व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी
राह चलते आज एक सेंटा से मुलाकात हो गई। सेंटा के चेहरे पर वो खुशी और उत्साह दिखाई नहीं पड़ रहा था जोकि अक्सर क्रिसमस के मौके पर बना रहता है। बुझा-बुझा। शांत-शांत सा।
खैर, सेंटा से मैंने उसकी मायूसी का कारण जानना चाहा। पहले तो उसने ‘कोई बात नहीं’ कहकर टालने की कोशिश की पर जब मैंने ज्यादा जोर डाला तो उसने बताया…।
‘भाई, सीन कुछ यों है कि अब देश और समाज में बहुत कुछ बदल चुका है।’ मैंने जिज्ञासावश पूछा कि ‘क्या बदल चुका है…?’ ‘बदलने को बचा ही क्या है? कल ही एक राष्ट्रीयवादी सज्जन कहते मिले कि सेंटा की ड्रेस सेक्युलरिज्म की प्रतीक है। इसे बदलकर भगवा किया जाना चाहिए। क्या मतलब है लाल रंग का?’ सेंटा ने बताया।
मैंने कहा- ‘तो इससे क्या? बदल लो न अपनी ड्रेस का कलर। क्या जाता है? लाल रंग वैसे भी बहुत भड़कीला टाइप होता है। भगवा रंग आपसी सौहार्द का प्रतीक है।’ ड्रेस का रंग बदलने की बात सुनते ही सेंटा के चेहरे की रंगत बदल गई थी। थोड़ा अनमना होकर बोला- ‘वाह जी वाह! अभी आप मुझे ड्रेस का रंग बदलने को कह रहे हैं। कल को कहेंगे कि अपना धर्म बदल लो। अपना खान-पान, रहन-सहन, चाल-चलन बदल लो। बोली-वाणी बदल लो।’
‘अरे, नहीं.. नहीं सेंटा मेरा वो मतलब नहीं कहने का जो तुम समझे।’ थोड़ा मक्खन मारने के अंदाज में मैंने कहा। ‘तो फिर क्या मतलब था? मैं तुम लोगों का अर्थ-मतलब अच्छी तरह से समझ रहा हूं। तुम नहीं चाहते, तुम्हारे धर्म के अतिरिक्त कोई और धर्म देश में जगह पाए।’ सेंटा ने सेंटी अंदाज में कहा।
मन ही मन मैं खुद से सवाल करने लगा- क्या हमारे देश-समाज का सेक्युलर ढांचा चरमरा रहा है? अन्य धर्मों के लोग खुद को असुरक्षित-सा मासूस कर रहे हैं? क्या असहिष्णुता बढ़ रही है?
तभी सेंटा ने मेरा कंधा पकड़कर मुझे जकझोड़ा। ‘अमां, किस सोच में पड़ गए?’ सेंटा ने पूछा। ‘नहीं कुछ नहीं यार…। यों ही देश-समाज के बारे में सोच रहा था।’ सेंटा जोर का ठहाका मारके हंसा। बोला- ‘महाराज, तुम कब से ‘सोचने’ जैसा ‘फालतू’ का काम करने लगे? सोचने से ‘दुबलाहट’ बढ़ती है।’
सेंटा कह तो सही रहा था। भला मैं क्यों सोचने जैसी बीमारी में पड़ने लगा! सोचें वे जिनके पास सोचते रहने का भरपूर समय हो।
खैर, सारी बातों को किनारे कर मैंने सेंटा का हाथ थामा और क्रिसमस को अपने ही अंदाज में सेलिब्रेट करने हम बियर बार की तरफ निकल लिए। खुशी को मस्ती के साथ एन्जॉय करने का इससे उम्दा तरीका दूसरा नहीं हो सकता।
अब तक सेंटा का मूड भी काफी बदल चुका था। चेहरे पर गुलाबी मुस्कुराहट छलक रही थी।
आप भी क्रिसमस को अपने अंदाज में मनाइये। फिलहाल, सेंटा को लाल ड्रेस में ही रहने दें। इससे देश में धर्मनिरपेक्षता बनी रहेगी।
हैप्पी क्रिसमस।
लेखक वरिष्ठ व्यंगकार और पत्रकार है







