व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी
जब कोई मुझसे मिलकर यह कहता है- ‘यार, मैं बड़ा बिजी हूं।’ फिर उससे दूसरा कोई प्रश्न करता ही नहीं। क्योंकि दूसरे प्रश्न का जवाब उसके पास यही होगा- ‘टाइम नहीं है।’
‘बिजी’ और ‘टाइम’ ये दो जुमले हमारी ज़बान पर इस कदर चढ़ लिए हैं, कभी-कभी तो मुझे लगता है, आगे चलकर सरकार इन्हें ‘आधार’ से लिंक करने का फरमान न जारी कर दे! आज के समाज में किसी परिवार का ऐसा कोई सदस्य नहीं होगा जो ‘बिजी’ न हो या जिसके पास ‘टाइम’ न हो।
आलम यह है, बंदा कुछ भी न करता हो, नितांत खाली बैठा हो तब भी कहता हुआ यही मिलेगा कि बिजी हूं। बिजी होने-रहने का चस्का हमें इस कदर लग चुका है, कभी तो मैं हैरान हो जाता हूं कि ये 24×7 बिजी रहने वाले महापुरुष नींद में कैसे ‘फ्री’ रह पाते होंगे?
जब से इंसान के हाथ में मोबाइल आया है, तब से बिजी रहने और टाइम न मिलने की अदावतें ज्यादा बढ़ गईं हैं। यह भी एक शाश्वत हकीकत है कि दुनिया में सबसे अधिक झूठ मोबाइल पर ही बोले जाते हैं। मोबाइल पर बोले जाने वाले प्रमुख झूठों में ‘बिजी’ और ‘टाइम’ ही हैं। मैंने तो संडास में मोबाइल लिए बैठे लोगों को भी ‘बिजी’ और ‘टाइम’ का बहाना मारते देखा है।
यों भी मोबाइल पर बोले जाने वाले सफेद झूठ संभवतः कम पकड़े जाते हैं।
हालांकि लोगबाग ऐसा कहते हैं कि अगला युद्ध ‘पानी’ के लिए लड़ा जाएगा मगर मुझे लगता है अगला युद्घ ‘बिजी’ और ‘टाइम’ जैसे शब्दों के लिए ही लड़ा जाएगा! दुनिया में जब सब बिजी और किसी के पास टाइम नहीं होगा तो अगला ऑप्शन युद्ध का ही बचता है।
धीरे-धीरे अब यह बात मुझे समझ आने लगी है कि क्यों लोग मुझसे कटे रहते हैं। क्योंकि जब भी कोई मुझे पूछता है- क्या कर रहे हो तो तुरंत बोल देता हूं- जी खाली हूं। फ्री हूं। जबकि मुझे ये न बोलकर हमेशा यही बोलना चाहिए- यार, बहुत बिजी हूं। सांस लेने तक का टाइम नहीं। तब लोग मुझसे ज्यादा खुश और जुड़े भी रहेंगे।
खाली और फ्री आदमी की समाज में कोई औकात नहीं।
फोटो साभार: गूगल







