Close Menu
Shagun News India
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Thursday, June 25
    Shagun News IndiaShagun News India
    Subscribe
    • होम
    • इंडिया
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • राजस्थान
    • खेल
    • मनोरंजन
    • ब्लॉग
    • साहित्य
    • पिक्चर गैलरी
    • करियर
    • बिजनेस
    • बचपन
    • वीडियो
    • NewsVoir
    Shagun News India
    Home»ब्लॉग»Current Issues

    बस्तर, तेंदूपत्ता और माओवाद

    ShagunBy ShagunApril 30, 2023 Current Issues No Comments7 Mins Read
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Post Views: 703

    उपेन्द्र नाथ राय

    दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा में माओवादियों के कायराना हमले ने सबको झकझोर दिया है। आमतौर पर ऐसी वारदात सोझी समझी रणनीति के तहत तेंदूपत्ता सीजन में ही होती हैं। बस्तर का हर व्यक्ति यह जानता है कि माओवादियों की सक्रियता मार्च से जून तक बढ़ जाती है। चुनावी वर्ष में भी यह बड़ी घटना को अंजाम देने के फिराक में रहते हैं। इसी अवधि में माओवादी टैक्टिकल काउंटर अफेंसिव कैंपेन अर्थात टीसीओसी चलाते हैं। इसी दौरान नए रंगरूटों को भर्ती किया जाता है। ऐसे हमलों का मकसद तेंदूपत्ता हितग्राहियों में दिल-दिमाग में खौफ पैदा करना होता है, जिससे वह पैसा देने में आनाकानी न करें। माओवादियों की यह मारकाट रंग लाती है। तेंदूपत्ता की तुड़ाई मई में शुरू हो जाती है। इसके लिए बस्तर में समितियों के गठन से लेकर अन्य तैयारियां शुरू हो गई हैं। माओवादियों की कमाई का बड़ा जरिया तेंदूपत्ता ही है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मात्र कांकेर जिले से माओवादी लगभग डेढ़ करोड़ रुपये (पुलिस खुफिया विभाग की रिपोर्ट) की वसूली करते हैं।

    Image

    यही वजह है कि माओवादी मार्च से ही दहशत फैलाने लगते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि तेंदूपत्ता की तुड़ाई करने वाले आसानी से समितियों को उनका हिस्सा दे देते हैं। पिछली भाजपा सरकार ने तेंदूपत्ता तुड़ाई के पैसे देने की नियमावली में परिवर्तन किया था। सरकार सीधे हितग्राहियों के खाते में पैसा भेजने लगी थी। इससे माओवादियों को वसूली में परेशानी हुई। इसके बाद माओवादियों के इशारे पर बस्तर संभाग में आंदोलन शुरू हो गया। अब इसको समझिए, माओवादियों के ही इशारे आंदोलन भी होते हैं। जंगल से फरमान आता है और लोग न चाहते हुए भी बाहर निकलने को मजबूर हो जाते हैं। जब तक भाजपा की सरकार रही, उसने पैसा सीधे हितग्राही के खाते में डाला। रमन सिंह आंदोलन के आगे नहीं झुके। कांग्रेस की सरकार बनते ही इ्स पर पूर्णविराम लगा दिया गया। समितियों के माध्यम से ही पैसा दिया जाने लगा।

    Image

    समितियों के माध्यम से पैसा देने से माओवादियों को यह फायदा होता है कि उन्हें सिर्फ समिति के पदाधिकारियों से मिलना होता है। वहां फरमान चला जाता है। वहां से हर हितग्राही के मेहनत के पैसे में 15 प्रतिशत तक की कटौती कर ली जाती है। बाद में यह पैसा (कटौती) माओवादियों तक पहुंचा दिया जाता है। इसे कांग्रेस या तो समझ नहीं पाई या समझते हुए भी माओवादियों के सामने दंडवत हो गई। सरकारें बार-बार कहती हैं कि माओवाद अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है, लेकिन यह अर्द्धसत्य है। हकीकत तो यह है कि फोर्स सिर्फ गतिविधियों को दबाने की दवा मात्र है। यह वैसे ही है, जैसे मलेरिया की दवा कुनैन है। कुनैन से मलेरिया को खत्म तो किया जा सकता है, लेकिन मलेरिया कभी हो न, इसके लिए तो मच्छरों को खत्म करने के उपाय पर विचार करना होगा। माओवादियों की मौजूदगी की वर्तमान स्थिति के बारे में उनके सात नवंबर 2022 को जारी 27 पेज के पत्र से जाहिर होती है।

