नीतू सिंह
भारतीय संगीत जगत में कुछ आवाजें ऐसी होती हैं जो सीधे रूह को छू जाती हैं। जब भी 90 के दशक के सुरीले और रूमानी दौर की बात होती है, तो एक नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है – अनुराधा पौडवाल। फिल्मी गानों की चमक-दमक से लेकर देश के हर घर के पूजाघर में गूंजने वाले भजनों तक, उनका सफर एक ऐसी कहानी है जिसमें सफलता की चमक भी है और अकेलेपन के अंधेरे भी।
‘एकलव्य’ साधना और किस्मत का अनोखा मोड़
27 अक्टूबर 1954 को कर्नाटक के कारवार के एक मराठी परिवार में जन्मीं अनुराधा जी का बचपन का नाम अलका नाडकर्णी था। संगीत की दुनिया में उनका प्रवेश किसी चमत्कार से कम नहीं था, क्योंकि उन्होंने शास्त्रीय संगीत की कोई औपचारिक तालीम नहीं ली थी। वे तो सुरों की देवी लता मंगेशकर को ही अपना ‘एकलव्य’ मानती थीं। लता जी के गाए गीतों को सुनकर और रियाज करके उन्होंने अपनी आवाज को तराशा था।
शुरुआत में उन्होंने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे दिग्गजों के लिए केवल गानों की ‘डबिंग’ (डब आर्टिस्ट) के रूप में काम शुरू किया। उनका हुनर ऐसा था कि खुद स्वर कोकिला लता मंगेशकर भी उनकी डबिंग की कला को देखकर हैरान रह गई थीं। महज 19 साल की उम्र में, साल 1973 में आई अमिताभ-जया बच्चन की फिल्म ‘अभिमान’ से उन्होंने जया बच्चन के किरदार के लिए एक संस्कृत श्लोक गाकर प्लेबैक सिंगिंग की दुनिया में कदम रखा। लेकिन असली तख्तापलट हुआ साल 1983 में, जब फिल्म ‘हीरो’ का गाना “तू मेरा जानू है, तू मेरा दिलबर है…” रिलीज हुआ। इस एक गाने ने उन्हें रातों-रात शोहरत के सातवें आसमान पर पहुंचा दिया।
जब गुलशन कुमार ने कहा: “मुझे एथिक्स मत सिखाओ!”
90 का दशक आते-आते अनुराधा पौडवाल टी-सीरीज और गुलशन कुमार के साथ मिलकर सफलता के शिखर पर थीं। गुलशन कुमार उन्हें देश की अगली लता मंगेशकर मानते थे। टी-सीरीज की ब्रांड वैल्यू बढ़ाने के लिए एक बड़ा फैसला लिया गया – अनुराधा जी ने घोषणा कर दी कि वे सिर्फ टी-सीरीज के लिए ही गाएंगी, किसी बाहरी बैनर के लिए नहीं। इस एक्सक्लूसिव कॉन्ट्रैक्ट ने इंडस्ट्री के बड़े-बड़े संगीतकारों को नाराज कर दिया और इसका सीधा फायदा अलका याग्निक, कविता कृष्णमूर्ति और साधना सरगम जैसी गायिकाओं को मिला।
लेकिन टी-सीरीज का काम करने का अंदाज जुदा था। एक बार फिल्म ‘दिल’ का एक गाना रिकॉर्ड होने के बाद गुलशन कुमार ने अनुराधा जी से उसे अपनी आवाज में दोबारा डब करने को कहा। जब अनुराधा जी ने नैतिक रूप से आपत्ति जताई कि “यह गाना पहले ही अलका याग्निक गा चुकी हैं, इसे दोबारा मुझसे गवाना एथिकल नहीं है” – तो गुलशन कुमार का दो-टूक जवाब आज भी इंडस्ट्री में मशहूर है:
“आप मुझे एथिक्स मत सिखाओ, मुझे अपनी कंपनी चलानी है। जब आप बाहर नहीं गा रहीं, तो हमारी जिम्मेदारी है कि हम आपकी आवाज प्रमोट करें।”
