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    गद्दारी, दलाली, जालसाज़ी और घोटोलेबाज़ी में क्यों सिमट रही पत्रकारिता !

    ShagunBy ShagunSeptember 20, 2020 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    नवेद शिकोह

    मातृभूमि भारत माता की तरह पत्रकारिता का पेशा भी मां जैसा है। दुर्भाग्य कि इस मां का हर रोज़ बलात्कार होता है। पत्रकारिता के पेशेवर ही ऐसे बलात्कार को अंजाम देते हैं।

    करीब हर रोज़ पत्रकारों की गिरफ्तारी की खबरें आती हैं। कभी-छुटपुट मामले होते हैं तो कभी बेहद संगीन। बीते शनिवार को एक बड़ा खबरनवीस ही सबसे बड़ी खबर बना । ये देश के साथ गद्दारी करते हुए दुश्मन देश चीन के लिए भारत की जासूसी करता था। राजीव शर्मा नाम का ये सहाफी राष्ट्रद्रोह के संगीन मामले में दिल्ली में गिरफ्तार हुआ।

    बीते शनिवार को ही यूपी के पशुपालन घोटाले और जालसाज़ी में संतोष मिश्रा नाम का जर्नलिस्ट गिरफ्तार हुआ। लगातार संगीन अपराधों में पकड़े जा रहे ऐसे पत्रकारों को फर्जी या कथित पत्रकार कह कर अपने पेशे का दामन नहीं बचाया जा सकता। गिरफ्तार होने वाले ज्यादातर पेशेवर और स्थापित पत्रकार होते हैं। बड़े-बड़े पब्लिकेशन इन्हें छापते हैं। बड़े न्यूज़ चैनलों से इनका रिश्ता है। सरकारों ने जिन्हें बड़ा, मुकम्मल और पेशेवर पत्रकार होने की प्रेस मान्यता दी थी ऐसे पत्रकार भी गैर कानूनी कृत्यों में पकड़े जा रहे हैं।

    लोकतंत्र का चौथा खंभा क्यों दरक रहा है। इधर कुछ वर्षों से ये पेशा कुछ ज्यादा ही बदनाम क्यों हो रहा है !

    इस पर उतनी फिक्र नहीं हो रही है जितनी होना चाहिए है। मीडिया सिर्फ सूचना पंहुचाने का पेशा ही नहीं सामाजिक खामियों पर विमर्श करना मीडियाकर्मीं का दायित्व है।
    लेकिन दुर्भाग्य कि बुद्धिजीवी मीडियाकर्मी अपने पेशे में पनपती गंदगी पर ही ना ज्यादा चिंतन कर रहे है और ना विमर्श।

    इस गंभीर विषय पर मेरा अपना विचार है कि लिखने-पढ़ने वाले पत्रकार जो इमानदारी से पत्रकारिता करना चाहते हैं उन्हें भी गलत कामों का सहारा लेने पर मजबूर होना पड़ता होगा !
    ऐसा क्यों ! इसकी तमाम वजहों में सबसे बड़ी वजह ये है कि इमानदारी से खबर या लेख लिखने वाले पत्रकारों को अक्सर नौकरी या स्वतंत्र पत्रकारिता में पेट भरने के भी दाम ही नहीं मिलते।
    एक हजार में सौ ही लिखने-पढ़ने वाले वास्तविक पत्रकार हैं।

    इन सौ में दस पत्रकारिता कर तनख्वाह हासिल कर रहे है। बाकी नब्बे वास्तविक पत्रकार भी काम के लिए भटकते रहते हैं।

    फील्ड से खबर लाने, लिखने, रिसर्च, इनवेसटीगेशन, लेख, विश्लेषण, बाइट कलेक्शन, एसाइनमेंट, डेस्क, इनपुट, आउटपुट.. जैसे खालिस पत्रकारिता के लिए दस प्रतिशत पत्रकारों की खपत हो पा रही है। बाकी नब्बे प्रतिशत को मीडिया हाउस लाइज़निंग करने की शर्त लगाकर ही काम पर रखते हैं। ये अपनी कंपनी के तमाम कामों की दलाली का काम मुख्य रूप से करते हैं। विज्ञापन और दूसरे आर्थिक लाभों के लिए इन्हें सरकारों/अधिकारियों की चाटूकारिता या ब्लैकमेलिंग के लिए भी लगाया जाता है।

    ऐसा काम भी ना मिले और इमानदारी से पत्रकारिता करने की नौकरी भी बीच में चली जाये तो पेशेवर पत्रकार क्या करे !!!