    इसमें लिखा है कि 11 महीनों के अंदर (दिसंबर 2021 से नवंबर 2022 तक) देशभर में 132 माओवादी मारे गए। इसमें सबसे अधिक 89 दंडकारण्य क्षेत्र में मारे गए। माओवादियों का यह दंडकारण्य बस्तर संभाग, छत्तीसगढ़ के बार्डर महाराष्ट्र और तेलंगाना के बार्डर को मिलाकर बनाया गया है। माओवादी इसे एक डिवीजन दंडकारण्य संबोधित करते हैं। इस पत्र के मुताबिक पिछले 11 माह में उसके सेंट्रल रीजनल बल का एक, बिहार-झारखंड के 17, पश्चिम बंग का एक, तेलंगाना के 15, आंध्र प्रदेश में एक, ओडिशा के तीन, पश्चिम घाटियों में एक, महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में तीन माओवादी मारे गए। इसमें केंद्रीय कमेटी के सदस्य दीपक को बचाने में ही 27 माओवादी पारेवा मुठभेड़ में मारे गए। यहां महत्वपूर्ण है कि माओवादियों के समूल नाश के लिए केंद्र ने मई 2017 में पांच वर्ष की समय सीमा रखकर समाधान योजना प्रारंभ की थी।

    Image

    इस पत्र में ही लिखा है कि माओवादियों (2017 से) ने इस दौरान पूरे भारत में 1300 से अधिक गुरिल्ला कार्रवाई की। इसके माध्यम से पांच साल में 429 जवान शहीद हो गए। 966 जवान घायल हुए। इस दौरान 40 लोगों को माओवादियों ने मारा। 409 जन सामान्य की भी नृशंस हत्या कर दी गई। इनमें से ज्यादातर आदिवासी समाज के लोग हैं। 300 जगहों पर संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। एक साल में माओवादियों ने 200 बार दहशत फैलाई। इन घटनाओं में 31 जवान शहीद हुए। 154 जवान घायल हुए। 69 सामान्य लोगों को मार दिया गया। माओवाद की समस्या को आप इसी से समझ सकते हैं कि छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले का आमाबेड़ा क्षेत्र जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर है। इस क्षेत्र में आज भी ऐसे गांव हैं, जहां के लोग हिंदी बोलना तो दूर छत्तीसगढ़ी भी नहीं बोल पाते। ऐसे में यह लोग अधिकारियों से अपने दर्द को कैसे बयां कर सकते हैं। ऐसे कई गांव हैं, जहां पर प्रशासन को पहुंचने में 12 से 15 घंटे लग जाते हैं। यहां सिर्फ किसी तरह साइकिल या बाइक ही जा सकती है। अधिकारियों की अकेले जाने की हिम्मत नहीं होती। यदि पूरी फोर्स वहां पहुंचती है तो हर कदम पर खतरा मंडरा रहा होता है।

    Image

    यहां पुलिस और माओवादियों में अंतर यह होता है कि माओवादियों के सचिव स्तर के पदाधिकारी के लिए अनिवार्य योग्यता ही चार भाषाओं का ज्ञान होना होती है। जिस क्षेत्र में उसकी नियुक्ति है, उस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के साथ ही हिंदी और अंग्रेजी की जानकारी भी चाहिए। स्थानीय भाषा के जानकार होने से यह लोग स्थानीय लोगों के साथ आसानी से घुल-मिल जाते हैं। वहीं पुलिस को लोगों का दर्द समझने के लिए दुभाषिया की जरूरत होती। ऐसे में सवाल यह है कि पुलिस स्थानीय लोगों के साथ कैसे घुल-मिल सकती है।

    यह कहा जाता है कि जो दिखता है, वह हमेशा सच नहीं होता। यह बात माओवादी क्षेत्रों में सच साबित होती है। यही कारण है कि बाहर से उस क्षेत्र में जाकर खबर देने वाले पत्रकार भी कभी हकीकत को ठीक से उजागर नहीं कर पाते। इसका कारण है कि उनकी रिपोर्ट स्थानीय लोगों से बातचीत पर आधारित पर होती है। आप सोच सकते हैं कि जो (स्थानीय बाशिंदे) बंदूक की नाल पर हमेशा सांस ले रहा हो, वह कैसे सच बता सकता है। हकीकत यह होती है कि बाहर से जाने वाले पत्रकारों से बातचीत के समय 10 स्थानीय लोगों के बीच एक माओवादी जरूर होता है।

