बैशाख माह में ही हीट वेव का तांडव, पारा लगभग 48 डिग्री सेल्सियस पहुंचा, गर्व के साथ गर्म से कराह उठे लोग
व्यंग: राहुल कमलेश कुमार
बांदा के माथे पर ‘एशिया का सबसे गर्म स्थान’ होने का जो गौरवशाली कलंक लगा है, वह कोई कुदरती करिश्मा नहीं, बल्कि हमारी तरक्की के आधुनिक मॉडल की जीत है जिसे बांदा और बांदा के आस पास के पहाड़ माफिया, बालू माफिया, खनन माफिया और हम सब वासियों ने मिलकर तैयार किया है। हमें गर्व होना चाहिए कि जब दुनिया ग्लोबल वार्मिंग की चिंता में दुबली हो रही है, तब बांदा ने अकेले दम पर बैशाख के महीने में ही सूरज को चुनौती दे दी है।
लगभग 48 डिग्री सेल्सियस का यह तापमान महज तापमापी में पारा का चढ़ना नहीं है, यह उस डायनामाइट की गूंज है जिसने विंध्य की पर्वत श्रृंखलाओं को गिट्टी बनाकर सड़कों पर बिछा दिया, बांदा के नजदीक ही छतरपुर के पास हंसदेव के जंगलों और पहाड़ियों को औने पौने दाम में बड़े उद्योगपतियों को उजाड़ने के लिए दे दिया गया, इसी तरह राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला में खूब खूब तहस नहस किया गया। आखिर पहाड़ होने का फायदा ही क्या थे? वे बस चुपचाप मूक खड़े ही तो रहते थे, आर पार का दिखाई भी नहीं देता था। ये बेवजह मानसूनी हवाओं को रोकते थे और बादलों को बरसने का न्योता देते थे। जमीन गीली हो जाती थी, चलना दूभर हो जाता था, आदि आदि पहाड़ होने के न जाने कितनी कमियां थीं यहां!
भला हो खनन और पहाड़ माफियाओं का!माफियाओं के पुण्य और नेक कार्यों के चलते गर्व में ठूंठ खड़े पहाड़ों के अभिमान को चूर चूर कर कर विकास की नई इबारत लिखी जाने लगी। पहाड़ों को कंक्रीट के दानों में बदल देना ही विकास का पर्याय बन गया। बांदा और उसके आस पास माफियाओं का यह खेल चार दशकों पहले ही शुरू हो चुका था तब चित्रकूट जिला भी बांदा जिले के अंतर्गत आता था। हमें भी याद है कुछ दशकों पहले जब हम बांदा से चित्रकूट और महोबा की तरफ जाते थे तो रास्ते में पहाड़ ही पहाड़ दिखाई देते थे लेकिन अब तो ऐसा लगता है जैसे वहां कभी कुछ था ही नहीं।
अरावली पर्वत श्रृंखला और हंसदेव के जंगल और पहाड़ी पर विकासवादियों की नजर तो कई दशकों से थी सफलता इन दो तीन सालों में मिल गई। खैर अब जंगल, पहाड़ियां और पहाड़ नहीं रहें, यहां की नदियां अपनी आखिरी सांसें गिन रहीं,कई जगह रास्तों में तब्दील होती दिख रहीं तो इससे अच्छा क्या! लू के थपेड़ों के लिए रेड कार्पेट तो बिछ ही गया है। बांदा की जनता अब सीधे सूर्यदेव से संवाद कर रही है, बिना किसी पहाड़ी बाधा के। वर्ल्ड रिकॉर्ड देख गौरवान्वित हो रही, उसे लगा वर्ल्ड लेबल में बांदा ने अपनी पहचान तो दर्ज की क्या ये कम है?
यहां आंकड़ों की बाजीगरी को तो सलाम करना चाहिए। विंध्य के जो पहाड़ सदियों से इस अंचल के थर्मोस्टेट थे, उन्हें कागजों पर इस सफाई से बंजर साबित किया गया कि बेचारे पहाड़ खुद अपनी शिनाख्त भूल गए। आज जब बांदा और बांदा के अन्य कस्बों और गांवों में गरम हवाएं तांडव करती हैं, तो हम बांदा जिले के ही निवासी उसकी एक शानदार वजह बताते हैं जो कि मीडिया भी बताती है कि ये अल नीनो का प्रभाव है। जो विश्व के एक दूर कोने से आकर भारत के किनारों में नहीं, केंद्र के आस पास बसे बांदा को ही सर्वाधिक प्रभावित कर जाती है।
हम ये अब भी नहीं समझना चाहते कि यह उन पहाड़ों और जंगलों का बदला है जिन्हें हमने माफिया और कथित विकासवादियों की जय जयकार में बलिदान कर दिए हैं । पहाड़ों, जंगलों के साथ-साथ हमारी जीवनदायिनी केन, बागे और यमुना नदी का भी कायाकल्प कर दिया गया है। यहां के पहाड़ों, जंगलों के अलावा यहां बहती नदियों जिनमें केन, बागे और यमुना प्रमुख हैं इन सबको कभी चेदि प्रदेश को स्वर्ग के समकक्ष बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। अब खनन और बालू माफिया के कृपापात्र पोकलैंड मशीनों के जरिए सब अपना अस्तित्व ढूंढ रहे हैं। जंगलों को सपाट मरुस्थल बना देना, पहाड़ों के गर्व को चूर चूर कर देना और नदी की कोख से रेत का कतरा-कतरा निचोड़ लेना ही तो असली संसाधन प्रबंधन है।
लोग कहते हैं कि रेत पानी को सोखती है और भूजल स्तर बढ़ाती है, लेकिन खनन माफियाओं का तर्क है कि रेत अगर ट्रकों में भरकर महानगरों की ऊँची इमारतों में न जाए, तो वह रेत ही क्या?, पहाड़ अगर इंसानी कदमों में न बिछे तो वो पहाड़ ही क्या? जंगलों को अपनी जेब में भर अगर हम अपने भौतिक उपयोग में इजाफा न करें तो वो जंगल ही क्या? अब केन, बागे और यमुना नदी का सीना छलनी है! बैशाख में ही जब हैंडपंप पानी की जगह हवा और आग उगलने लगते हैं, तो हमें अपनी उस महानता पर रश्क होना चाहिए कि हमने प्रकृति पर जीत हासिल कर ली। पहाड़ों का अस्तित्व मिटा दिया और नदियों को मात्र प्रतीक बना कर रख दिया। ये बांदा का पानी है। ठेठपन यहां की बोली में ही नहीं, प्रकृति के प्रति यहां लोगों के मन में भी है! यहां के लोगों द्वारा माफियाओं की जयकार नहीं रुकती भले प्रकृति का कितना अति दोहन हो जाए?
कहने को तो बांदा पिछड़ा है लेकिन बांदा जिला के कस्बों और मोहल्लों की स्थिति तो और भी आधुनिक है। हमने अपने पुरखों के लगाए नीम,बरगद पीपल आदि पेड़ों को इस बहाने शहीद कर दिया कि घर के सामने गाड़ी खड़ी करने की जगह नहीं बचती, ये पेड़ घर के आस पास रहेंगे तो इनकी जड़ें घर को खराब कर देंगी। अब घर के सामने गाड़ी तो है, लेकिन गाड़ी के भीतर का तापमान इतना है कि उसमें बैठकर चाय बनाई जा सकती है। बस्तियों के अंदर वृक्षों की संख्या में आई यह क्रांतिकारी कमी भी बांदा को एशिया का नंबर एक गरम स्थान बनाने का एक और कारक है। हम कंक्रीट के डिब्बों में एसी लगाकर और वाहनों में अधाधुंध बढ़ोत्तरी और उसके प्रदूषण के कारण बाहर की हवा और गरम हो रही है। और हम फिर शिकायत करते हैं कि गर्मी बहुत है।
बांदा जिले का नागरिक आज अपने ही शहर और कस्बों में सड़क पर निकलने पर डर रहा है, भयंकर तापमान के चलते बच्चों को विद्यालय भेजने में भी भय बना हुआ है। पहाड़ गायब, नदियां रीतीं और पेड़ अब केवल पुराने कैलेंडरों की तस्वीरों में बचे हैं।
लेकिन हम चुप रहे, क्योंकि हमें लगा कि जंगल काटना, पहाड़ कटना और रेत खनन किसी और की समस्या है। हमने तब भी कुछ नहीं बोला जब हंसदेव और अरावली रो रहे थे, जब केन, बागे और यमुना नदी की जलधारा को मशीनों से बांधकर माफिया अपनी तिजोरियां भर रहे थे, भर रहे हैं। अब जब लू की लपटें हमें और हमारे बच्चों के चेहरों को झुलसा रही हैं, तब हमें याद आ रहा है कि यहाँ कभी हरियाली हुआ करती थी।
आज बांदा की माटी पुकार रही है कि पहाड़ तो बचा नहीं सके कम से कम हम अपने घर के बाहर एक पेड़ लगाएं और कम से कम उन नदियों और कुछ एकाध बचे पहाड़ के लिए आवाज उठाएं जो मरने की कगार पर हैं। बैशाख की यह अगन दरअसल हमारी सामूहिक चुप्पी की जलन है। अगर आज भी हम जागरूक नहीं हुए, तो वह दिन दूर नहीं जब बांदा केवल भूगोल की किताबों में एक भस्म हो चुके शहर के रूप में दर्ज होगा। बांदा में पर्यावरण सुधार के लिए कुछ योजनाएं शुरू हैं संभवतः कागजों में यमुना और केन किनारे वृक्ष लगाए गए हैं या लगाए जाने हैं! जल संरक्षण के लिए बांदा का ज़खनी गांव तो भारत में रोल मॉडल बन गया लेकिन बांदा के अन्य गांवों के लिए जैसे इससे कोई सरोकार नहीं, अन्य प्यासे गांवों को जैसे इस मॉडल की जरूरत नहीं! अगर भू जल स्तर अच्छा हो तो भी हीट वेब में काफी लगाम लगाई जा सकती है। हम बांदा के वासी इतना जरूर कर सकते हैं ये अपने अधिकार क्षेत्र में हैं कि पेड़ पौधे, लगाएं और जल संचयन और संरक्षण के लिए आगे बढ़ें। जिससे तापमान में चार से पांच डिग्री हम अपने सामूहिक प्रयासों से कम कर सकते हैं।
बांदा का पारा जरूर आज से 47 साल पहले 29 अप्रैल 1979 को लगभग 47 डिग्री सेल्सियस पहुंचा था, वजह उस समय भीषण सूखा पड़ा हुआ था, भूमिगत गत जल जो कि गर्मी को ताप को कम करने या कूलेंट करने का काम करता था, वो यहां की धरती में नहीं था तो सूर्य की सीधी ऊष्मा यहां के चट्टानी और बंजर जमीन से टकराकर रिफ्लेक्शन के माध्यम से और वातावरण में और हीट पहुंचाती रही जिससे उस दौर में एक दुर्लभ तापमान वृद्धि देखी गई थी। लेकिन अब जो आग ऊपर आसमान और नीचे धरती दोनों तरफ से बरस रही है इसकी वजह मात्र कुदरत नहीं है। इसकी वजह में प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से हम सब शामिल हैं।
हमें माफियाओं की जय जयकार करना है तो करें लेकिन साथ ही सनातन में जिन्हें मां (प्रकृति, नदी) का दर्जा दिया गया है उनका भी सम्मान बनाएं रखें। प्रकृति का हिसाब किताब बहुत पक्का है, उसने बांदा को एशिया का सबसे गर्म स्थान बनाकर अपना पहला बिल भेज दिया है। अब देखना यह है कि हम इस बिल का भुगतान जागरूकता से करते हैं या अपनी अगली पीढ़ी की सांसों से!






