सौरभ श्रीवास्तव
जब भी बालदिवस आता है, सरकारें और बच्चों के लिए काम करने वाली संस्थाएं बच्चों का बचपन लौटाने का दम भरती हैं। कुछ अभिभावक भी आत्मालोचन करते हैं। पर हकीकत यह है कि गांव हो या शहर, हर जगह बच्चों पर शिक्षा-व्यवस्था और उनके भविष्य की चिंताओं की भयावह छाया मंडराती रहती है। यह एक यातनादायी स्थिति है। बेशक संचार माध्यमों और सूचना तकनीक के तेजी से विकास के चलते बच्चों के सामने दुनिया हथेली पर रखी वस्तु की तरह हो गई है, पर इसने उनके जीवन में दुश्वारियां भी कम नहीं पैदा की हैं।
बच्चों को शिक्षा चाहिए, संस्कार चाहिए, स्वास्थ्य चाहिए, अच्छा वातावरण और परिवेश चाहिए, लेकिन इन सबके ऊपर उन्हें उनका बचपन चाहिए। कल जब वे बड़े होंगे तो बचपन को किस प्रकार याद करेंगे? उनकी स्मृति हमारी पीढ़ी के बचपन की स्मृति से कितनी भिन्न होगी! उसमें न अमराइयां होंगी, न कोयल की कूकें, न ताल-तलैया होंगी न खेल के मैदान में तितलियों के पीछे कुलाचें भरती संगी-साथियों की टोली। शहरों में तो बरामदों और बालकनियों में सिमट आया है खेल का मैदान। जमीन महंगी है।
खुले मैदान पार्कों या स्टेडियमों में तब्दील हो रहे हैं, या वहां अट्टालिकाएं खड़ी हो रही हैं। ज्यादातर स्कूलों में उनके लिए खेलने की जगह या तो नहीं है, या अपर्याप्त है। हो भी क्यों, उनका तो खेल का समय पढ़ाई-कोचिंग और ‘प्रोजेक्ट वर्क’ में सोखा जा रहा है। हंसना-खेलना बच्चों का सबसे बुनियादी हक है और इसी बदौलत हमारी दुनिया फिर भी रहने लायक बची है, लेकिन इसकी भी वंचना! बच्चे यह सब झेलते बड़े हो रहे हैं और फिर भी हंस रहे हैं, क्योंकि रोना-पछताना नहीं बन पाता उनका स्थायी भाव। वे जब भी देखेंगे, तो चाव और दिलचस्पी के साथ ही देखेंगे दुनिया के रंग, चाहे उन पर हमारी उम्मीदों और दमित आकांक्षाओं का कितना भी भार क्यों न हो! बच्चों की दुनिया का बड़ों की दुनिया में मिल जाना, पूरी तरह समाहित हो जाना एक दुर्घटना है जिसकी परिस्थिति वर्तमान सभ्यता ने तैयार ही है, जो किलकारियों को अट्टहासों में बदलने पर अमादा है।








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