इतिहास के पन्नों में नहीं मिली इन गुमनाम क्रांतिकारियों को जगह!

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हम सभी को सरदार भगत सिंह की देश भक्ति और उनकी कुर्बानी आजादी के लिये लड़ते हुए वतन पर शहीद हो जाने वाले इस नाम से देश के बच्चे-बच्चे की जुबान पर है, तो वहीं चंद्रशेखर आजाद की कुर्बानी भी आज तक हम लोगों को भावुक कर आँखें नम कर देती हैं, वहीं सुखदेव, राजगुरू, खुदीराम बोस जैसे वीर योद्धाओं की कुर्बानी इतने वर्षों बाद भी लोगों के जेहन में ताजा हैं, लेकिन कुछ ऐसे ही अनेकों न जाने कितने लोग देश को आजाद कराने के लिये शहीद हुये उन वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दीं है, जिनका नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज भी नहीं हो पाया है और न जाने कितने ही ऐसे और नाम हैं जो गुमनामी के आगोश में समा गये। देश को स्वतंत्र कराने में उनकी शहादतें को सिर्फ मिली तो भी केवल गुमनामी।

हमारे देश को स्वंतत्र कराने के लिए अपनी अंतिम साँसों तक लड़ने वाले वीर सिपाही जो 26 अगस्त वर्ष 1914 की रोडा सशस्त्र डकैती की (रोडा एंड कंपनी के शस्त्रों की चोरी ( 1914 ) 268 . 1914 को रोडा एंड कपनी के रिवॉल्वरों व कारतूसों की पेटियों का गोदाम) स्वंतत्रता संग्राम में एक अहम भूमिका निभाया ऐसे ही कुछ नाम जिन्होंने इस डकैती को अंजाम देने वाले नाम अनुकूल बनर्जी, सूर्य सेन और बाघा जतीन का नाम आज भी गुमनामी के अँधेरों में गुम हो कर रह गये।

देश के पूर्वी हिस्से में ही देश को आजाद करने की बीड़ा इन तीन नौजवानों ने लेकर अंग्रजो के खिलाफ प्रथम लड़ाई का बिगुल फूंका। वहीँ देश के पश्चिमी हिस्से में जो लड़ाईयाँ लड़ी जा रही थीं, उनके नायक अपने-अपने स्तर पर डटे हुए थे। इन आंदोलनों में उच्च शिक्षित नौजवान योद्धाओं के शामिल होने से आंदोलन ने कुछ अलग तरह की मोड़ ले लिया।

जतींद्रनाथ बनर्जी और उनके भाई बरींद्रनाथ जैसे कुछ लोग अपने संगठनों के माध्यम से देश पूर्व में धधकते आंदोलन की आग को बुझने नहीं दिया। सन 1902 में पी मित्र द्वारा अनुशीलन नाम से एक समिति का गठन किया, जिससे संघर्ष को और भी जोरदार बनाया जा सके। पी मित्र पेशे से वकील थे, इस संगठन में पुलीन दास एवं तैलोक्य चक्रवर्ती जैसे लोगों ने गुप्त तरीके से आजादी के लिये संघर्ष जारी करखा था।

गुमनाम हुयी महिला क्रांतिकारीयां:

देश के आजादी की लड़ाई में पुरुषों के साथ ही महिलाओं ने भी भरपूर साथ दिया। उनके इस योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने पुरूषों से कंधे-से-कंधा मिलाकर आजादी के लड़ाई में कूद पड़ी। स्वदेशी आंदोलन एवं असहयोग आंदोलनों में गुप्त तरीके से आजादी के मिशन चलते रही। उन महिलाओं के सहयोग को इतिहास में बिसराने वाला कोई नही था। सरोजनी नायडू, मैडम भीखाजी कामा, सिस्टर निवेदिता, का नाम आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है, लेकिन कुछ महिला क्रांतिकारी ऐसी भी हैं जिन्होंने अपने प्राणों तक की आहुति दे दी, लेकिन आज हम देश के लोग उनकी कुर्बानियों से अनभिज्ञ हैं। ऐसे नामों में से कुछ नाम जो इतिहास के पन्नों में दर्ज नही हो पाए है इन नामों में बीना दास, सुनीति चौधरी, शांति घोष, प्रीतिलता वड्डेदार ऐसे कुछ नाम हैं, जो इतिहास के पन्नों पर दर्ज होने से वंचित रह गये।

वहीं पर नमक कानून भंग किये जाने के उपरांत हजारों की संख्या में भारतीय महिलाओं ने जहां शराब की दुकानों पर धरना देकर नमक तक बेचा। ऐसी महिलाओं के नारी सत्याग्रह समिति, सेविका संघ जैसे संगठनों की आजादी में एक अहम भूमिका निभाते हुए मात्र 13 वर्ष की उम्र में मणिपुर की रानी गेडिलियो ने आजादी के लड़ाई में हिस्सा लेकर पूर्वी क्षेत्र के संघर्ष में अपना अटूट योगदान देते हुये अंतत: ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर आजीवन कारावास में डाल दिया था।

भारत की आजादी में सहयोग देने वाली ऐसी महिलाओं के नाम गुमनामी के स्याह अँधेरे में गुम हो कर रह गयी इसके अलावा और भी न जाने ऐसे कितने ही नाम हैं, जिनकी जानकारी न तो ब्रिटिश सरकार के पास थी और न ही भारतीय जनता के पास है।

जय हिन्द!

  • प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती

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