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    Home»साहित्य

    ईश्वर असहाय या हमारी समझ? आहत भावनाओं की नई थ्योरी

    ShagunBy ShagunAugust 5, 2026 साहित्य No Comments6 Mins Read
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    Is God helpless, or is it our understanding? A new theory of hurt sentiments.
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    ..अंसार मियाँ ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, “पर प्रोफेसर साहब, धर्म की हिफ़ाज़त करना भी तो हमारा फर्ज है ना?”
    प्रोफेसर साहब ने काका और मियाँ दोनों की तरफ़ देखा और बेहद संजीदा आवाज़ में बोले, “अंसार मियाँ, हज़रत मोहम्मद साहब ने धैर्य और क्षमा को सबसे बड़ा ईमान बताया था…

    rahul guptaकहानी : राहुल कुमार गुप्ता

    मोहल्ले के चौराहे पर ‘नेताजी टी-स्टॉल’ सिर्फ चाय की दुकान नहीं थी, वह इस पूरे इलाके का अनधिकृत सुप्रीम कोर्ट थी। वहाँ बिछी बेंच पर बैठना, मानो देश और समाज की दशा-दिशा तय करने के लाइसेंस जैसा था। शाम के छह बज रहे थे। बेंच के एक कोने पर रामदीन काका जम चुके थे। रामदीन काका का धर्म से केवल इतना नाता था कि वे सुबह-सुबह तुलसीदास जी की पंक्तियाँ गुनगुनाते और अपनी छड़ी को अधर्म पर धर्म की विजय का एकमात्र जरिया मानते थे। उनके ठीक बगल में अंसार मियाँ विराजमान थे, जिनकी आस्था का आलम यह था कि चाय का कुल्हड़ हाथ में आते ही वे बिस्मिल्लाह कहे बिना पहला घूँट नहीं भरते थे।

    कहानी में मोड़ तब आया जब मोहल्ले का कॉलेज-छात्र बंटी रंग-बिरंगी टी-शर्ट पहने और कानों में लीड लगाए झूमता हुआ आया। बंटी की टी-शर्ट पर एक अजीब सा कार्टून बना था और नीचे लिखा था, “सोचना मना है!”

    रामदीन काका ने चश्मा नाक पर सरकाया और बंटी की टी-शर्ट को ऐसे घूरा मानो उसने कोई राष्ट्रद्रोह कर दिया हो। उन्होंने तुरंत अपनी छड़ी ज़मीन पर पटकी और गरज उठे, “अरे बंटी! यह क्या फुहड़पन पहन रखा है? इस टी-शर्ट के चित्र से हमारी हज़ारों साल पुरानी संस्कृति का घोर अपमान हुआ है! मेरी तो भावनाएँ इतनी आहत हो चुकी हैं कि सीने में दर्द उठने लगा है।”

    अभी रामदीन काका अपनी आहत भावनाओं पर हाथ रख ही रहे थे कि चौराहे पर लगी एक दुकान से फिल्मी गाना बज उठा। गाने के बोल में कुछ सूफियाना शब्द थे। अंसार मियाँ ने तुरंत अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा, चाय का कुल्हड़ मेज पर पटका और त्योरियाँ चढ़ाकर बोले, “अरे रामदीन भाई, आपकी भावना तो बाद में आहत होगी, यहाँ मेरा ईमान खतरे में पड़ गया! इन गानों में मुकद्दस शब्दों का इस्तेमाल करके हमारे मजहब की तौहीन की जा रही है। मेरी भावनाएँ तो इतनी चकनाचूर हो चुकी हैं कि अगर यह गाना बंद न हुआ तो मैं सड़कों पर जुलूस निकाल दूँगा!”

    दुकानदार कल्लू चायवाला, जो बरसों से इन दोनों को देख रहा था, कुल्हड़ में खौलती चाय ढालते हुए मुस्कुराया। उसने चुटकी लेते हुए कहा, “काका! और अंसार मियाँ! आप दोनों की भावनाएँ हैं या चीनी मिट्टी के कुल्हड़? ज़रा सी हवा लगी नहीं कि चटक गईं! आजकल तो देश में आहत होने का ऐसा बाज़ार सजा है कि बंदा सुबह उठता है, दाँत साफ़ करता है और सोचने लगता है, ‘आज मेरी भावना किस बात पर आहत होगी?'”

    तभी बेंच के बीच में बैठे प्रोफेसर साहब ने अपनी पुरानी किताब बंद की और चश्मा साफ़ करते हुए बोले, “कल्लू, तुम बात तो पते की कह रहे हो। पर ज़रा सोचो, इस आहत भावनाओं के सर्कस का असली रिंगमास्टर कौन है? इस खेल की डोरी तो राजनीति के हाथ में है।”

    रामदीन काका और अंसार मियाँ ने एक-दूसरे को देखा, फिर प्रोफेसर साहब की तरफ़ मुड़े। प्रोफेसर साहब ने बात आगे बढ़ाई, “जब सत्तापक्ष को लगता है कि जनता महँगाई, बेरोज़गारी या खस्ताहाल अस्पतालों पर सवाल पूछने वाली है, तो वह तुरंत अपने जादुई पिटारे से कोई पुराना प्रतीक, किसी फिल्म के परिधान का रंग या किसी ऐतिहासिक किरदार की बात निकाल लेता है। उनके प्रवक्ता टीवी पर आकर चिल्लाते हैं- ‘देश की अस्मिता आहत हो गई!’ और बेचारी जनता महँगाई का दर्द भूलकर आहत भावनाओं का मरहम ढूँढने निकल पड़ती है।”

