दोस्त
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इस ज़माने में
दोस्ती
ले – दे के बची है थोड़ी-बहुत
तो फेसबुक, वाट्सप्प या इंस्टाग्राम
या ऐसे ही किन्हीं ऐपों पर
जब दोस्त से मिलना होता है
तो तैयार नहीं होना होता
कहीं जाना नहीं होता
ऑनलाइन होना होता है
फिर भी कोई भरोसा नहीं होता है
कई बार तो
जिसे दोस्त समझकर कर रहे होते हैं बात
वह दोस्त नहीं होता
बस दोस्त की आईडी होती है
दोस्त से दोस्त कोई मदद नहीं मांगता
जब तक हैक न हो गयी हो आईडी
जब मदद की आती है पुकार
तो भरोसा नहीं होता
भरोसा इस ज़माने में यही
कि कोई किसी का नहीं होता!
दोस्ती एक अंगुली दबाते
टूट जाती है
एक अंगुली से होती है ब्लॉक
फिर खोजने पर भी दोस्त नहीं दिखता
वह सबको दिखता हो तो
दिखता हो
दोस्त से बिछुड़ने पर दोस्त को
वह कहीं नहीं दिखता!
– हरे प्रकाश उपाध्याय







