बहुत सारे उल्टे सीधे नाम वाले कपड़े आ गये हैं जिनमे आदमी जोकर जैसा लगता है” सलवार ने उसे ढाढंस बंधाया। ”पर हमसे गलती कहाँ हो गई? हजारों साल से हमने इस देश के लोगों को जाड़ा गर्मी बरसात से सुरक्षित रखा।
अग्रेजों के जमाने तक में हमारे लोगों ने उनकी नकल करके हमें नहीं छोड़ा। अब अगे्रंजों को गये साठ सत्तर साल हो गये तब लोग कपड़ों में उनकी नकल कर रहे हैं।” धोती का दर्द छलक पड़ा। ”लेकिन खास मौकों जैसे शादी ब्याह, पूजा वगैरह में तो जीन्स टॉप और बरमूडा को कोई नहीं पूछता। तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता धोती बहन। तुम्हारी बात ही और है। हर प्रदेश में अलग अलग रंग रूप और डिजाइन में भारतीयता की पहचान तुम्ही हो। तुम्हारे बिना तो कोई औपचारिक कार्यक्रम हो ही नहीं सकता।” पजामे ने धोती को ढाढंस बधांते हुए कहा। ”मुझे देखो। मुझे तो औपचारिक कार्यक्रमों में भी नहीं पूछा जाता अब। बन्द गले का कोट और पैरों में पैण्ट। मै किसके सामने रोऊँ।” उसे अपनी हालत ज्यादा दयनीय लगी। ”क्या बात कर रहे हो पजामा चाचा। आजकल महिलाओं में जो ड्रेस सबसे ज्यादा लोकप्रिय है उसमें निचला हिस्सा तुम्हारा ही अवतार है। बस पहले तुम सफेद थे। इस अवतार में रंग बिरंगी हो। इस अवतार में तुम्हारा नाम पलाजो है।
इससे पहले महिलायें तुम्हे थोड़ा सा, लगभग तीन इंच, छोटा करके ‘सिंधी पजामा’ के नाम से पहनती थीं। अरे चिन्ता मत करो। तुम सदाबहार हो। कभी चलन से बाहर नहीं जाओगे।” सलवार कुमारी ने पजामा चाचा का मनोबल ऊँचा किया। उन तीनों की नजर अचानक पास ही सूख रही दुबली, पतली, मरियल सी चिथड़े जैसी जींस पर पड़ी। ‘ये पोछा यहाँ हम धुुले धुलाये कपड़ों के बीच क्या कर रहा है।’ धोती ने मुँह बिचकाया। सलवार और पजामें ने भी हिकारत की नजरों से उसे देखा। ”मैं पोंछा नहीं लेटेस्ट फैशन हूँ बुड्ढों।” फटी चिथडें नुमा जींस खिलखिलाई। ”तुम लोग मुझे फटा पुराना समझ रहे हो? मैं अभी पहली बार घुलने आई हूँ। तीन महीने पहले बेबी ने मुझे रो धो कर खरीदवाया था। तब से बेबी रोज मुझे ही पहन रही थी। कल दादी ने चुपके से उठाकर मुझे धुलने में डाल दिया।
बेबी गुस्से में आज कालेज भी नहीं गई।” जींस अपने भाग्य पर इतराई। ”तुम्हें पता है कि तुम लोग आउट डेटेड क्यों हो गये?” जींस ने तीनों से पूछा। ”क्यों?” तीनों ने एक स्वर में पूछा। ”क्योंकि तुम लोग समय के साथ बदले नहीं। तुम्हारे पचास नखरे भी थे। पहले धोना। फिर कलफ लगाना। फिर प्रेस करना। तब जाकर कहीं पहनना। और एक पहन के बाद फिर वहीं सब। और धोती दादी तुमने तो हद पार कर रखी थी। इस सबके अलावा तुम तो चरक भी चढ़वाती थीं। इतना ताम झाम रोज-रोज नहीं हो सकता। इसीलिये तुम्हें खास अवसरों पर ही निकाला जाता है। मुझे देखो। खरीदने से लेकर फेंकने तक एक बार भी न धोओ, तब भी ठीक है। मैं समय के अनुसार हूँ। यूजर फ्रेण्डली हूँ।”
तीनों चित्र लिखें से उस ओवर कान्फीडेन्ट जींस को देखे जा रहे थे। ”चिन्ता न करो। लुंगी नानी की वापसी हो रही है। जिप लगी, बेल्ट वाली लुंगी बाहर के देशों में लोकप्रिय हो रही है। जल्दी ही भारतीयों का ध्यान भी उसकी ओर जायेगा। तुम्हारी वापसी भी हो जायेगी। बस थोड़ा यूजर फ्रेंडली तुम भी हो जाओ।” फटी जींस पता नहीं आगे क्या-क्या बोलती जा रही थी। धोती, सलवार और पजामा तीनों अपनी वापसी की कल्पना में हवा से ही फडफ़ड़ाने लगे।







