महफ़िल हुश्न-ओ-शवाब

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जमी थी महफ़िल हुश्न-ओ-शवाब की, उनके साथ डूबना भा गया।
निहारा जब नयन-ए-शराब को, तो मुझे अजीब नशा छा गया।।
समेट लायी हूं मैं यादों में, झील किनारे बिताए खुशनुमा पल।
इन शरारती नजरो को उनका, इस अदब से मुस्कराना खा गया।।
ना जाने कैसी अजब कशिश है, उस शख्श-ए-ख्वाब में।
उसके मीठे बोलों पर मुझे, कुछ असीमित सा प्यार आ गया।।
चैन-ए-सुकूँ भी मैंने खोया, नींद-ए-ख्वाब भी ना आये रात।
यादों में गुजारा हर लम्हा, कुछ यू हकीकत सामने ला गया।।
ना तमन्ना रही मुझे कोई, ना कोई तलब स्वाद-ए-शराब की।
उसके लबों का स्पर्श लगा जैसे, कोई मदिरा का प्याला पा गया।।
कभी डूबती कभी तैरती रही, खुदगर्ज के ख्याल-ओ-ख्वाब में।
होश यू गवाए “मलिक” की, नाम तेरा बदनाम में आ गया।।

  • सुषमा मलिक, रोहतक (हरियाणा)
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