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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    आर्थिक संकट से उबरने के लिए लोन मांगेगे लघु समाचार पत्र

    By May 16, 2020 Current Issues 1 Comment5 Mins Read
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    • नवेद शिकोह

    कोरोना संकट से रोजी-रोटी की दुश्वावायिरों से निपटने के लिए सरकार ने कमजोर वर्गों की मदद का ऐलान किया है। मजदूरों,किसानों,रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे व्यापारियों/ उद्यमियों को मदद स्वरूप लोन दिया जायेगा। ऐसे पेशों से जुड़े तमाम बदहाल पेशेवरों में लघु समाचार पत्र भी शामिल है। लघु एवं मझोले समाचार पत्र भी छोटे उद्यम वर्ग में आते हैं। देश के कुल डीएवीपी मान्यता प्राप्त पत्र-पत्रिकाओं में बड़ी संख्या कम संसाधन वाले लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों की हैं। ये पब्लिकेशन करीब पचास लाख के अंदर इंकम टेक्स रिटर्न दाख़िल करते हैं। भारत सरकार के सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय के डीएवीपी ने इनकी प्रसार संख्या के अनुसार इन्हें लघु और मध्यम वर्ग में वर्गीकृत कर इन्हें मान्यता दी है। राज्य सरकारें इन पत्र-पत्रिकाओं को सूचीबद्ध कर इन्हें सहयोग स्वरूप समय-समय पर विज्ञापन देती रही हैं। कोरोना काल में केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने खर्चों में कटौती का सिलसिला शुरू कर दिया है। इसलिए अब विज्ञापन का बजट भी आधा से कम हो जाना है।संभावना है कि अब सरकारें आवश्यक सूचनाओं/योजनाओं/विकास कार्यों/टेंडर इत्यादि के विज्ञापन बड़े प्रसार वाले स्थापित ब्रांड अखबारों को ही देंगी।

    छोटे अखबारों को विज्ञापन सहयोग ना मिलने का सिलसिला लगभग शुरू भी हो चुका है। यही कारण हैं कि डीएवीपी और राज्यों में सूचीबद्ध छोटे पत्र-पत्रिकाएं बंदी की कगार पर आ गई हैं। इन अखबारों के कर्मचारी बेरोजगारी और भुखमरी की कगार पर खड़े हैं।

    ऐसे में लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों के प्रकाशक हालात से निपटने के लिए लोन की मांग करेंगे। कम संसाधन वाले संघर्षील प्रकाशकों-पत्रकारों के संगठन और यूनियनों की बैठकों का सिलसिला शुरू हो गया है। जिसके उपरांत उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की जायेगी कि लोन की सहायता के लाभ में प्रकाशकों को सम्मलित किया जाये। क्योंकि बदहाल छोटे उद्योगों की श्रेणी में छोटे पत्र-पत्रिकायें भी आ रहे हैं।

    गौरतलब है कि कोरोना के संकट में आर्थिक बदहाली का शिकार पेशेवरों के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीस लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है।

    स्थानीय पेशों में उत्तर प्रदेश अव्वल है। यहां लोकल अखबारों से जुड़े अखबारकर्मियों की बड़ी संख्या है। कोरोना वायरस ने इन पेशेवरों के पेशे को भी शिकार बनाकर बदहाली की गर्त में पंहुचा दिया है। पत्रकार बेरोजगार हो रहे हैं। चिकनकारी और आरी-जरदोजी का कारीगर रिक्शा-ठेला खीचने का विकल्प चुन सकता है,किंतु पत्रकार शायद ऐसा विकल्प नहीं अपना पाये।

    एक समय था जब चिकनकारी आरी-ज़रदोजी जैसे हुनर विश्वपटल पर ग्लोबल धाक जमाये थे, अब बदहाली का शिकार हैं। मुरादाबाद की नक्काशी.. बनारस की बनारसी साड़ियां और भदोही का कालीन उद्योग जैसी तमाम यूपी की लोकल हुनरमंदी दुनिया की पसंद बनी थी। पिछले दस-पंद्रह वर्षों से यूपी के इन उद्योगों की सबकी हालत पतली है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में लोकल अखबारों की तादाद सर्वाधिक है। पत्रकारिता के क्षेत्र के लोगों को इतना रोजगार किसी सूबे ने नहीं दिया जितने रोजगार यूपी के लोकल अखबारों ने दिए। हिंदी पट्टी के कई ब्रांड अखबार भी कभी लोकल हुआ करते थे। कॉरपोरेट घरानों ने इन्हें शुरू नहीं किया था। देखते देखते ये राष्ट्रीय ब्रांड अखबार बन गये।

