अपूर्व जोशी
वर्ष 2001 में अनिल कपूर अभिनीत एक फिल्म रिलीज हुई थी। नाम था ‘नायक: दि रियल हीरो’। फिल्म का मुख्य पात्र एक टीवी पत्रकार है जो एक भ्रष्ट और अहंकारी मुख्यमंत्री के खिलाफ जंग छेड़ने को विवश कर दिया जाता है। विवश इसलिए क्योंकि उसके प्रश्नों से नाराज हो मुख्यमंत्री उसे एक दिन के लिए अपनी गद्दी संभालने का चैलेंज दे देता है। उसके बार-बार मना करने पर सीएम जब उसका उपहास उड़ाता है तो वह चैलेंज स्वीकार कर लेता है। एक दिन का सुल्तान बन हमारा नायक पूरी व्यवस्था को हिला देता है। कहानी पूरी फिल्म है। बंबइया यानी बाॅलीवुड की अधिकांश फिल्मों की भांति इसमें हर वह तड़का मौजूद था जो इसे सुपरहिट फिल्मों की श्रेणी में ले जाता। बहरहाल इस फिल्म का जिक्र इसलिए क्योंकि भले ही अनिल कपूर सरीखा नायक असल जिंदगी में होना संभव नहीं, उस जैसे नायक के होने की ख्वाइश हर उस आम हिंदुस्तानी के भीतर दफन है जो मुल्क की व्यवस्था से पूरी तरह विश्वास खो चुका है। ‘नायक’ का अनिल कपूर दरअसल सत्तर के दशक वाले अमिताभ बच्चन का ही विस्तार है जो सत्ता के खिलाफ अकेले युद्ध छेड़ने और जीतने की ताकत रखता है। अरविंद केजरीवाल भी आमजन की इसी तलाश के चलते आज दिल्ली की सत्ता में काबिज हैं, स्थापित राजनीतिक दलों को धूल चटा के।
केजरीवाल ने एक सामाजिक कार्यकर्ता से बतौर शुरू की अपनी यात्रा को सत्ता तक पहुुंचने की सीढ़ी बना पाने में अद्भुत सफलता पाई। अन्यथा ऐसे दर्जनों जन आंदोलनकारियों का नाम मैं गिना सकता हूं जिनका संघर्ष दिल्ली के मुख्यमंत्री और उनके साथियों की बनिस्पत कहीं ज्यादा रहा है लेकिन चुनावी राजनीति में वे फिसड्डी साबित हुए हैं। हालांकि सत्ता पाने के बाद वे व्यवस्था में कितना बदलाव कर सके, यह अलग बहस का विषय है। वहीं सैकड़ों ऐसे नायक भी हमारे इर्द-गिर्द मौजूद हैं जो अपने-अपने तरीकों से समाज के लिए काम कर आदर्श बन उभरे हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त ऐसे नौजवान हैं जो ग्रामीण इलाकों में रह समाज सेवा का काम कर रहे हैं। ऐसे सरकारी अधिकारी हैं जो अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कर रहे हैं। ऐसे डाॅक्टर हैं जो अपने पेशे को धन कमाने का जरिया न बना आमजन की सेवा में लगे हैं। ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिन्होंने अपना जीवन पूरी तरह जनसरोकारों के लिए समर्पित कर दिया है। ये सभी अपने-अपने स्तर पर तमाम कठिनाइयों का सामना करते हुए स्थापित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए लगातार संघर्षरत हैं। दरअसल, ये हमारे रियल हीरो हैं, असली नायक हैं। ऐसे नायक जो हमारे आस- पास रह, हमारे लिए निःस्वार्थ भाव से काम करते हैं। इन्हें किसी सम्मान अथवा पद की चाह नहीं है। मैं इन्हें रियल हीरो इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इनकी ही बदौलत कितनी जिंदगियां अपने जीने का मकसद तलाश पाने में सफल होती हैं।
