वर्षाकाले श्रावण मासे तीज प्रसंगे : शिव आराधना: अस्मुरारी नंदन मिश्र
किशोरियाँ और कुमारी युवतियाँ पति-कामना से शिव की उपासना करती हैं। सोलह सोमवारी का व्रत। पति-कामना का यह व्रत क्या प्रश्नोत्सुक नहीं करता? पति की कामना आखिर शिव से ही क्यों?
कहानी पार्वती के तप-व्रत तक ले जाती है। पार्वती ने पति की कामना से किया था, इसलिए कुमारिकाएँ उनका अनुसरण करती हैं। मुझे पार्वती का तप याद आ जाता है। कितना कठिन था वह? कंद-मूल से होते हुए, पत्तों का आहार ग्रहण किया जाता है और अंततः वह भी छोड़ दिया जाता है- अपर्ण-अशना।
वैसे मैं पार्वती के तप को दो अलग दृष्टियों से देखना चाहता हूँ। एक तो प्रचलित है ही कि शिव को प्रसन्न करने के लिए; दूसरी मुझे लगता है कि पिता के सामने अपनी हठ लेकर बैठ जाना है। हिमवान् भी कहाँ चाहते हैं कि उनका जामाता शिव हो? नारद से सबकुछ सुनकर भी वे तो विष्णु को ही कन्या देना चाहते हैं। क्या पिता के सामने पुत्री ने हठ में खाना-पीना छोड़ दिया था? इस अर्थ में भी पार्वती के प्रेम की उत्कटता ही सामने आती है।
खैर, हम तो प्रचलित कथा ही लेकर चलें। मैं सोच रहा था, आशुतोष कहलाने वाले शिव पति-कामना की तपस्विनियों के लिए कतई आशुतोष नहीं हैं। बहुत कड़ी परीक्षा के बाद ही प्रसन्न हुए। ऐसे देव से पति की माँग कठिन नहीं है क्या? सोलह सोमवारी करने के बाद भी प्रसन्न हों कि न हों? उनसे तो बेहतर कृष्ण हैं रुक्मिणी ने एक पत्र लिख दिया और हर ले गये और अर्जुन-सुभद्रा को फटाफट मिला दिया। उनसे ही प्रार्थना कर ली जाती।

लेकिन नहीं। स्त्रियाँ केवल पति नहीं चाहतीं। शिव-रूप पति चाहती हैं। यह अकारण नहीं है कि शोना-बाबू के इस दौर के पहले पत्नियाँ प्यार से अपने पति को भोले-भंडारी कहना सबसे अधिक पसंद करती थी। गानेवाली तो ‘मेरे रोम-रोम में बसनेवाले राम’ भी रही होंगी, लेकिन राम के साथ निभाना कठिन है। उसपर भी उनकी मर्यादा के सामने अपनी सत्ता को समर्पित कर देना होता है। ‘सुनो कनु सुनो’ प्रेमी को कहने में तो अच्छा लगता है, पति को नहीं। पति तो भोले-भंडारी ही चाहिए।
भोले-भंडारी होने में एक दोस्ताना संबंध है। इसे छेड़ा जा सकता है, चिढ़ाया जा सकता है, जरा-सी जिद में अपने अनुरूप बनाया जा सकता है और इस भोलेपन पर कुर्बान हुआ जा सकता है। पति के रूप में सती के साथ शिव के संबंध को तो हमने देखा ही, वहाँ स्वयं यज्ञ में शामिल नहीं होना चाहते, लेकिन पत्नी पर कोई विशेष दबाव नहीं है और एक बार चली गयी, तो नाराज़ नहीं हो गये कि ‘गयी है, तो जाने दो।’ पूरा ध्यान रखते हैं। पार्वती के संबंध में भी वही खुलापन है। अनेक ऐसी कहानियाँ प्रचलित हैं, जिनमें पार्वती कोई जिद ठान देती हैं। पहले तो वे मना कर देते हैं, लेकिन फिर अपने मन की करने देते हैं, सहयोग भी करते हैं। पार्वती अपने मन का करके सीखती हैं। ऐसा तो भोले-भंडारी ही कर सकते हैं।
तो स्त्रियों के लिए शिव केवल उत्तेजक-सौंदर्य के केंद्र नहीं रहे, आह्लाद और समर्पण के भी केंद्र रहे। शुभ्रा सिंह की बात इस मामले में मानीखेज है कि “शिव संदर्भ में स्त्री होना गर्व देता है। कोई शिव होने की सोचे भर तो हम स्त्रियाँ मन प्राण से सर्वस्व समर्पण कर देना चाहें।” हर पुरुष चाहता है कि उसे उसकी यथार्थ स्थिति के पर भी समर्पित होने वाली पत्नी मिले। इसके लिए पुरुषों को शिव का पति-रूप ग्रहण करना चाहिए। उन्हें शिव से सीखना चाहिए।
सीखने के लिए भी मैं नहीं कह रहा, शुभ्रा सिंह ही कह रही हैं।
(यह पोस्ट तो पिछले की तरंग के रूप में लिखाता चला गया। शिव अभी लंबे जाएँगे। क्या पता मुझसे भी सोलह पोस्ट का व्रत करवा लें।)