    उदाहरण के तौर पर आप उनसे पूछिये, क्या इस बीच माओवादी इस क्षेत्र में देखे गए हैं। उनका यही जवाब होता है, वर्षों से देखे नहीं गए, जबकि हकीकत है कि उस क्षेत्र में माओवादी रोज आते-जाते हैं। माओवादी क्षेत्र में रहने वाले लोगों के सामने एक तरफ खाई तो दूसरी तरफ पहाड़ है। दोनों के बीच हमेशा उनकी जिंदगी खतरे में पड़ी रहती है। यदि एक पुलिस वाला उनसे बात कर लेता है तो शक में माओवादी उन्हें मौत के घाट उतार देते हैं। कहते हैं, यह पुलिस का मुखबिर था। इधर पुलिस उन्हें हमेशा शक के दायरे में रखती है कि यह जनताना सरकार का सदस्य होगा और कई बार यह हकीकत भी होती है कि उन्हीं आम आदमियों के बीच माओवादियों का मुखबिर भी छिपा होता है, जिसे उस गांव के लोग भी नहीं जानते।

    इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक बार मैं छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में माओवादियों से प्रभावित सीतरम इलाके में गया था। वहां जाने के लिए एक नदी को पार करना पड़ा। नदी पार करते ही माओवादियों के स्मारक दिखने लगे। मैं चारों तरफ से घिर गया। इसके बाद मैंने अखबार से बताया तो कुछ राहत मिली। कई लोगों से बातचीत की। एक व्यक्ति ने कहा कि यहां माओवादियों की गतिविधियां लंबे समय से शून्य हैं। और यह बातचीत के ठीक तीन दिन बाद पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। यदि आतंकवादियों और माओवादियों की तुलना करें तो माओवादी ज्यादा घातक हैं। आतंकवादी तो पहचान में आ जाएंगे, क्योंकि वे हमेशा आमने-सामने की लड़ाई करते हैं, जबकि माओवादी हमेशा कायरों की भांति छुपकर गुरिल्ला युद्ध करते हैं। जब अकेले पाते हैं तो पीठ में छुरा भोंक कर चले जाते हैं। माओवादियों की पहचान करनी बहुत मुश्किल है। इस कारण इनसे लड़ाई इन्हीं की भाषा में ही की जा सकती है।

    Shagun

    Keep Reading

    A World Drifting Towards Loneliness: Questions About the Institution of Family

    अकेलेपन की ओर बढ़ती दुनिया: परिवार की संस्था पर सवाल

    मुंबई में तोड़फोड़ की राजनीति: शिवसेना का दूसरा टूटना

    Shared heritage gave the country 'Amrit' (nectar), while extremism is spreading 'poison'!

    साझी विरासत ने देश को दिया ‘अमृत’ तो कट्टरपंथ दे रहा ‘ज़हर!’

    Idli. For just one rupee—not a bad deal!

    इडली. सिर्फ एक रुपए में, सौदा बुरा नहीं !

    पीओके में भीतरी बगावत बनी पाकिस्तान के लिए सबसे गंभीर चुनौती

    Trump's Stern Message to Iran: 'A Very Good Deal' or 'The Other Path'

    पश्चिम एशिया में तनाव कम होने के संकेत

    Leave A Reply Cancel Reply

    Advertisment
    Google AD
    We Are Here –
    • Facebook
    • Twitter
    • YouTube
    • LinkedIn

    EMAIL SUBSCRIPTIONS

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    About



    ShagunNewsIndia.com is your all in one News website offering the latest happenings in UP.

    Editors: Upendra Rai & Neetu Singh

    Contact us: editshagun@gmail.com

    Facebook X (Twitter) LinkedIn WhatsApp
    Popular Posts
    Defeating cyber adversaries with the power of AI! Kratical Tech's blockbuster IPO on June 30.

    एआई की ताकत से साइबर दुश्मनों को मात! क्राटिकल टेक का 30 जून को धांसू IPO

    June 24, 2026
    Monsoon arrives! Weather in UP to change in 3-4 days; major relief from heat and humidity expected.

    मानसून की दस्तक! UP में 3-4 दिनों में बदलेगा मौसम, गर्मी-उमस से मिलेगी बड़ी राहत

    June 24, 2026
    A World Drifting Towards Loneliness: Questions About the Institution of Family

    अकेलेपन की ओर बढ़ती दुनिया: परिवार की संस्था पर सवाल

    June 24, 2026
    Shocking revelation of bonded labor in Muzaffarnagar: 12 workers rescued from the jaws of death; 2 arrested.

    मुजफ्फरनगर में बंधुआ मजदूरी का सनसनीखेज खुलासा: 12 श्रमिकों को मौत के मुंह से बचाया, 2 गिरफ्तार

    June 24, 2026

    AI के विस्तार को लेकर CTO का विश्वास लगातार तीसरे साल कमजोर पड़ा: अक्कोडिस रिपोर्ट

    June 23, 2026

    Subscribe Newsletter

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    Privacy Policy | About Us | Contact Us | Terms & Conditions | Disclaimer

    © 2026 ShagunNewsIndia.com | Designed & Developed by Krishna Maurya

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Newsletter
    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading