‘पकौड़े का ठेला लगाने में भविष्य है। लाइफ एकदम सिक्योर्ड है।’ जब मेरा दिल पढ़ाई-लिखाई में न रमता था, तब मेरे ताऊ ने मुझे उक्त सलाह दी थी। लेकिन तब मैंने उनकी सलाह को ‘छोटा काम’ कहकर सिरे से नाकार दिया था। एक न सुनी थी उनकी। जिद पर अड़ गया था- पढ़-लिखकर कलेक्टर या वकील बनूंगा। मां-पिता जी के साथ-साथ अपना भी नाम ऊंचा करूंगा।
किस्मत का खेला देखिए, न कलेक्टर बना पाया न वकील; लेखक बनकर रह गया। एक ऐसा लेखक जिसकी न पूछ जात-बिरादरी में है न बीवी की निगाह में।
जबकि आज की तारीख में मुझसे कहीं ज्यादा कमाई पकौड़े का ठेला लगाने वाला करता होगा। रोज की कमाई। न महीने के अंत में सैलरी खत्म होने की चिंता न दोस्तो की उधारी निपटाने का झंझट। यहां तो दोहरी मुसीबत है। लिखने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं रहती की छपेगा ही। ऑफिस में बॉस की जी-हजूरी। घर में बीवी के सवाल-जबाव। जाऊं तो आखिर कहां जाऊं?
अब सोचता हूं तो मुझे खुद पर गुस्सा आता है। काश! तब मैंने ताऊ की सलाह पर गौर फरमा लिया होता तो आज शहर में मेरा भी एक पकौड़े का ठेला होता। हाथ में कलम की जगह पकौड़ा तलने वाली कलछी होती। गल्ला नोटों से भरा पड़ा रहता। जिंदगी के सारे ऐशो-आराम मेरे पास होते। मेरे बनाए पकौड़ों की न केवल शहर बल्कि विदेशों तक में डिमांड होती।
लेकिन इन दिनों जिस तरह से पकौड़े चर्चा में हैं, देख-सुनकर सुखद लग रहा है। चाहे किसी बहाने ही सही कम से कम देश के हुक्मरानों को पकौड़े की याद तो आई। पकौड़े पर गहन विमर्श व मंथन तो शुरू हुआ।
मेरे विचार में सरकार को एक पकौड़ा मंत्रालय बनाकर इसे न केवल राष्ट्रीय अपितु अंतरराष्ट्रीय रोजगार से जोड़ना चाहिए। पकौड़े देश के बेरोजगारों को रोजगार के नए रास्ते खोल सकते हैं। यह महज राजनीतिक बहसबाजी या बौद्धिक चुलाबाजी का मसला नहीं बल्कि निहायत ही गंभीर विषय है।
मैं यह बात पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि एकबार को लेखक का लेखन चौपट हो सकता है पर पकौड़े का ठेला नहीं। देश में जब तलक ठेले पर खाने वालों का दबदबा कायम है न पकौड़े का काम फेल हो सकता है न पानी-पूरी का। ये रोजगार के सबसे उम्दा साधन हैं। न किसी की गुलामी। न किसी बॉस की धौंस।
बस खुद में थोड़ा हिम्मत पैदा करने की बात है वरना पकौड़े बनाने का काम मैं भी कर सकता हूं। वही है न खुद के लेखक होने का अभिमान बीच में आ जाता है। लोग क्या कहेंगे का डर इस काम को करने से रोक देता है।
फिर भी, कोशिश करके देखता हूं। अगर हिम्मत साथ दे गई तो मैं आपको कुर्सी-बिस्तर में बैठ कुछ लिखते हुए नहीं बल्कि मोहल्ले के नुक्कड़ पर पकौड़े तलते हुए ही नजर आऊंगा।