    “और विपक्ष?” बंटी ने उत्सुकता से पूछा।

    “विपक्ष भी इस नाटक का उस्ताद कलाकार है बंटी!” प्रोफेसर साहब हँसे। “जैसे ही सत्तापक्ष अपनी आहत भावना का परचम लहराता है, विपक्ष तुरंत अपनी आहत भावनाओं का काउंटर-स्टॉल खोल लेता है। सरकार की किसी नीति या संसद के किसी शब्द पर विपक्ष की भावनाएँ इतनी तीव्रता से भड़कती हैं मानो पूरा लोकतंत्र उसी क्षण वेंटिलेटर पर चला गया हो। वे किसी ख़ास वर्ग या समुदाय के मसीहा बनकर मैदान में कूदते हैं और अपनी राजनीति की रोटी सेंकते हैं। सत्ता हो या विपक्ष, दोनों के पास आहत भावनाओं का अपना-अपना चुनावी स्वार्थ है, और आम जनता उस स्वार्थ की भट्ठी में जलने वाला लकड़ी का कोयला!”
    अंसार मियाँ ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, “पर प्रोफेसर साहब, धर्म की हिफ़ाज़त करना भी तो हमारा फर्ज है ना?”

    प्रोफेसर साहब ने काका और मियाँ दोनों की तरफ़ देखा और बेहद संजीदा आवाज़ में बोले, “अंसार मियाँ, हज़रत मोहम्मद साहब ने धैर्य और क्षमा को सबसे बड़ा ईमान बताया था। और रामदीन काका, श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में कहा था कि असली ज्ञानी वही है जो निंदा और स्तुति में समान रहे, जिसे कोई आघात विचलित न कर सके। तुलसीदास जी ने मानस में लिखा था- ‘सरल स्वभाव न मन कुटिलाई’। पर आज की राजनीति ने हमारे इसी सरल स्वभाव को छीनकर मन में कुटिलता और नफ़रत भर दी है।”

    प्रोफेसर साहब ने एक पल का विराम लिया, फिर आगे कहा, “ज़रा सोचिए, संत कबीर और बुल्ले शाह ने अपने दौर में पाखंड और कट्टरता पर करारे प्रहार किए थे। अगर कबीर आज के ज़माने में होते और कहते कि ‘पाहन पूजे हरि मिले’, तो क्या होता? आज के स्वार्थी ठेकेदार हर शाम उनके खिलाफ ‘भावना आहत’ होने की शिकायत दर्ज करा रहे होते और सोशल मीडिया पर उनका बहिष्कार कर रहे होते! क्या ईश्वर या अल्लाह इतने कमज़ोर हैं कि किसी के कपड़े, किसी के कार्टून या किसी के बयान से संकट में आ जाएँ?”

    चौराहे पर अचानक सन्नाटा छा गया। कल्लू चायवाले ने चूल्हा धीमा कर दिया था। रामदीन काका की छड़ी अब ज़मीन पर शांत पड़ी थी और अंसार मियाँ का हाथ दाढ़ी पर ठिठक गया था।

    बंटी ने अपनी टी-शर्ट की तरफ़ देखा और धीमे से बोला, “यानी हम लोग सिर्फ़ मोहरे हैं?”

    प्रोफेसर साहब ने अपनी किताब बैग में रखी और खड़े होते हुए बोले, “बिलकुल बंटी! ईश्वर या अल्लाह को हमारी काल्पनिक सुरक्षा की ज़रूरत नहीं है। ज़रूरत तो हमें अपनी बची-खुची इंसानियत को आहत होने से बचाने की है। राजनीति का यह ‘आहत उद्योग’ तब तक फलता-फूलता रहेगा, जब तक हम अपनी अक्ल गिरवी रखकर भावनाओं के नाम पर सड़कों पर उपद्रव करते रहेंगे। अगर आज भी हम इस प्रायोजित तमाशे को नहीं समझे, तो याद रखना, आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास में पढ़ेंगी कि एक दौर ऐसा भी था जब लोग भूखे पेट सोते थे, लेकिन अपनी आहत भावनाओं का पेट भरने के लिए एक-दूसरे का गला काटने को तैयार रहते थे।”

    प्रोफेसर साहब इतना कहकर चुपचाप आगे बढ़ गए। चौराहे की उस बेंच पर रामदीन काका और अंसार मियाँ चुपचाप बैठे थे। दोनों की चाय ठंडी हो चुकी थी, पर दोनों में से किसी ने भी कुल्हड़ को हाथ नहीं लगाया। उस शाम नुक्कड़ पर कोई आक्रोश नहीं था, केवल एक गहरा, चुभता हुआ सन्नाटा था- ऐसा सन्नाटा जो इंसानी ज़मीर के जागने पर ही पैदा होता है।

    Shagun

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