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    वंदे मातरम : 150 वर्ष बाद भी जीवंत, पर अभी पूरी तरह जीया नहीं गया

    ShagunBy ShagunDecember 9, 2025 Current Issues No Comments3 Mins Read
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    लोकसभा में “वंदे मातरम” के 150 वर्ष पूरे होने पर हुई विशेष चर्चा ने देश के सामने एक बार फिर उस गीत को रख दिया जिसने कभी लाखों भारतीयों के खून में उबाल ला दिया था। 1875 के आसपास जब बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने कागज पर ये पंक्तियाँ उतारी थीं, तब शायद वे भी नहीं जानते थे कि उनकी रचना आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी प्रेरणा बन जाएगी। 1896 में “आनंदमठ” के साथ जब यह गीत सार्वजनिक हुआ, तो बंगाल से लेकर पूरे देश में यह स्वतंत्रता की ललकार बन गया। अंग्रेजों ने इसे इतना खतरनाक समझा कि इसके गायन पर प्रतिबंध लगा दिया। जेलों में कैदी इसे गाते थे, सड़कों पर प्रदर्शनकारी इसे गाते थे, और फाँसी के तख्ते पर चढ़ते क्रांतिकारी भी होंठों पर यही धुन लिए जाते थे।

    आज 150 साल बाद भी जब यह गीत संसद में गूँजा, तो हर भारतीय के सीने में गर्व की लहर दौड़ गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक ही कहा कि यह गीत केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की भावनात्मक धुरी था। महात्मा गांधी इसे इतना प्रिय मानते थे कि वे चाहते थे कि यह हमारा राष्ट्रीय गान बने। रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे सर्वप्रथम 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में गाया था। स्वतंत्रता आंदोलन के हर बड़े आंदोलन, चाहे वह नमक सत्याग्रह हो या भारत छोड़ो आंदोलन, में यह गीत अनुगूँज बना रहा।

    लेकिन 150 वर्ष का यह अवसर केवल इतिहास की स्मृति तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह हमारे लिए आत्म-मंथन का भी समय है। हमने इस गीत को बहुत गाया है, बहुत सम्मान दिया है, पर क्या हम इसे उतनी ही गंभीरता से जी भी रहे हैं? समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने जब कहा कि “वंदे मातरम सिर्फ गाने के लिए नहीं है, इसे निभाना भी चाहिए”, तो उन्होंने एक कड़वा पर जरूरी सच कहा। देशप्रेम की असली परीक्षा तब होती है जब हम अपनी नदियों को साफ रखने में असफल हो जाते हैं, जब सीमा पर जवान शहीद होता है और हम सोशल मीडिया पर दो मिनट का मौन रखकर आगे बढ़ जाते हैं, जब गरीब का बच्चा अच्छी शिक्षा से वंचित रह जाता है, जब भ्रष्टाचार और क्षेत्रीयता के नाम पर देश को बाँटने की कोशिशें होती हैं। तब “वंदे मातरम” की पुकार कहाँ चली जाती है?

    यह गीत मातृभूमि की पूजा का आह्वान करता है। माँ की सेवा, माँ की रक्षा, माँ के दुख-दर्द में साथ खड़ा होना, यही इसकी मूल भावना है। जब हम प्लास्टिक से नदियों को मारते हैं, जब हम अपने ही देशवासियों के बीच धर्म, जाति और भाषा के नाम पर दीवारें खड़ी करते हैं, तो हम बंकिम बाबू के उस सपने का अपमान करते हैं। वंदे मातरम का अर्थ है, भारत माता की जय, पर भारत माता तो उन करोड़ों लोगों में बसती हैं जिनके पास आज भी दो वक्त की रोटी पूरी नहीं होती, जिनकी बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं, जिनके बेटे रोजगार के लिए भटक रहे हैं। उनकी सेवा ही सच्चा वंदे मातरम है।

    150 साल का यह पर्व हमें सिर्फ गर्व करने का नहीं, सुधरने का भी अवसर देता है। हमें यह संकल्प लेना होगा कि अब हम इस गीत को सिर्फ आधार बनाकर नहीं गाएँगे, बल्कि इसे अपने आचरण में उतारेंगे। हर उस काम में, जो देश को मजबूत, समृद्ध और एकजुट बनाता हो, वहीं सच्चा वंदे मातरम होगा।

    बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा था
    सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
    शस्यशामलां मातरम्।

    आज हमें यह वादा करना है कि हम अपनी मातृभूमि को सचमुच सुजला-सुफला, स्वच्छ, समृद्ध और शांतिमय बनाएँगे।
    तभी 150 साल का यह उत्सव सार्थक होगा।
    तभी हम सच्चे अर्थों में कह सकेंगे, वंदे मातरम!

    Shagun

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