जब तलक ‘मैं’ का गिला है, भेद सब इंसान में।
फर्क़ की दीवार सी है जिंदगी के मैदान में।।
तू अलग, मैं भी अलग, यह वहम है पहचान का।
रंग इतने क्यों सजे हैं काँच के सामान में?
पर जहाँ सब मिट गया, जब कुछ नहीं तो कुछ नहीं।
बाक़ी बस ख़ामोशियाँ हैं शून्य के दहलान में।।
ना तेरा दाव-ए-अनुकूल, ना मेरा कोई दावा रहा।
मिट गई हस्ती हवा की, मिल गई तूफ़ान में।।
जब न तुम बाक़ी रहे, और हम भी अब बाक़ी नहीं।
कौन ढूँढेगा फ़ासले इस बिना मकाँ के ज़हान में?
एक ही शिल्पी का धागा, एक ही साज़-ए-वजूद।
सब पिरोए हैं उसी मालिक के एक परिधान में।।
- राहुल कुमार गुप्ता







