भारतीय शादियां हमेशा से उत्सव का पर्याय रही हैं जिसमें रंग, रौनक, रिश्ते और खुशियां। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ये उत्सव एक नए रूप में बदलते नजर आ रहे हैं। शहर के मैरिज हॉल्स की जगह अब दूर-दराज के लग्जरी रिसॉर्ट्स ले रहे हैं। शादी से दो-तीन दिन पहले पूरा परिवार रिसॉर्ट में शिफ्ट हो जाता है, मेहमान सीधे वहीं पहुंचते हैं और वहीं से विदा होते हैं। यह ट्रेंड इतना तेजी से बढ़ा है कि 2025 में शहरी शादियों में करीब 25-30% डेस्टिनेशन वेडिंग्स हो रही हैं। जैसे राजस्थान के पैलेस, गोवा के बीच रिसॉर्ट्स या उदयपुर की झीलों के किनारे या अन्य राज्यों के क्रीम रिसॉर्ट।
लेकिन क्या यह सिर्फ खुशी का इजहार है या एक नई सामाजिक बीमारी का संकेत? कई लोग इसे दिखावे की होड़ मानते हैं। रिसॉर्ट बुकिंग के लिए लाखों-करोड़ों खर्च होते हैं। औसत डेस्टिनेशन वेडिंग का खर्च 2025 में 25 लाख से 1.5 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है – वेन्यू, डेकोर, कोरियोग्राफर, प्री-वेडिंग शूट और थीम्ड इवेंट्स के साथ। मेहंदी के लिए ग्रीन ड्रेस कोड, हल्दी के लिए यलो थीम, लेडीज संगीत में प्रोफेशनल डांस ट्रेनिंग, सब अनिवार्य हो गए हैं। जो नहीं मानता, उसे ‘लोअर कैटेगरी’ का समझा जाता है। निमंत्रण भी अब कैटेगरी में बंट गए: कुछ को सिर्फ संगीत, कुछ को रिसेप्शन, कुछ को कॉकटेल और VIP को सब कुछ।

इसमें अपनापन कहां खो गया? दूर से आए रिश्तेदार अलग-अलग रूम्स में कैद रहते हैं, मिलना-जुलना मोबाइल पर रस्म अदायगी तक सीमित। स्टेज पर धुआं, फायरवर्क्स, स्लो-मोशन वरमाला और प्री-वेडिंग वीडियो यह सब फिल्मी स्टाइल में। लेकिन इन वीडियोज में दिखने वाली बोल्ड लोकेशंस और कपड़े परिवार की इज्जत पर सवाल उठाते हैं। बारात में हजारों उड़ाने वाले पंडित को दक्षिणा पर घंटों मोलभाव करते हैं।
यह ट्रेंड अमीर वर्ग से शुरू हुआ, लेकिन अब मध्यम वर्ग तक पहुंच रहा है। कई परिवार कर्ज लेकर दिखावा करते हैं, जीवन भर की कमाई 4-5 घंटे के रिसेप्शन में लगा देते हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि शादी पर खर्च शिक्षा से दोगुना हो गया है, कई घरों में पर्सनल लोन सिर्फ शादी के लिए लिए जाते हैं। यह सामाजिक दबाव है कि “लोग क्या कहेंगे?” की वजह से। बॉलीवुड और सोशल मीडिया ने इसे और बढ़ावा दिया।

हालांकि कुछ सकारात्मक बदलाव भी हैं। 2025 में सस्टेनेबल वेडिंग्स ट्रेंड में हैं इको-फ्रेंडली डेकोर, लोकल फूड, कम वेस्ट। माइक्रो-लग्जरी वेडिंग्स बढ़ रही हैं, जहां कम मेहमान लेकिन ज्यादा पर्सनल टच। आउटडोर, नेचर-इंस्पायर्ड सेरेमनीज पॉपुलर हैं।
फिर भी, सवाल यह है कि शादी खुशी का मौका है या स्टेटस सिंबल? मध्यम वर्ग से अपील है कि यह सब अपनी क्षमता के अनुसार खुशियां मनाएं। दिखावे की इस होड़ में कर्ज लेकर परिवार का भविष्य खतरे में न डालें। अभिजात्य वर्ग तक इसे सीमित रखें। दांपत्य जीवन स्वाभिमान और सादगी से शुरू करें, तो ज्यादा सार्थक होगा। आखिर, शादी रिश्तों की होती है, दिखावे की नहीं।
यह बीमारी अगर नहीं रुकी, तो आने वाली पीढ़ियां इसका बोझ उठाएंगी। समय है सोचने का, सादगी में ही असली खुशी है।







