Close Menu
Shagun News India
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Tuesday, May 26
    Shagun News IndiaShagun News India
    Subscribe
    • होम
    • इंडिया
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • राजस्थान
    • खेल
    • मनोरंजन
    • ब्लॉग
    • साहित्य
    • पिक्चर गैलरी
    • करियर
    • बिजनेस
    • बचपन
    • वीडियो
    • NewsVoir
    Shagun News India
    Home»ब्लॉग»Hot issue

    केवल प्रेम और न्याय से ही तोड़ा जा सकता है घृणा के जाल को

    ShagunBy ShagunMarch 27, 2026 Hot issue No Comments8 Mins Read
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Post Views: 1,049

    राम का विनय और उनका न्यायबोध ही वह शाश्वत प्रकाश है जो युद्ध के अँधेरे में भटकती मानवता को पहुंचा सकता है शांति के तट तक

    राहुल कुमार गुप्ता

    प्राचीन काल में वाल्मीकि और मध्य काल में संत तुलसीदास और अन्य भाषाओं के संत और कवियों ने समय समय पर मर्यादा पुरुषोत्तम राम जी के चरित को समाज के समक्ष रखा। यह चरित संसार में शांति और उन्नति का और धरा में ही स्वर्ग उतारने का एक सशक्त मार्ग है। आज के दौर में चरित को छोड़ धर्म, मजहब, वर्ग और उपवर्गों में बंटकर शाश्वत से हटकर अपने को खुद महान साबित करने के लिए जो होड़ मची है वो स्वार्थ की राजनीति के जन्म लेने के बाद और अधिक होती जा रही है। संत तुलसीदास जो स्वयं एक उच्च और प्रतिष्ठापित वर्ग से तत्कालीन प्रताड़ित थे, अवधी भाषा में रामचरित मानस लिखने को लेकर कितने बवाल किए गए ये इतिहास एक आईने के रूप में समाज के समक्ष होना चाहिए, कि उस कालखंड में या किसी भी कालखंड में ताकतवर वर्ग का ही बोलबाला रहा है। वो कोई नया बदलाव नहीं चाहते या कहें अपने मार्गों में किसी को नई मंजिल बनाते नहीं देख सकते।

    आज कुछ वर्गों के द्वारा संत तुलसीदास जो समानता के मनीषी रहे उन्हें एक जाति का नाम देकर उनके खिलाफ आज भी ज़हर उगला जाता है। उनके भावों और तत्कालीन समाज में प्रचलित भाषा और विशेषणों का उपयोग करना की ताकि जनसामान्य को उचित मर्यादा समझ में आ जाए इसलिए श्री रामदूत ने इन्हें इसी भाषा में रामचरित मानस को तैयार करने के लिए प्रेरित किया। यह रामचरित मानस आज के परिप्रेक्ष्य में पूरे विश्व की आवश्यकता है। इस राम चरित मानस में मानवता, नैतिकता और मर्यादाओं को तय किया गया है। वीरता और विनय दोनों में राम के लिए विशेष क्या था, रामचरित मानस को सही अर्थों में पढ़ने वाले बहुत सहज और सरल तरीके से समझ जाते हैं।

    आज के दौर में मर्यादा पुरुषोत्तम राम को समझने और जानने का कोई प्रयत्न नहीं कर रहा बस किसी न किसी बहाव में जनसामान्य और युवा चेतना भटक जाती है। आज के “जय श्री राम” और हमारे शाश्वत राम में बहुत भिन्नता है, विश्व को हमारे शाश्वत राम की ओर ही लौटना होगा ताकि विश्व में शांति स्थापित होने का मार्ग स्थापित हो सके।

    प्रभु श्री रामचंद्र जी का चरित भारतीय वांग्मय का वह उज्ज्वल अध्याय है, जहाँ शक्ति और शालीनता का ऐसा अद्‌भुत संगम मिलता है जो विश्व के किसी भी इतिहास के किसी भी नायक में मिलना विरल है। जब हम राम के व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हैं, तो अक्सर हमारी दृष्टि उनकी उस वीरता पर जाकर ठहर जाती है जिसने रावण जैसे त्रिलोक विजेता और अजेय दशानन का गर्व चूर्ण कर दिया था, किंतु राम की वास्तविक श्रेष्ठता केवल उनके कोदंड की टंकार में नहीं, बल्कि उस विनय में है जो उनके पुरुषार्थ को संस्कारित करती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने राम के इस कोमल स्वभाव का चित्रण करते हुए लिखा है, “शठ सन विनय कुटिल सन प्रीती, सहज कृपन सन सुंदर नीती।”

