डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
इस समय गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव परिणाम से बड़े बड़े निष्कर्ष निकाले जा रहे है। ऐसा लग रहा है कि विपक्ष को अभी से केंद्र में शपथ ग्रहण की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। यदि उपचुनाव का ट्रेंड आमचुनाव में चलता, तो आज उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार होनी चाहिए थी। इसके पहले बसपा सरकार के समय वही उपचुनाव जीतती थी। इस हिसाब से बसपा की जगह सपा को बहुमत नहीं मिलना चाहिए था। विपक्ष के नेता उपचुनाव को ही सब कुछ मान बैठे है। यह बेतुका है। आम चुनाव में नेतृत्व का मुद्दा भी प्रमुख होगा। इस मुद्दे पर फिलहाल भाजपा बहुत मजबूत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकप्रियता में विपक्षी नेताओं से बहुत आगे है। यह मुद्दा गोरखपुर और फूलपुर की भी तस्वीर एक वर्ष बाद बदल देगा।
फूलपुर, गोरखपुर का चुनाव बहुत सामान्य है। योगी सरकार इन पर विशेष मेहरबानी करती तो लोग उत्साह के साथ वोट देने निकलते। कुछ तो है कि मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के क्षेत्र के लोग कुछ अलग रुतबा चाहते है। यहां तक कि बिजली के मामले में बिजली मंत्री का इलाका भी जगमगा जाता है।
योगी ने जो पूरे प्रदेश को एक व्यवहार और व्यवस्था में रखा है, उसका प्रभाव एक वर्ष बाद आमचुनाव में दिखाई देगा। तब भाजपा लाभ की स्थिति में रहेगी।
परंपरा का निर्वाह करते हुए योगी सरकार ने गोरखपुर और फूलपुर को वीआईपी दर्जा दिया होता शायद चुनाव परिणाम अलग होते। लेकिन योगी ने पूरे प्रदेश के साथ न्याय किया। पराजय के बाद भी उन्हें इस बात का आत्मसंतोष होना चाहिए। यही संविधान के अनुकूल आचरण है, यही राजधर्म है। मुख्यमन्त्री या उपमुख्यमंत्री के लिए एक चुनाव क्षेत्र मात्र ही विशिष्ट नहीं हो सकता। जब वह उस क्षेत्र को सामान्य से ज्यादा बिजली देता है, सामान्य से ज्यादा धन देता है, तब इसका मतलब होता है कि वह किसी अन्य क्षेत्र से कटौती कर रहा होता है। इसके बिना किसी क्षेत्र विशेष को वीआईपी दर्जा दिया भी नहीं जा सकता। ऐसा करना कोई नई बात भी नहीं थी। लेकिन योगी ने गलत व्यवस्था को बदला है। धीरे धीरे प्रदेश की जनता इसे समझेगी।







