परिचय : एक आम रात, लेकिन असामान्य पीड़ा
समालोचना डॉट कॉम पर हरे प्रकाश उपाध्याय की कहानी ‘रात’ एक बेहद सशक्त, यथार्थवादी और मन को छू लेने वाली रचना है। यह छोटी-सी कहानी नहीं, बल्कि एक पूरे अस्तित्व की रात की कहानी है – वह रात जिसमें नींद टूटती है, सपने नहीं टूटते, डर टूटता नहीं, सिर्फ़ जीवन घिसटता चला जाता है।
कहानी का नायक एक आम-सा, गाँव से शहर आया हुआ मजदूर-प्रकृति का व्यक्ति है। शादी के सोलह साल, दो बच्चे, पैंतालीस-पचास के आसपास की उम्र, लेकिन जन्मतिथि भी कागजी और झूठी। उसका पूरा जीवन “काम चलाऊ” है – काम नहीं, बस “काम घिसट जाता है”। न कोई स्थायी रोजगार, न परिवार का सहारा, न समाज का स्नेह। प्रेम-विवाह की वजह से दोनों परिवारों ने संबंध तोड़ लिए, दूसरे धर्म में प्रेम करने की “गलती” उसे हमेशा के लिए अकेला छोड़ गई। अब वह मनुष्य जगत में “एक अलग प्रजाति” जैसा महसूस करता है – जैसे किसी आँधी-पानी की रात में आसमान से अनचाहे टपक पड़ा हो।
कहानी पूरी तरह नायक की रात की करवटों पर टिकी है। नींद बीच-बीच में टूटती है, बेसिर-पैर के डरावने ख्याल आते हैं – ऐसी दुर्घटनाएँ जो कभी घटीं नहीं, लेकिन घट सकती हैं। पत्नी की पीठ से सटकर सोने की कोशिश, मच्छर का काटना, बच्चों के भविष्य का डर, किराए का दबाव, आटा-चावल का अभाव, आधार कार्ड का इंतजार, पुलिस वेरिफिकेशन… सब कुछ एक साथ दबाता चला जाता है। बारिश में बिना छाते निकलना, जेब में फटा दस का नोट और तीन रुपये, नया काम मिलने की उम्मीद, पुरानी किताबों से काम चलाने का इंतजाम – ये छोटी-छोटी डिटेल्स कहानी को इतना जीवंत और विश्वसनीय बना देती हैं कि पाठक खुद उस पसीने और घबराहट को महसूस करने लगता है।
सबसे मार्मिक क्षण वे हैं जब नींद में ही वह चीख पड़ता है, या रात को डोरबेल बजने पर चोर-डाकू-हत्यारे का ख्याल आता है, और उठकर देखता है कि पत्नी चाय का कप लेकर खड़ी है। ये क्षण दिखाते हैं कि उसकी चेतना अब लगातार “आशंका” के मोड में रहती है। अंधेरा बढ़ता जा रहा है, और वह उसमें घिरता जा रहा है। फिर भी सुबह उठकर नये काम की तलाश में निकलना पड़ता है। “दुआ कीजिए” – कहानी इसी एक वाक्य पर समाप्त होती है, जो पूरी तरह बेबस और उम्मीद भरा है।
हरे प्रकाश उपाध्याय की खासियत यह है कि वे कवि हैं, इसलिए कहानी में भी काव्यात्मक संवेदना बनी हुई है, लेकिन भाषा बिल्कुल सादी, गाँव-शहर के मिश्रित बोलचाल की है। कोई नाटकीयता नहीं, कोई अतिरंजना नहीं। सिर्फ़ जीवन की कठोरता को ज्यों-का-त्यों उतार दिया गया है। गाँव से उखड़कर शहर में जीने की ज़द्दोजहद, सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक तंगी, पारिवारिक दबाव और व्यक्तिगत अकेलेपन का जो चित्र उन्होंने खींचा है, वह आज के लाखों ऐसे लोगों का चित्र है जो “काम घिसटते” हुए दिन काट रहे हैं।
‘रात’ न केवल एक व्यक्ति की कहानी है, बल्कि उस पूरे वर्ग की कहानी है जो सपने देखना भी छोड़ चुका है, लेकिन सपनों के टूटने का डर अभी बाकी है। नींद नहीं आती, क्योंकि रात अभी बहुत बाकी है।
समालोचना डॉट कॉम जैसे पोर्टल पर यह कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह साहित्य को elitist दायरे से बाहर लाकर आम आदमी की पीड़ा को केंद्र में रखती है। हरे प्रकाश जी की कविताओं की तरह यह कहानी भी जन-सरोकार से जुड़ी हुई है – साहस के साथ लीक से हटकर चलती है।
जो पाठक एक बार इस ‘रात’ में उतर जाएगा, उसे सुबह होने तक अपनी ही रात याद आने लगेगी।
हरे प्रकाश उपाध्याय – कवि, कहानीकार और उपन्यासकार – की यह रचना हिंदी साहित्य में उस वर्ग की आवाज़ है जो अक्सर चुप रह जाता है। समालोचना डॉट कॉम पर ऐसी ईमानदार रचनाएँ पढ़ना सुखद अनुभव है। – https://samalochan.com/
बहुत अच्छी, ईमानदार और ज़रूरी कहानी। पढ़िए, और समालोचना डॉट कॉम को बुकमार्क कर लीजिए – हिंदी साहित्य के नए, सच्चे स्वरों का यह एक बेहतरीन ठिकाना बन रहा है। – प्रस्तुति : सुशील कुमार






