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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    बस्तर, तेंदूपत्ता और माओवाद

    ShagunBy ShagunApril 30, 2023 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    उपेन्द्र नाथ राय

    दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा में माओवादियों के कायराना हमले ने सबको झकझोर दिया है। आमतौर पर ऐसी वारदात सोझी समझी रणनीति के तहत तेंदूपत्ता सीजन में ही होती हैं। बस्तर का हर व्यक्ति यह जानता है कि माओवादियों की सक्रियता मार्च से जून तक बढ़ जाती है। चुनावी वर्ष में भी यह बड़ी घटना को अंजाम देने के फिराक में रहते हैं। इसी अवधि में माओवादी टैक्टिकल काउंटर अफेंसिव कैंपेन अर्थात टीसीओसी चलाते हैं। इसी दौरान नए रंगरूटों को भर्ती किया जाता है। ऐसे हमलों का मकसद तेंदूपत्ता हितग्राहियों में दिल-दिमाग में खौफ पैदा करना होता है, जिससे वह पैसा देने में आनाकानी न करें। माओवादियों की यह मारकाट रंग लाती है। तेंदूपत्ता की तुड़ाई मई में शुरू हो जाती है। इसके लिए बस्तर में समितियों के गठन से लेकर अन्य तैयारियां शुरू हो गई हैं। माओवादियों की कमाई का बड़ा जरिया तेंदूपत्ता ही है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मात्र कांकेर जिले से माओवादी लगभग डेढ़ करोड़ रुपये (पुलिस खुफिया विभाग की रिपोर्ट) की वसूली करते हैं।

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    यही वजह है कि माओवादी मार्च से ही दहशत फैलाने लगते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि तेंदूपत्ता की तुड़ाई करने वाले आसानी से समितियों को उनका हिस्सा दे देते हैं। पिछली भाजपा सरकार ने तेंदूपत्ता तुड़ाई के पैसे देने की नियमावली में परिवर्तन किया था। सरकार सीधे हितग्राहियों के खाते में पैसा भेजने लगी थी। इससे माओवादियों को वसूली में परेशानी हुई। इसके बाद माओवादियों के इशारे पर बस्तर संभाग में आंदोलन शुरू हो गया। अब इसको समझिए, माओवादियों के ही इशारे आंदोलन भी होते हैं। जंगल से फरमान आता है और लोग न चाहते हुए भी बाहर निकलने को मजबूर हो जाते हैं। जब तक भाजपा की सरकार रही, उसने पैसा सीधे हितग्राही के खाते में डाला। रमन सिंह आंदोलन के आगे नहीं झुके। कांग्रेस की सरकार बनते ही इ्स पर पूर्णविराम लगा दिया गया। समितियों के माध्यम से ही पैसा दिया जाने लगा।

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    समितियों के माध्यम से पैसा देने से माओवादियों को यह फायदा होता है कि उन्हें सिर्फ समिति के पदाधिकारियों से मिलना होता है। वहां फरमान चला जाता है। वहां से हर हितग्राही के मेहनत के पैसे में 15 प्रतिशत तक की कटौती कर ली जाती है। बाद में यह पैसा (कटौती) माओवादियों तक पहुंचा दिया जाता है। इसे कांग्रेस या तो समझ नहीं पाई या समझते हुए भी माओवादियों के सामने दंडवत हो गई। सरकारें बार-बार कहती हैं कि माओवाद अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है, लेकिन यह अर्द्धसत्य है। हकीकत तो यह है कि फोर्स सिर्फ गतिविधियों को दबाने की दवा मात्र है। यह वैसे ही है, जैसे मलेरिया की दवा कुनैन है। कुनैन से मलेरिया को खत्म तो किया जा सकता है, लेकिन मलेरिया कभी हो न, इसके लिए तो मच्छरों को खत्म करने के उपाय पर विचार करना होगा। माओवादियों की मौजूदगी की वर्तमान स्थिति के बारे में उनके सात नवंबर 2022 को जारी 27 पेज के पत्र से जाहिर होती है।

    इसमें लिखा है कि 11 महीनों के अंदर (दिसंबर 2021 से नवंबर 2022 तक) देशभर में 132 माओवादी मारे गए। इसमें सबसे अधिक 89 दंडकारण्य क्षेत्र में मारे गए। माओवादियों का यह दंडकारण्य बस्तर संभाग, छत्तीसगढ़ के बार्डर महाराष्ट्र और तेलंगाना के बार्डर को मिलाकर बनाया गया है। माओवादी इसे एक डिवीजन दंडकारण्य संबोधित करते हैं। इस पत्र के मुताबिक पिछले 11 माह में उसके सेंट्रल रीजनल बल का एक, बिहार-झारखंड के 17, पश्चिम बंग का एक, तेलंगाना के 15, आंध्र प्रदेश में एक, ओडिशा के तीन, पश्चिम घाटियों में एक, महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में तीन माओवादी मारे गए। इसमें केंद्रीय कमेटी के सदस्य दीपक को बचाने में ही 27 माओवादी पारेवा मुठभेड़ में मारे गए। यहां महत्वपूर्ण है कि माओवादियों के समूल नाश के लिए केंद्र ने मई 2017 में पांच वर्ष की समय सीमा रखकर समाधान योजना प्रारंभ की थी।

