जीके चक्रवर्ती
90 के दशक में बिहार (जो उस वक्त झारखंड में शामिल) में पशुचारा आपूर्ति करने के नाम पर ऐसी कंपनियों को सरकारी कोषागार से धनराशि जारी की गई जिनका वास्तव में कोई अस्तित्व ही नहीं था। बिहार राज्य में हुए इस चारा घोटाले पर से पर्दा 27 जनवरी, 1996 में उस वक्त उठा जब पश्चिम सिंहभूम ज़िले के चायबासा में पशुधन विभाग पर एक छापा मारा गया था। सामने आये इस चारा घोटाले के कारण लालू प्रसाद यादव के जेल जाने की बात देश की राजनीति में एक महत्त्वूपर्ण घटना है, यह कोई अप्रत्याशित घटना नहीं थी वैसे इसकी शुरुआत वर्ष 1990 से हो चुकी थी लेकिन यह मामला सर्व प्रथम वर्ष 1996 में प्रकाश में आये यह घोटाला स्वतन्त्र भारत के सबसे बड़े भ्रष्टाचार के रूप में एक बड़ा घोटाला हम सबके सामने आया था। जिसमें गाय भैंस जैसे पशुओं को खिलाये जाने वाले चारे के नाम पर 950 करोड़ रुपये सरकारी खजाने से फर्जीवाड़ा करके सरकारी धन को निकाल कर हड़प लिए गये।
सीबीआई का यहाँ तक कहना था कि ये सामान्य आर्थिक भ्रष्टाचार कैसा मामला नहीं है बल्कि व्यापक षड्यंत्र का मामला है जिसमें, नेता, राज्यकर्मचारी एवं व्यापारी वर्ग समान रूप से भागीदार थे। सीबीआई का यह भी कहना था कि उसके पास इस बात के दस्तावेज़ी साक्ष्य मौजूद हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री को न सिर्फ़ इस मामले की पूरी जानकारी रही बल्कि उन्होंने कई मौक़ों पर राज्य के वित्त मंत्रालय के प्रभारी के रूप में इनकी निकासियों की अनुमति भी दी गई। सीबीआई ने उस समय कहा था कि चारा घोटाले में शामिल सभी बड़े अभियुक्तों के संबंध राष्ट्रीय जनता दल और अन्य पार्टियों के शीर्ष नेताओं से रहे हैं।

इन्ही कारणों से लालू प्रसाद यादव पर घोटाले के आरोप लगने के बाद उनको अपने मुख्यमन्त्री के पद से भी त्याग पत्र देना पड़ा था। लेकिन राजनीति के माहिर खिलाड़ी लालू ने अपनी जगह अपनी बीबी राबड़ी देवी को कुर्सी सौंप कर स्वयं ही सबसे बडा सबूत पेश कर दिया कि भैंस उनके आगे क्या चीज है वह चारा खाकर सिर्फ़ दूध ही तो देती परन्तु वह दूध की जगह बिहार की जनता को राबड़ी देकर जा रहे हैं।
अभी 17 वर्ष के बाद मई 2017 में रांची बिहार स्थित सीबीआइ की विशेष अदालत ने चारा घोटाले में दोषी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव के अतिरिक्त दो पूर्व सांसदों एवं तीन पूर्व आइएस अधिकारियों समेत कुल 16 आरोपियों को दोषी करार देते हुए अदालत ने उन्हें सजा सुनाने के लिए 3 जनवरी 2018 की तारीख निश्चित की है। वहीं बिहार के एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र, पूर्व मंत्री विद्यासागर निषाद के अलावा बिहार की लोक लेखा समिति के तत्कालीन अध्यक्ष ध्रुव भगत सहित छह अन्य लोग भी इस केस में आरोपी थे, लेकिन अदालत उन्हें निर्दोष पाते हुए बरी कर दिया।
हमारे देश में अनेक राजनीतिज्ञों ने सत्ता में रहते हुए अपने पद का दुरुपयोग करते रहने से ऐसे उनपर समय समय पर भ्रष्टाचार जैसे आरोप लगते रहे हैं। यदि इनमे से इक्क दुक्का मामलों को यदि छोड़ दिया जाये तो बहुत कम ही मामले अदालती फैसले तक पहुंच पाये है। चारा घोटाले जैसे मामले में जांच एवं न्यायिक कार्यवाहियों के लंबे समय तक चलते रहने से, अभी तक केवल एक ही मामले पर फैसला आ सका है।
इसे एक संयोग ही कहा जायेगा कि चारा घोटाले के मामले पर फैसला आने के ठीक दो दिनों के बाद ही 2-जी स्पेक्ट्रम के मामल पर फैसले आया है। 2-जी स्पेक्ट्रम आबंटन जैसे बहुचर्चित मामले में पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा और द्रमुक सांसद कनिमोझी को उन पर लगे आरोपो से बरी कर दिया गया है। शायद इसी तरह लालू प्रसाद यादव को वर्त्तमान समय तक ऐसी उम्मीद रही होगी कि वे भी एक न एक दिन उनपर लगे आरोपों से साफ तौर पर बच निकलेगें। लेकिन ऐसा नहीं होंने की वजह से लालू की मुसीबतें समाप्त होते नहीं दिख रही है।
चारा घोटाले जैसे चार अन्य मामलों में भी अभी फैसले आने शेष हैं जिसमे में भी लालू प्रसाद आरोपी हैं, इन सबके बाद आय से अधिक संपत्ति और धनशोधन के मामलों में प्रवर्तन निदेशालय और आय कर विभाग की जो कार्रवाई लालू परिवार के खिलाफ चल रही है उन सभी की आंच कभी न कभी उन पर एवं उनके राजनितिक माहौल पर अवश्य पड़ेगा। लोकसभा में प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी द्वारा इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया गया एवं इस मामले की जाँच सीबीआई से कराने की माँग की गयी। सत्तारुढ़ पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस व उसकी सहयोगी जनता दल जैसी दो-दो दिग्गज पार्टियों के नेताओं और नौकरशाही की मिलीभगत से की गयी सरकारी खजाने की इस चोरी की गूँज न केवल भारत में बल्कि सात समुन्दर पार अमेरिका एवं ब्रिटेन जैसे देशो में भी सुनायी दि, जिससे भारत की राजनीति पूरी दुनिया में बदनाम हुई हालांकि यह घोटाला 1996 में उजागर होनेहुआ था लेकिन जैसे-जैसे इस की जाँच आगे बढ़ती रही वैसे वैसे इसकी पर्तें खुलती चली गयीं एवं लालू यादव व जगन्नाथ मिश्र जैसे कई सफेदपोश नेता इसमें शामिल नजर आने लगे। यह मामला लगभग दो दशकों तक चलता रहा। मीडिया ने भी जिसमे महत्वपूर्ण भूमिका निभायी जिसकी वजह से सीबीआई एवं न्यायपालिका अपनी-अपनी कार्रवाई विना कोताही करती रही। इस प्रकरण से यह स्पष्ट हो गया कि हमारे देश को नेता नहीं बल्कि माफिया जैसे लोग चला रहे हैं, जिन लोगों ने देश की संपूर्ण अर्थव्यवस्था को ही चौपट कर दिया था। उस वक्त न्यायायपालिका ने चारा घोटाले में लालू यादव को दोषी घोषित किया। जिसकी वजह से उनकी लोकसभा की सदस्यता भी छीन ली गयी थी एवं ग्याराह वर्षों तक उनके कोई भी चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिय गया था।
लालू प्रसाद यादव और जदयू नेता जगदीश शर्मा को इस घोटाले में दोषी करार दिये जाने के बाद लोक सभा से अयोग्य ठहराया गया। चुनाव आयोग के नये नियमों के अनुसार लालू प्रसाद वर्त्तमान समय में 11 वर्षों तक लोक सभा चुनाव नहीं लड़ पायेंगे। उच्चतम न्यायालय ने चारा घोटाला में दोषी सांसदों को संसद की सदस्यता से भी अयोग्य ठहराये जाने से बचाने वाले प्रावधान को भी निरस्त कर दिया है। लोक सभा के महासचिव एस० बालशेखर ने यादव और शर्मा को सदन की सदस्यता के अयोग्य ठहराये जाने की अधिसूचना भी जारी कर दी। लोक सभा द्वारा जारी इस अधिसूचना के बाद संसद की सदस्यता गँवाने वाले लालू प्रसाद यादव भारतीय इतिहास में लोक सभा के ऐसे पहले सांसद हैं एवं जनता दल यूनाइटेड के एक दूसरे नेता जगदीश शर्मा दूसरे, नंम्बर पर है जिन्हें 10 साल के लिये अयोग्य ठहराया गया। प्रमुख रूप से बिहार की राजनीति पर निश्चित रूप से ऐसे सभी बातों से प्रभावों पड़ना तो तय था। कांग्रेस पार्टी ने संकट में लालू के साथ खड़े होने एवं उनसे गठबंधन कायम रखने का अपना इरादा जरूर व्यक्त किया है, लेकिन इसे एक मजबूरी में उठाया गया कदम ही कहेंगे।
बिहार के मामले में स्वमं भाजपा का अपना रिकार्ड कैसा है? जिस सुखराम के कथित भ्रष्टाचार के आरोपों के खिलाफ भाजपा ने 13 दिनों तक संसद को चलने नहीं दीया था, हिमाचल प्रदेश में अपनी सरकार बनाने के लिए उनसे हाथ मिला लिया। अब यदि बात कर्नाटक की जाये तो वहाँ पर भाजपा की सरकार ने भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान स्थापित किये। पद में रहते हुए लालू प्रसाद यादव उसका दुरुपयोग करने जैसे बातों पर परदा डालने के लिए पिछड़ा कार्ड खेलने जैसे कोशिशों में लगे रहे। जबकि उनके ऐसे सभी कारनामों के कारणो से जहां सामाजिक न्याय जैसी लड़ाई मजबूत होने के वजाय कमजोर हुई है। एक दूसरे पर पलटवार करने के अंदाज में बिहार के ‘सृजन’ घोटाले की अदालत की निगरानी में जांच की मांग तेज हो गई है। एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा उसे घेरने जैसी बातों के चलते ऐसे मामलों की चर्चाऐ जोर पकड़ने समाज में जो उनकी तस्वीर उभर कर आएगी उससे राजनीति के प्रति निराशा पैदा होने वाली बात सिद्ध होगी। इस तरह की सभी मामलों से सबक लेते हुए पद के गलत इस्तेमाल एवं अनियमितताओं को रोकने के लिए संस्थागत चौकसी के अलावा कड़ी निगरानी करते हुए चौकसी वर्ते जाने की आवश्यकता हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)
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