     

    आज भारत की पत्रकारिता की शान हैं और लाखों लोगों की रोजी-रोटी का सहारा हैं। देश के डीएवीपी और गैर डीएवीपी अखबारों-पत्रिकाओं की जितनी संख्या है उनमें से लगभग आधे उत्तर प्रदेश के हैं। करीब पांच-सात सौ पत्र-पत्रिकायें तो उ.प्र.सूचना विभाग की विज्ञापन सूची में सूचीबद्ध हैं। इनमें 97% कम संसाधनों से प्रकाशित होने वाले लघु एवं मध्यम वर्ग के पत्र-पत्रिकाएं हैं। यूपी सरकार छोटे/कम संसाधन कै संघर्षशील और गैर कॉरपोरेट अखबारों को विज्ञापन का सहयोग करती है। जब 97% लोकल पब्लिकेशन हैं तो ज़ाहिर सी बात है कि बड़ी संख्या में इससे जुड़े लोगों का जीवन-यापन/रोजी-रोटी जुड़ी है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना काल में बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से उबरने के लिए बीस लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है। आर्थिक सुधारों के लिए आत्मनिर्भरता, स्वरोजगार और लोकल पेशों को इस आर्थिक पैकेज से खाद्य-पानी दिया जायेगा, इस बात की आस बंध गयी है। उत्तर प्रदेश के लोकल पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े प्रकाशकों, पत्रकारों और अखबारकर्मियों को उम्मीद है कि कोरोना काल में उन्हें भी कोई आर्थिक सहायता मिलेगी। लखनऊ के कई पत्रकार छोटे प्रकाशक के तौर पर खुद अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं और तमाम अखबारकर्मियों को रोजगार देने का काबिले तारीफ काम कर रहे है। इधर तमाम छोटे उद्योगों/ठेले वालों/कामगरों/श्रमिको/मजदूरों की बदहाली की तरह छोटे अखबारों की भी बुरी स्थिति है। आय के स्त्रोत बंद हो गये हैं इसलिए पब्लिशर अखबारकर्मियों को उनका मामूली वेतन देने की स्थिति में नहीं है।

    पत्रकारों और प्रकाशकों को प्रधानमंत्री के राहत पैकेज से उम्मीद बंधी है। वरिष्ठ पत्रकार और प्रकाशक मनोज मिश्रा कहते हैं कि समाचार पत्र का प्रकाशन रोजगार की कड़ी का एक अहम् हिस्सा है। सीधे तौर पर एक छोटे दैनिक पेपर मे भी लगभग 20 लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष 30 परिवार की रोजी रोटी जुडी हुई है। केंद्र /प्रदेश सरकार इस पर गंभीरता से विचार करें। उत्तर प्रदेश मे 2000 समाचार पत्र davp हैं और नियमित प्रकाशित होते हैं। ये पत्र-पत्रिकायें सरकार से सीधे जनता को जोड़े हुए हैं। सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं और आम जनका के बीच ये अखबार सेतु की भूमिका अदा कर रहे हैं।

    इस कोरोना महामारी मे भी ब्लॉक /तहसील /जिला /राज्य के पत्रकार 24X7 सर्विस दे रहे हैं। जहां एक तरफ लघु मध्यम उद्योगों को पुनः स्थापित करने मे सरकार पूरी तरह सजग है। यदि सरकार छोटे पत्र-पत्रिकाओं की वित्तीय मदद के रूप में लोन दें तो उत्तर प्रदेश मे लाखों लोग बेरोजगार होने से बच जायेंगे।

    वरिष्ठ पत्रकार नीरज श्रीवास्तव के मुताबिक कोरोना काल में संकट केवल प्रकाशकों के समक्ष ही नहीं है बल्कि उसमें काम करने वाले हजारों की संख्या में पत्रकारों के सामने आज रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस प्रकार लोकल उद्यम को बढ़ावा देने की बात कही है उससे अब स्थानीय स्तर पर प्रकाशित हो रहे अखबारों को भी लोन की मदद मिलना चाहिए है।

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    1 Comment

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