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    इस पत्र में ही लिखा है कि माओवादियों (2017 से) ने इस दौरान पूरे भारत में 1300 से अधिक गुरिल्ला कार्रवाई की। इसके माध्यम से पांच साल में 429 जवान शहीद हो गए। 966 जवान घायल हुए। इस दौरान 40 लोगों को माओवादियों ने मारा। 409 जन सामान्य की भी नृशंस हत्या कर दी गई। इनमें से ज्यादातर आदिवासी समाज के लोग हैं। 300 जगहों पर संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। एक साल में माओवादियों ने 200 बार दहशत फैलाई। इन घटनाओं में 31 जवान शहीद हुए। 154 जवान घायल हुए। 69 सामान्य लोगों को मार दिया गया। माओवाद की समस्या को आप इसी से समझ सकते हैं कि छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले का आमाबेड़ा क्षेत्र जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर है। इस क्षेत्र में आज भी ऐसे गांव हैं, जहां के लोग हिंदी बोलना तो दूर छत्तीसगढ़ी भी नहीं बोल पाते। ऐसे में यह लोग अधिकारियों से अपने दर्द को कैसे बयां कर सकते हैं। ऐसे कई गांव हैं, जहां पर प्रशासन को पहुंचने में 12 से 15 घंटे लग जाते हैं। यहां सिर्फ किसी तरह साइकिल या बाइक ही जा सकती है। अधिकारियों की अकेले जाने की हिम्मत नहीं होती। यदि पूरी फोर्स वहां पहुंचती है तो हर कदम पर खतरा मंडरा रहा होता है।

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    यहां पुलिस और माओवादियों में अंतर यह होता है कि माओवादियों के सचिव स्तर के पदाधिकारी के लिए अनिवार्य योग्यता ही चार भाषाओं का ज्ञान होना होती है। जिस क्षेत्र में उसकी नियुक्ति है, उस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के साथ ही हिंदी और अंग्रेजी की जानकारी भी चाहिए। स्थानीय भाषा के जानकार होने से यह लोग स्थानीय लोगों के साथ आसानी से घुल-मिल जाते हैं। वहीं पुलिस को लोगों का दर्द समझने के लिए दुभाषिया की जरूरत होती। ऐसे में सवाल यह है कि पुलिस स्थानीय लोगों के साथ कैसे घुल-मिल सकती है।

    यह कहा जाता है कि जो दिखता है, वह हमेशा सच नहीं होता। यह बात माओवादी क्षेत्रों में सच साबित होती है। यही कारण है कि बाहर से उस क्षेत्र में जाकर खबर देने वाले पत्रकार भी कभी हकीकत को ठीक से उजागर नहीं कर पाते। इसका कारण है कि उनकी रिपोर्ट स्थानीय लोगों से बातचीत पर आधारित पर होती है। आप सोच सकते हैं कि जो (स्थानीय बाशिंदे) बंदूक की नाल पर हमेशा सांस ले रहा हो, वह कैसे सच बता सकता है। हकीकत यह होती है कि बाहर से जाने वाले पत्रकारों से बातचीत के समय 10 स्थानीय लोगों के बीच एक माओवादी जरूर होता है।

    उदाहरण के तौर पर आप उनसे पूछिये, क्या इस बीच माओवादी इस क्षेत्र में देखे गए हैं। उनका यही जवाब होता है, वर्षों से देखे नहीं गए, जबकि हकीकत है कि उस क्षेत्र में माओवादी रोज आते-जाते हैं। माओवादी क्षेत्र में रहने वाले लोगों के सामने एक तरफ खाई तो दूसरी तरफ पहाड़ है। दोनों के बीच हमेशा उनकी जिंदगी खतरे में पड़ी रहती है। यदि एक पुलिस वाला उनसे बात कर लेता है तो शक में माओवादी उन्हें मौत के घाट उतार देते हैं। कहते हैं, यह पुलिस का मुखबिर था। इधर पुलिस उन्हें हमेशा शक के दायरे में रखती है कि यह जनताना सरकार का सदस्य होगा और कई बार यह हकीकत भी होती है कि उन्हीं आम आदमियों के बीच माओवादियों का मुखबिर भी छिपा होता है, जिसे उस गांव के लोग भी नहीं जानते।

    इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक बार मैं छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में माओवादियों से प्रभावित सीतरम इलाके में गया था। वहां जाने के लिए एक नदी को पार करना पड़ा। नदी पार करते ही माओवादियों के स्मारक दिखने लगे। मैं चारों तरफ से घिर गया। इसके बाद मैंने अखबार से बताया तो कुछ राहत मिली। कई लोगों से बातचीत की। एक व्यक्ति ने कहा कि यहां माओवादियों की गतिविधियां लंबे समय से शून्य हैं। और यह बातचीत के ठीक तीन दिन बाद पुलिस मुठभेड़ में मारा गया। यदि आतंकवादियों और माओवादियों की तुलना करें तो माओवादी ज्यादा घातक हैं। आतंकवादी तो पहचान में आ जाएंगे, क्योंकि वे हमेशा आमने-सामने की लड़ाई करते हैं, जबकि माओवादी हमेशा कायरों की भांति छुपकर गुरिल्ला युद्ध करते हैं। जब अकेले पाते हैं तो पीठ में छुरा भोंक कर चले जाते हैं। माओवादियों की पहचान करनी बहुत मुश्किल है। इस कारण इनसे लड़ाई इन्हीं की भाषा में ही की जा सकती है।

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