ये प्रेरणाश्रोत हैं उन सबके लिए जो हमारे लोकतंत्र की खामियों के चलते व्यवस्था से विश्वास खो बैठने को विवश हो जाते हैं। ‘दि संडे पोस्ट’ नव वर्ष 2018 का स्वागत उत्तराखण्ड के ऐसे सपूतों पर इस विशेषांक के जरिए कर रहा है ताकि हम जान सकें अपने इर्द-गिर्द मौजूद नायकों को, महसूस कर सकें उनके ताप को ताकि हमारे भीतर भी कुछ सकारात्मक करने का हौसला बने और अपने लोकतंत्र की तमाम खामियों के बीच कुछ सार्थक कर, हम भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें ‘दि संडे पोस्ट’ पूर्व में भी प्रतिभाशाली प्रतिभाओं पर विशेषांक निकाल चुका है। हमारा यह अंक इस दृष्टि से अलग है कि हमने इस बार राजनीति के क्षेत्र में उभर रही प्रतिभाओं को, सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों को, स्थापित जननायकों को अपने इस विशेषांक में शामिल नहीं किया है। इसलिए क्योंकि वे किसी परिचय के मोहताज नहीं। उन पर काफी कुछ लिखा-पढ़ा जा चुका है। इसलिए हमने प्रयास किया उन जननायकों के कार्यों पर प्रकाश डालने का जो बगैर किसी पुरस्कार अथवा नाम की चाह लिए, केवल अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हो, उत्तराखण्ड के दूर-दराज क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। हमने प्रयास किया है कि हमारी इस सूची में वे कर्मठ सरकारी अधिकारी भी शामिल हो सकें जिनकी कर्तव्यनिष्ठा आम नागरिक का विश्वास हमारी व्यवस्था पर बनाए रखने का काम कर रही है। अन्यथा भ्रष्टाचार का कोलाहल इस कदर हमारे चारों तरफ फैल चुका है कि पूरी व्यवस्था से आमजन का विश्वास खत्म हो चला है। हालांकि हमने अपने सहयोगियों की मदद से ऐसे हर जननायक को सामने लाने का प्रयास किया। लेकिन सूची निश्चित ही अधूरी प्रतीत होती है। इसका एक बड़ा कारण समय का अभाव होना रहा है। कुछ हमारे प्रयासों में भी कमी साफ झलकती है। बहरहाल आधा-अधूरा ही सही हमारा यह अंक आपको पसंद आएगा, ऐसी उम्मीद हमें है।
नया वर्ष हमारे लिए, हम सबके लिए नव उत्साह का वर्ष हो। हमें अपनी परेशानियों से पार पाने का रास्ता मिल सके और हमारा विश्वास कायम रहे कि हर संकट का सामना हम अपने दम पर करने को समर्थ हैं बशर्ते हमारा हौसला मजबूत रहे। कुंवर नारायण की एक कविता है-‘कोई दुख मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं, वही हारा जो लड़ा नहीं।’ विपत्ति के समय हमें लगता है कि यह सब कहने की बातें हैं, हम अपनी परेशानियों के मकड़जाल में इस कदर उलझ जाते हैं कि सकारात्मकता पूरी तरह समाप्त हो जाती है। नव वर्ष में हमें अपने-अपने संघर्षों से जूझने के लिए नव ऊर्जा का खजाना स्वयं पैदा करना होगा। ऐसी ऊर्जा जो किसी चमत्कार की आशा का संचरण न करते हुए हमें संघर्ष पथ पर बगैर डगमगाए चलने का साहस दे सके। यदि ऐसी ऊर्जा हम अपने भीतर पैदा कर पाते हैं तो यकीन जानिए यही अपने आप में एक बड़ा चमत्कार होगा। कुंवर नारायण के शब्दों की सार्थकता आप महसूसें इसलिए एक सच्ची घटना आप सबके संग शेयर करता हूं। भारतीय वायु सेना में पायलट रह चुके फेसबुक मित्र राजीव त्यागी ने एक ऐेसे जांबाज की बाबत जानकारी साझा की है जो हम सबको यह विश्वास दिलाती है कि लड़ने वाले की कभी हार नहीं होती। 1971 में हमारी सेना पाकिस्तान संग युद्धरत थी। यह वही युद्ध है जिसने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर नए मुल्क बांग्लादेश को जन्मा।