    अर्थात् मूर्ख से विनय और कुटिल से प्रीति करना व्यर्थ है, फिर भी राम ने पहले शांति और विनय का मार्ग चुना। राम की विनय और उनकी नैतिकता कोई दुर्बलता नहीं, बल्कि एक जागरूक सामर्थ्य है। वह उस महासागर की भाँति शांत है जिसकी सतह पर लहरें भले ही मंद हों, किंतु उसकी गहराई का पार पाना असंभव है। रामायण के प्रसंगों में राम का विनय उनके हर निर्णय की आधारशिला बनता है। जब वे विश्वामित्र के साथ ताड़का वध के लिए जाते हैं, तो वहाँ भी उनका शौर्य गुरु की आज्ञा के अधीन है। उनके भीतर का क्षत्रिय जागृत है, पर वह गुरु के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं। यही विनय उन्हें ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ की पदवी तक ले जाती है।

    राम की वीरता विध्वंसक नहीं, बल्कि रक्षक और सृजक है। उनके जीवन का हर युद्ध अनिवार्य होने पर ही लड़ा गया, कभी भी साम्राज्य विस्तार के लिए नहीं। वाल्मीकि रामायण में राम के शौर्य के विषय में कहा गया है, “रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः।” अर्थात् राम साक्षात धर्म के स्वरूप हैं, वे साधु हैं और उनका पराक्रम सत्य पर आधारित है। राम की वीरता का उत्कर्ष लंका के रणक्षेत्र में दिखता है, जहाँ वे एक ओर तो ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली योद्धा से टकरा रहे हैं और दूसरी ओर विभीषण जैसे शरणागत को अभय दान दे रहे हैं।

    राम का न्याय तंत्र इतना पारदर्शी है कि वे युद्ध के नियमों का पालन उस समय भी करते हैं जब शत्रु हर मर्यादा लांघ चुका होता है। निहत्थे रावण पर प्रहार न करना उनकी वीरता की वह ऊंचाई है जिसे छू पाना किसी भी साधारण योद्धा के लिए स्वप्नवत है। यह वीरता केवल शारीरिक बल की नहीं, बल्कि नैतिक बल की विजय है। राम जानते थे कि अधर्म को हराने के लिए धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि यदि विजय अनैतिक मार्ग से प्राप्त की जाए, तो वह पराजय का ही एक परिष्कृत रूप होती है।

    उनका प्रशासनिक न्याय भी इसी धरातल पर टिका है। अयोध्या के राजसिंहासन को त्यागकर वन गमन का निर्णय राम के प्रशासनिक बोध का चरम उदाहरण है। राम ने पिता के वचन की रक्षा के लिए जिस सहजता से राज्य छोड़ा, वह सत्ता के प्रति उनकी अनासक्ति को दर्शाता है। एक राजा के रूप में उनका न्याय किसी भेदभाव पर आधारित नहीं था। रामराज्य की जो परिकल्पना आज भी आदर्श मानी जाती है, उसका मूल आधार ‘समानता’ ही था, “दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।”

    अर्थात् राम के राज्य में किसी को भी शारीरिक, दैविक या भौतिक कष्ट नहीं था। उनके शासन में दंड का विधान अंतिम विकल्प था, और करुणा प्रथम। राम ने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति, चाहे वह केवट हो या शबरी, सभी को वह सम्मान प्रदान किया जो उस समय की व्यवस्था में अकल्पनीय था। शबरी के जूठे बेर खाना एक राजा का अपनी प्रजा के प्रति अगाध प्रेम और सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा प्रशासनिक संदेश है। उन्होंने न्याय को महलों की चहारदीवारी से निकालकर वनों और कंदराओं तक पहुँचाया।

    राम का विनय उनके संवादों में झलकता है। जब वे समुद्र से मार्ग माँगते हैं, तो वे तीन दिनों तक हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं। यह संदेश है कि शक्ति का प्रयोग तभी होना चाहिए जब शांति के समस्त द्वार बंद हो जाएँ। “विनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति, बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।” यह दोहा सिद्ध करता है कि राम का क्रोध भी लोक-कल्याण और मर्यादा की स्थापना के लिए ही था। यही संतुलन उन्हें एक संतुलित राजनेता बनाता है। युद्ध के पश्चात जब रावण मृत्युशय्या पर होता है, तब राम का न्यायबोध और विनय और भी मुखर हो उठता है। वे लक्ष्मण को रावण के चरणों में बैठकर नीति की शिक्षा लेने भेजते हैं। यहाँ राम यह स्थापित करते हैं कि ज्ञान जहाँ भी हो, वह सम्मान के योग्य है, भले ही वह शत्रु के पास हो।

    वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ युद्ध केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन बनकर रह गए हैं, श्री राम की प्रासंगिकता एक ‘विश्व-गुरु’ के रूप में उभरती है। आज की दुनिया विस्तारवादी नीतियों की आग में झुलस रही है। ऐसे समय में राम का चरित्र याद दिलाता है कि शक्ति का अंतिम उद्देश्य शांति की स्थापना होना चाहिए। आधुनिक युद्धों में अक्सर नैतिक मूल्यों की बलि चढ़ा दी जाती है, किंतु राम का युद्ध दर्शन सिखाता है कि भीषणतम संघर्ष के बीच भी अपनी मानवीय संवेदना को जीवित रखना ही वास्तविक विजय है। राम ने लंका विजय के पश्चात वहाँ अपना शासन स्थापित करने के बजाय, उसे विभीषण को सौंप दिया, “लंका गढ़ कपिन्ह ढहावा, बिभीषन कहँ राजु दीन्हा।” यह अनासक्ति आज के उन देशों के लिए एक बड़ा सबक है जो दूसरे राष्ट्रों पर अपनी सत्ता थोपना चाहते हैं।

    यदि आज के वैश्विक नेता राम के विनय को अपनी कूटनीति का हिस्सा बना लें, तो अहंकार से जनित आधे युद्ध स्वतः ही समाप्त हो सकते हैं। विनय का अर्थ झुकना नहीं, बल्कि दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करना है। आज जब दुनिया युद्ध की विभीषिकाओं से जूझ रही है, राम की करुणा हमें सिखाती है कि घृणा के चक्र को केवल प्रेम और न्याय से ही तोड़ा जा सकता है।

    राम केवल एक धर्म विशेष के प्रतीक नहीं, बल्कि वे उस वैश्विक नैतिकता के आधार स्तंभ हैं, जिसकी आज सर्वाधिक आवश्यकता है। राम का व्यक्तित्व हमें स्मरण कराता है कि वीरता केवल शत्रुओं को मारने में नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार को मारने में है। मर्यादा पुरुषोत्तम का मार्ग यह सिद्ध करता है कि एक महान राष्ट्र वही है जो अपनी सामर्थ्य का उपयोग दुर्बलों को डराने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें अभय दान देने के लिए करता है। राम का विनय और उनका न्यायबोध ही वह शाश्वत प्रकाश है जो युद्ध के अँधेरे में भटकती मानवता को शांति के तट तक पहुँचा सकता है।

    Shagun

    Keep Reading

    Trump's Stern Ultimatum to Iran: 'Complete Surrender' on Nuclear Missiles—or an Attack?

    दुनिया युद्ध की आग में घिरी: शांति की उम्मीद कमजोर

    Chowk Santoshi Mata Temple is the center of faith and belief

    आस्था और विश्वास का केन्द्र है चौक सन्तोषी माता मन्दिर

    वृक्षों से खाली मेरे मार्ग, मैं अभागा बबेरू!

    Abhijeet Deepke's "Intellectual Strike on Hot Iron" takes the internet by storm; the "Virtual Cockroach Janata Party" goes viral.

    अपमान की कोख से उपजी देश की सबसे बड़ी डिजिटल क्रांति

    ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत जैव विविधता के लिए वरदान

    My paths are empty of trees, I am a wretched babe!

    प्रकृति की कराह और मनुष्य की आत्मघाती महत्वाकांक्षा

    Add A Comment
    Leave A Reply Cancel Reply

    Advertisment
    Google AD
    We Are Here –
    • Facebook
    • Twitter
    • YouTube
    • LinkedIn

    EMAIL SUBSCRIPTIONS

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    About



    ShagunNewsIndia.com is your all in one News website offering the latest happenings in UP.

    Editors: Upendra Rai & Neetu Singh

    Contact us: editshagun@gmail.com

    Facebook X (Twitter) LinkedIn WhatsApp
    Popular Posts

    फुकेट के ‘एंडामंडा वाटर पार्क’ ने पर्यटकों के लिए पेश किए शानदार ‘प्रीमियम अनुभव’

    May 25, 2026
    K.C. Bokadia’s ‘Teesri Begum’: A Fierce Revolt by Three Wives!

    के सी बोकाडिया की ‘तीसरी बेगम’: तीन पत्नियों की जोरदार बगावत!

    May 24, 2026
    The world's largest free old-age home will become a support for 5,000 elderly people.

    5000 बुज़ुर्गों का सहारा बनेगा दुनिया का सबसे बड़ा मुफ्त वृद्धाश्रम

    May 24, 2026
    Trump's Stern Ultimatum to Iran: 'Complete Surrender' on Nuclear Missiles—or an Attack?

    दुनिया युद्ध की आग में घिरी: शांति की उम्मीद कमजोर

    May 23, 2026
    Fire rains from the sky! India's 50 hottest cities are ranked, with Uttar Pradesh leading again.

    आसमान से बरस रही आग! भारत के 50 सबसे गर्म शहरों पर कब्जा, यूपी फिर से सबसे आगे

    May 23, 2026

    Subscribe Newsletter

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    Privacy Policy | About Us | Contact Us | Terms & Conditions | Disclaimer

    © 2026 ShagunNewsIndia.com | Designed & Developed by Krishna Maurya

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Newsletter
    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading