राहुल कुमार गुप्ता
जो अनुभव की झुर्रियों में बड़े मजबूत से दिखते हैं।
सच मानिए वो अंदर से बहुत बिखरे से रहते हैं।।
पहनकर मुस्कुराहट वो ज़माने से जो मिलते हैं।
वही अपनी तन्हाई में ख़ुद ही से लड़ते मिलते हैं।।
बनाकर पत्थर सा दिल वो दुनिया को दिखाते हैं।
मगर यादों के साये में वो मोम सा पिघलते हैं।।
सजाए धैर्य की मूरत जो अक्सर मौन रहते हैं।
हज़ारों तूफ़ान सीने में वो चुपचाप ही सहते हैं।।
नहीं है ख़ौफ़ अब उनको किसी के रूठ जाने का।
हुनर सीखा है उन्होंने बस बिखर कर मुस्कुराने का।।
सफ़र कट ही जाएगा जैसे तैसे जिंदगानी का।
ज़मीर बेचकर कहां वो शान का ताज पहनते हैं।।







