सुषमा स्वराज का उचित प्रतिवाद

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डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
राजनीति में कई बार विरोधियों की रणनीति को विफल करने के लिए भी निर्णय करने होते है। उत्तर प्रदेश में भाजपा ने सपा बसपा के दौर को समाप्त कर दिया है। ये दोनों पार्टियां राज्य सभा की सीट के लिए लामबंद हुई है। वैसे यह बेमेल तालमेल है। फिर भी राज्यसभा में अल्पमत से निकलना भाजपा के लिए समस्या है। लोकसभा में भारी बहुमत के वजूद  के भाजपा को राज्यसभा में निराशा का सामना करना पड़ा है। दर्जनों विधेयक लोकसभा से पारित होने के बाद भी राज्यसभा में लंबित हैं। अब भाजपा राज्यसभा में बहुमत का इंतजाम करने में लगी है।
उत्तर प्रदेश से होने वाले राज्यसभा चुनाव और नरेश अग्रवाल का भजपा में शामिल होना रणनीतिक निर्णय है। भाजपा ने यहां एक अतिरिक्त प्रत्याशी भी उतार दिया है। यह आकलन है कि नरेश अग्रवाल के आने से भाजपा का यह उम्मीदवार जीत सकता है। जितने के लिए भाजपा को नौ मत की आवश्यकता है। नरेश के आने से वीरोधी खेमे में सेंधमारी हो सकती है। इसी के साथ विपक्ष का नुकसान होगा।
लेकिन नरेश अग्रवाल को अपनी वाणी पर संयम रखना होगा। वह बसपा में रहे, तब बोलना भी मुनासिब नहीं था।
सपा में आये तो मनमाने बयान देने की वाहवाही होती थी। पांच वर्ष में उनकी यह आदत पड़ गई है। आते ही जया बच्चन पर टिप्पणी की। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी इसका विरोध किया। मतलब भाजपा आज भी औरों से अलग है। सुषमा स्वराज से लेकर कार्यकर्ता तक ऐसी बातों पर अपना विरोध दर्ज करते है। नरेश अग्रवाल जब बसपा में गए, तब वहां कोई हलचल नहीं हुई। सपा में गए, किसी ने विरोध नहीं किया। लेकिन भाजपा में आये तो, कार्यकर्ता और समर्थक सभी निराश हुए। अपनी नाराजगी भी प्रकट की । ऐसे ही कुछ वर्ष पहले बसपा सरकार में मंत्री रहे बाबूसिंह कुशवाहा के भाजपा में आने का कार्यकर्ताओं के मुखर विरोध किया था। यह अच्छा है कि सुषमा स्वराज ने जया बच्चन पर नरेश के बयान को आपत्तिजनक और अनावश्यक बताया। इसके बाद नरेश अग्रवाल को जया पर टिप्पणी वापस लेनी पड़ी।

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