उस दौर में टी-सीरीज गानों के प्रचार के लिए केवल ऑडियो कैसेट्स तक सीमित नहीं था; वह वाशिंग पाउडर, सीलिंग फैन और पानी की बोतलों जैसे प्रोडक्ट्स पर भी अनुराधा पौडवाल, सोनू निगम और उदित नारायण की तस्वीरें छाप देता था! जब अनुराधा जी इस बात पर झिझकतीं, तो गुलशन कुमार हंसकर कहते, “जहां हमारा प्रोडक्ट जाएगा, वहां हमारे सिंगर्स का चेहरा दिखेगा।”
एक ऐसा फैसला जिसने सब बदल दिया
साल 1997 में गुलशन कुमार की दिनदहाड़े हत्या ने पूरी फिल्म इंडस्ट्री के साथ-साथ अनुराधा पौडवाल को अंदर तक तोड़ दिया। वे उनके सबसे बड़े मार्गदर्शक थे। इस सदमे के बाद उनका फिल्मी दुनिया से मोहभंग हो गया। उन्होंने खुद को पूरी तरह से भक्ति संगीत, मंत्रों और भजनों के लिए समर्पित कर दिया। फिल्मों से दूर होने पर उनका फिल्मी करियर तो प्रभावित हुआ, लेकिन वे हर भारतीय के दिल और पूजाघर में हमेशा के लिए अमर हो गईं।
सफलता के साये में गहरे निजी दर्द और संस्मरण
अनुराधा पौडवाल का निजी जीवन खुशियों से ज्यादा दुखों और संघर्षों की दास्तान रहा। उनकी शादी मशहूर संगीतकार अरुण पौडवाल (जो एसडी बर्मन के असिस्टेंट थे) से हुई थी। करियर को आगे बढ़ाने में अरुण जी ने उनका बहुत साथ दिया, लेकिन वैवाहिक जीवन की शुरुआत में ही उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा – उनकी पहली संतान (बेटी) ने जन्म के सिर्फ 25 दिनों के भीतर दम तोड़ दिया था। बाद में एक बेटा और बेटी हुए।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। साल 1991 में जब वे अपने करियर के सबसे पीक पर थीं, एक सड़क दुर्घटना ने उनके पति अरुण पौडवाल को उनसे हमेशा के लिए छीन लिया। पति के जाने के बाद उन्होंने कभी दूसरी शादी नहीं की और पिछले 35 सालों से वे अकेले ही जीवन बिता रही हैं।
दुखों का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा; 12 सितंबर 2020 को उनके 35 वर्षीय युवा बेटे आदित्य पौडवाल (जो खुद एक बेहतरीन संगीतकार और प्रोड्यूसर थे) का किडनी फेल होने के कारण निधन हो गया। एक मां के लिए अपने जवान बेटे को खोना असहनीय दर्द था। इन तमाम झंझावातों और अकेलेपन के बीच उन्होंने ईश्वर की भक्ति और अध्यात्म का दामन थामे रखा।
आज का जीवन और संगीत की विरासत
आज अनुराधा पौडवाल अपनी बेटी कविता पौडवाल (जो खुद एक बेहद प्रतिभाशाली गायिका हैं) के साथ रहती हैं। संगीत साधना के साथ-साथ वे कई सामाजिक और चैरिटी कार्यों से जुड़ी हैं, जहां वह गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करती हैं।
भले ही उन्होंने चकाचौंध भरी फिल्मी दुनिया से खुद को कोसों दूर कर लिया हो, लेकिन उनके गाए वह सदाबहार नगमे – खास तौर पर “तू मेरा जानू है, तू मेरा दिलबर है…” – आज भी हर पीढ़ी की जुबान पर अपनी सुरीली छाप छोड़े हुए हैं।