    दूसरा कोई काम ना मिलेगा और ना ही दूसरा काम जानता है पत्रकार। ऐसे में कभी कभी मजबूर होकर भी पत्रकारिता से दलाली पर उतरना पड़ता है।

    बेरोजगार पत्रकारों के पास छोटे अखबार का पब्लिकेशन शुरू करना एक बेहतर विकल्प होता है। डीएवीपी और सूचीबद्ध होने के बाद कम और सीमित संसाधनों में पत्र/पत्रिकाओं को इतना सरकारी विज्ञापन मिल जाता है कि एक सामान्य वर्ग के परिवार की जीविका चल जाये।

    लेकिन पत्र/पत्रिकाओं के प्रकाशन के पेशे में भी विज्ञापन माफियाओं ने कब्जा कर लिया। ऐसे में ये विज्ञापन माफिया पत्रकार नेता बनकर या हर सत्तारूढ़ पार्टी के हितैषी बनकर अथवा घूस के दम पर फाइल कॉपी अखबारों/पत्रिकाओं में करोड़ों रुपए का विज्ञापन हड़प लेते हैं। और जो खाटी पत्रकार बेरोजगारी की मजबूरी में पत्रकारिता के विकल्प के तौर पर कम संसाधन में पत्र/पत्रिका का प्रकाशन करके जीविका चलाना चाहते हैं उन्हें सामान्य विज्ञापन मिलना भी मुश्किल हो जाता है।

    स्वतंत्र पत्रकारों का बुरा हाल है। पत्रकारों की भीड़ में नब्बे प्रतिशत पत्रकार केवल प्रेस कार्ड के सहारे ही पत्रकार कहलाये जाते हैं। इनको खबर लिखना-पढ़ना से कोई मतलब नहीं। मतलब ये तथाकथित, फर्जी या फट्टर पत्रकार होते हैं। पत्रकार का मुखौटा लगाकर विज्ञापन, डग्गामारी, मुखबिरी और छोटी-बड़ी दलाली से ये जीविका चलाते हैं।

    लेकिन स्वतंत्र पत्रकार बिना छपे या बिना दिखे प्रेस कार्ड के बूते पर अपने को पत्रकार कह ही नहीं सकता है। स्वतंत्र पत्रकार लगातार लिखता रहता है।

    अखबार, पत्रिकाएं, वेबसाइट और न्यूज एजेंसियां स्वतंत्र पत्रकारों के लेख/विश्लेषण/खबर छापते हैं। उपयोग करते हैं। रीडरशिप/प्रसार/रैंकिंग/हिट्स हासिल करते हैं। ये स्वतंत्र पत्रकारों के कलम पर निर्भर हैं। लेकिन दुर्भाग्य कि बड़े से बड़े और मझोले नब्बे प्रतिशत मीडिया ग्रुप्स इन स्वतंत्र पत्रकारों को पेमेंट नहीं करते। अब ये खाटी पत्रकार क्या करें !

    इन्हे तो दलाली और लाइजनिंग भी नहीं आती। हर स्वतंत्र पत्रकार किसी पार्टी के पक्ष में या एजेंडे पर एकतरफा पेड लेख नहीं लिख सकता।

    हर स्वतंत्र पत्रकार तो राजीव शर्मा की तरह देश के साथ गद्दारी भी नहीं कर सकता।
    मीडिया की नौकरियां जा रही हैं और स्वतंत्र पत्रकार बढ़ रहे हैं। वास्तविक स्वतंत्र पत्रकारों की जीविका के बारे में सरकार को गंभीर होना होगा। जिस तरह अखबारो़ की सब्सिडी/आर्थिक सहायता/सहयोग के तौर पर हजारों अखबारों को अरबों रुपये का विज्ञापन दिया जाता है वैसे ही पत्रकारों के संरक्षण के लिए स्वतंत्र पत्रकारों के कलम को सीधा दाम मिले, इसके लिए सरकारों को कोई क़दम उठाना चाहिए है।

    Shagun

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