निःशब्द मैं भी निःशब्द वो भी थे।
वो अटल मृत्यु संग चले।
मैं “अटल मृत्यु” के लिये रुका।।
वो नेक थे, अनेक में एक थे।
वो खुद में समस्त हिंद देश थे।।
मैं जाँति में बँटा, मैं पंथ में बँटा,
मैं क्षेत्र में बँटा, मैं दल में बँटा।
एक का भाव कहाँ? मैं अनेक में अनेक रहा।।
क्यूँ न रहूँ निस्तब्ध!! क्यूँ न रहूँ निःशब्द!!
अब तुमसा कोई महापुरुष, इस वीर धरा में कहाँ?
तुम जीत के मन सभी, असल वीर बन गये।
अमर हो गये, अटल हो गये, बड़ी सीख दे गये।।
–राहुल कुमार गुप्त








2 Comments
मैं भी निशब्द लेकिन बेहतरीन कविता।
उस महान आत्मा को नमन।। जो अब भारतीय राजनीति में जल्द देखने को नहीं मिलना है। अतः एक महायुग का भी अंत हुआ है।।