भारतीय फौज की पांच गोरखा राइफल्स के एक नौजवान मेजर अपने घायल साथी की मदद के लिए युद्ध भूमि में आगे बढ़ता है। उसका पैर दुश्मन द्वारा बिछाई लैंडमाइन पर पड़ता है। नतीजा उसका बांया पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाता है। संगी-साथी उसे तुरंत कैंप अस्पताल पहुंचाते हैं। यह नौजवान अफसर डाॅक्टर से दर्द कम करने की दवा मांगता है तो पता चलता है कि दवा समाप्त है। वह डाॅक्टर से अनुरोध करता है कि उसके पैर को काट दिया जाए। डाॅ जवाब देता है कि उसके पास आॅपरेशन के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। तब घायल अफसर डाॅक्टर को अपनी खुखरी दे अनुरोध करता है कि वह इसके जरिए उसका पैर काट दे। डाॅक्टर ऐसा करने से मना कर देता है। यह नौजवान अफसर अपने हाथों ही अपना पैर काटने का वह काम कर दिखाता है जिसकी हम और आप कल्पना तक नहीं कर सकते। बाद में उसे नकली पैर लगाया गया।
आप सोच रहे होंगे कि एक पैर कटने के चलते या तो स्वयं उसने फौज छोड़ दी होगी या फिर फौज ने उसे हटा दिया होगा। दोनों में से कुछ नहीं हुआ। इस जांबाज अफसर ने ठान ली कि वह अपनी यूनिट का कमांडिंग अफसर बनकर ही रहेगा। उसकी इच्छाशक्ति का ही कमाल रहा कि एक बार भारतीय वायु सेना के उपप्रमुख का हेलीकाॅप्टरर जम्मू कश्मीर स्थित एक आर्मी कैंप से पांच सौ फीट ऊपर उतारना पड़ा। थलसेना उपप्रमुख यह देख दंग रह गए कि एक नकली पैर लगाए अफसर ने बगैर किसी सहारे के 600 फुट की ऊंचाई तय कर डाली। इस जांबाज अफसर की तमन्ना पूरी हुई। वह अपनी यूनिट का कमांडिंग अफसर तो बना ही, उसे पूरी ब्रिगेड कमांड करने का भी मौका मिला। भारतीय फौज से यह अफसर मेजर जनरल जैसे उच्च पद से पूरी गौरव के साथ सेवानिवृत्त हुआ। भारतीय फौज के मेजर जनरल अयान कारडोजो अब दिल्ली में रहते हैं। उन्हें अतिविशिष्ट सेवा मेडल और सेवा मेडल जैसे महत्वपूर्ण पदक उनके अदम्य साहस और शौर्य के लिए मिल चुके हैं। जनरल कारडोजो कई पुस्तकों के लेखक होने के साथ-साथ वार वुन्डेड फाउंडेशन के उपाध्यक्ष भी हैं। जनरल कारडोजो की कहानी हमें प्रेरणा देती है कि सही में कोई दुख मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं होता।
नववर्ष नई आशाओं, अभिलाषाओं, आकांक्षाओं के साथ-साथ नव संकल्प का, जनसरोकारों का, अपने अधिकारों के प्रति सजगता के साथ-साथ अपने दायित्वों के निर्वहन के प्रति बोध का वर्ष भी हो। 2018 के लिए सभी को समस्त अशेष शुभकामनाएं अपने प्रिय कवि हरविंश राय बच्चन की कविता ‘नव वर्ष’ का स्मरण हो आया/आप भी बांचे-
नव वर्ष/हर्ष नव/जीवन उत्कर्ष नव
नव उमंग/नव तरंग/जीवन का नव प्रसंग
नवल चाह/नवल राह/जीवन का नव प्रवाह
गीत नवल/प्रीति नवल/जीवन की रीति नवल
जीवन की नीति नवल/जीवन की जीत नवल।
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