हैंड सेनेटाइजर के नाम पर बाजार में काला बाज़ारी के धंधे का सच

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आजकल कोरोना वायरस का खौफ इस तरह है कि भारत देश के व्यापारी लोग अपना धंधा चमकाने में लगे हैं। जबकि अर्थशास्त्र के नियम के अनुसार अगर सप्लाई बढ़ रही है तो कम से कम वस्तु का दाम कम रखना चाहिए। लेकिन कोरोना वायरस की वजह देश में सेनेटाइजर की बिक्री बढ़ने के साथ उसके दामों में बढ़ोत्तरी कर दी है। जबकि मैन्युफैक्चरिंग दर बढ़ाने की जरूरत है।

1. सेनेटाइजर:

हैंड सेनेटाइजर की अगर बात की जाए तो यह एक रासायनिक मिश्रण हैं। जो डबल डिस्टिल्ड वाटर यानी आसुत जल में एथिल अल्कोहल या आइसो प्रोपिल अल्कोहल के व्युत्प्न्न का इस्तेमाल जो लगभग 80 से 90% तक होता है। जिसमें कुछ मात्रा में नीम का तेल, लौंग का तेल और पिपरमिंट का तेल इस्तेमाल करते हैं। क्योंकि ये सब तेल एन्टी बैक्टीरियल स्वभाव के होते हैं। जबकि हम सभी लोगों के घर में लौंग पिपरमिंट का तेल लगभग पाया ही जाता है। यही तेल टूथपेस्ट बनाने वाली कंपनी इस्तेमाल करती हैं।

जब हम कई सारे साल्वेंट यानिक विलायक को जब एक साथ मिश्रण बनाते हैं तो जैसे तेल और पानी आपस में घुल नही सकते तो हम लोग इसे इमल्सीकरण विधि के द्वारा जिसमें कुछ रसायन को इस तेल और पानी वाले में मिश्रण में डाल देते हैं जिससे एक समांगी मिश्रण तैयार हो जाता है। जिसमें खुशबू के लिए थोड़ी बहुत मात्रा में परफ्यूम मिलाते हैं। तब जाकर इस सेनेटाइजर का निर्माण होता है।

2. कोरोना वायरस का प्रोटीन:

वैसे कोरोना वायरस का प्रोटीन सार्स वायरस के प्रोटीन का ही हिस्सा है। सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि प्रोटीन कई सारे एमिनो अम्ल से मिलकर बने होते हैं। जो किसी भी प्राणी या वायरस के जीन में DNA और RNA का निर्माण करते हैं।
RNA के प्रोटीन ही किसी दवाई को अपने अंदर बांधकर अपने लक्ष्य तक जाने में मदद करते हैं।
अगर आपको कोरोना वायरस के प्रोटीन के डेटा बैंक में जानकारी चाहिए है तो www.rcsb.org साइट पर जाकर उसके अलग अलग प्रोटीन के बारे में जान सकते हैं।

3.सेनेटाइजर और कोरोना वायरस का संबंध:

सेनेटाइजर में मुख्य तत्व अल्कोहल होता है जो वायरस को सिर्फ अपने अंदर घोल लेता है और फिर उसके अंदर उपरोक्त औषधियों के तेल उसको खत्म करने की कोशिश करते हैं।
रसायन विज्ञान के छात्रों को पता है कि अल्कोहल एक बहुत अच्छा विलायक होता है जो आर्गेनिक यानी प्रोटीन जैसे अवयवों को अपने अंदर घोलने का काम करते हैं। जो इन वायरस के प्रोटीन को तोड़ देते हैं और उनकी सक्रियता को खत्म कर देते हैं। रसायन विज्ञान की भाषा में प्रोटीन का टूटना डीनेचर्ड (Denatured) कहलाता है।
इसमें आइसो प्रोपिल अल्कोहल के डेरीवेटिव या व्युत्प्न्न सबसे ज्यादा असरदार हैं।

4.सेनेटाइजर का अन्य रूप से बचाव:

जिस घर वर्तमान समय में सेनेटाइजर की कमी है वह कहीं से भी अल्कोहल की देशी शराब, रम, ब्रांडी आदि शराबों से आप अपने हाथों को धो सकते हैं क्योंकि इनमें अल्कोहल की मात्रा 50% से ज्यादा है। इसके अलावा स्परिट जो बाजार में आसानी से मिल जाते हैं उसका भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

सावधान: याद रहे स्परिट में मिथाइल अल्कोहल होता है और इसका सेवन तो बिल्कुल नही करना चाहिए। क्योंकि मिथाइल अल्कोहल आंखों की रोशनी खत्म कर देता है और किडनी को फेल भी कर देता है।
जो लोग घर पर अपनी दाढ़ी बनाते हैं या शेविंग करते हैं वह आफ्टर सेव का इस्तेमाल करते हैं तो उस आफ्टर सेव में 30 से 40% पानी भरकर उसका भी इस्तेमाल हाथ धोने में कर सकते हैं।

सबसे बड़ी बात आप टिशू पेपर पर अल्कोहल या सेनेटाइजर की सहायता से अपने घर के दरबाजे के हैंडल, मोबाइल फोन, आदि वस्तुओं को समय समय पर साफ करते रहे हैं।
सबसे बड़ी यह कोरोना का वायरस आम वायरस से मिलता जुलता है और इसके होने पर घबराएं नही बल्कि तुरन्त डॉक्टर से संपर्क करें। इस केस में हमें व्यक्तिगत साफ सफाई पर ज्यादा ध्यान देना है और कोशिश करें बाहर कम निकले अगर निकलते हैं तो बाहर की चीजों को टच कम करने की कोशिश करें।
यह वायरस धातुओं पर लगभग 4 से 5 घण्टे तक जीवित रहता है और प्लास्टिक पर लगभग 8 से 10 घण्टे,
इसलिए बाहरी चीजों को टच करने से बचना चाहिए।

5. गौमूत्र और गौबर की अफवाह:

आजकल गौमूत्र और गोबर की अफवाह से दूर रहे हैं । क्योंकि गौमूत्र के रसायन मिश्रण में 95% जल होता है और 5% में सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम आदि मिनरल होते हैं। जो बीमारी ठीक नही कर सकते हैं। गौमूत्र और इंसानी पेशाब में ज्यादा अंतर नही है। इसलिए बाजार में गौमूत्र और गोबर के बारे में चल रही अफवाहों से बचें। क्योंकि अगर गौमूत्र या गोबर से कोई दवा बनती तो उस पर कई पेटेंट और शोधपत्र इंटरनेट पर मौजूद रहते लेकिन ऐसा कोई शोध पत्र अभी नही आया। इसलिए व्हाटप्पस और सोशल मीडिया की खबरों पर ध्यान न देकर गूगल पर elsevier, american chemical society, springer, nature, फार्मा के आदि विश्व प्रसिद्द जर्नल में ही इसके बारे जान सकते हैं।

(डॉ अजय कुमार, पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च फेलो, रसायन विज्ञान विभाग, IIT, दिल्ली की रिपोर्ट पर आधारित)

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