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    Home»साहित्य

    न्गूगी व थ्योंगो औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति के सबसे चर्चित पैरोकार

    By February 22, 2018 साहित्य No Comments10 Mins Read
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    जी के चक्रवर्ती
    केन्या गणतंत्र पूर्वी अफ्रीका में स्थित एक देश है। भूमध्य रेखा पर हिंद महासागर के सटे हुए इस देश की सीमा उत्तर में इथोपिया, उत्तर-पूर्व में सोमालिया, दक्षिण में तंजानिया, पश्चिम में युगांडा व विक्टोरिया झील  और उत्तर पश्चिम में सूडान से मिलती है। इसकी जनसंख्या लगभग 4.4 करोड़ है।
    इस केन्या के ‘आदिवासी’ लेखक न्गूगी दिनांक 14 फरवरी को कोलकाता, 16 फरवरी को बैंगलुरू में अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया एवं आगामी 23 फरवरी को भारत की राजधानी दिल्ली में साहित्य और समाज पर अपनी वक्तव्य रखेंगे। केन्या के इस ‘आदिवासी’ लेखक न्गूगी के भारत में होने का मतलब बहुत महत्व पूर्ण है, केन्या के लिजेंड्री लेखक और अनेक अंतरराष्ट्रीय पुस्कारों से सम्मानित न्गूगी व थ्योंगो औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति के सबसे चर्चित सिंद्धांतकार प्रवक्ता एवं पैरोकार हैं। इन्होंने पिछले कई दशकों से भारतीय साहित्य में लगातार दलित, आदिवासी और स्त्री सवालों व सृजन से घिरा हुआ है, शायद ‘हाशिये का साहित्य’ पर देश में चल रहे विमर्श को सही दिशा में ले जाने में हमारी मदद कर सकते हैं। ‘बहुजन साहित्य’ की नई अवधाराणाओं को प्रस्तुत  करने वाले लोगों को भी उनसे मदद मिल सकती है, बशर्ते कि वे केन्या के एक ‘आदिवासी’ लेखक को धैर्य पूर्वक सुनेे।
    उनके लेखन के केंद्र में औपनिवेशिकता के खिलाफ जैसे विषयवस्तु एवं अफ्रीकी आदिवासी जनता द्वारा किया गया  संघर्ष और सृजन रहा है, इस दृष्टि कोण से वे भारतीय जन साधारण के अत्यधिक निकट हैं। भारतीय समाज एवं साहित्य में आदिवासी, दलित एवं स्त्री सवाल वही हैं जिन्हें न्गूगी अफ्रीका के हवाले से हमेशा बोलते रहे हैं। उनके अनुसार, ‘एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिका जैसे देशों के बीच हमेशा से संबध रहा है, लेकिन वर्तमान सन्दर्भ में यह संबंध जैसे अदृश्य हो गया है। वह इसलिए कि यूरोप इन तीनों के आपसी विमर्शों के मध्य अब भी मध्यस्था की भूमिका में बना हुआ है।’ अफ्रीकनों एवं भारतियों के मध्य एक लंबे संबंधों के बीच पले-बढ़े न्गूगी इसीलिए इंसानी समुदायों की एकजूटता एवं सार्वभैमिकता की पैरवी अपने लेखन में करते आये हैं। इस अर्थ में न्गूगी जैसे लेखक का वर्तमान समय भारत में आना, जबकि यहाँ सांप्रदायिक असहिष्णुता चरम पर है, एक महत्वपूर्ण बौद्धिक परिघटना है। हमेशा से ऐसा महसूस किया गया है कि हमारे सामाजिक एवं बौद्धिक रूपांतरण में यूरोप की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है। औपनिवेशिक केन्या को भी यूरोप के भूगोल, इतिहास और उसके नजरिए से देखा गया।

    भारतीय लोगों के संबंध में, विशेषकर औपनिवेशिक दिनों में उनके द्वारा किये गए संघर्ष को, अफ्रीका के निर्माण में भारत गिरमिटिया मजदूरों और उद्यमियों के महत्त्व पूर्ण योगदान की चर्चायें न्गूगी ने विस्तार पूर्वक किया। उन्होंने जैसा बताया है कि औपनिवेशिक दिनों में भारत से ले कर गए मजदूरों का अफ्रीकन आदिवासी समाज और संस्कृति पर किस तरह का प्रभाव पड़ा। उनके अनुसार भारतीय पराठा , रोटी, एवं समोसा दूसरे रूप में  अफ्रीकन की जिंदगी के रोजमर्रा के खानपान में शामिल हो गया। वहीं, पर बहुत से अफ्रीकन समाज की चीजें भारतीय लोगों ने अपना लीया। इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा कि सद्भाव हमेशा एक जैसा नहीं रहता है। कालांतर में भारतीय समाज हम अफ्रीकनों से दूरी बरतने लगा है। शॉपिंग सेंटर के काउंटरों को छोड़कर शायद ही हमारे बीच किसी तरह का कोई सामाजिक संपर्क रहा है।

    ‘नकारा’, ‘कामचोर’ ‘जंगली’ जैसे नस्लीय अपमान वाले कुछ शब्द हमारी मातृभाषा गिकुयु में भी घुस आए हैं। जहां तक मुझे अपने बचपन के दिनों की याद है, ऐसा नस्लीय संघर्ष तब नहीं होता था।’

    न्गूगी ने अपने लेखन में उन सभी प्रभावों की चर्चा की हैं जो समाज में सायास और अनायास ढंग से संगठित एवं असंगठित दोनों रूप में चलती है। जैसे, ईसाइयत के प्रभाव पर उनके द्वारा की गई टिप्पणी है कि अफ्रीकन समाज (जिसमें वे खुद को भी शामिल हैं हालांकि वे ईसाई नहीं हैं) चाहे या अंचाहे चर्च के प्रभाव से खुद को अलग नहीं कर सकते हैं। इस तरह न्गूगी दो भिन्न समाजों के बीच होने वाले सांस्कृतिक सम्मिलन और नस्लीय संघर्ष को वे बहुत बारीकी से पकड़ते हैं। उसके बाहरी एवं भीतरी, सकारात्मक एवं नकारात्मक, दोनों पहलुओं की जांच-पड़ताल आदिवासी दृष्टि से करते हैं।

    न्गूगी केन्या के मात्र एक लेखक ही नहीं हैं। उनकी लेखकीय पहचान के कई आयाम भी हैं। वे एक शिक्षाविद् , एक अच्छे अध्यापक, नाटककार होने के साथ ही साथ एक राजनीतिक कर्मी भी हैं। उनकी एक खासियत है जो उनको समकालीन लेखकों से पृथक करती है, उनकी अपनी मातृभाषा के साथ गहरा सरोकार है, उनका ऐसा मानना हैं कि कोई भी समुदाय अपनी मातृभाषा के बिना अपने समाज में निर्वाह नहीं रह सकता। यह कोई नयी बात नहीं है, मातृभाषा की महत्ता तो असंदिग्ध है। न्गूगी जब नैरोबी युनिवर्सिटी के अंग्रेजी विभाग के प्राध्यापक नियुक्त हुए तो उन्होंने विभाग के दो सहयोगियों के साथ मिलकर ‘अंग्रेजी विभाग’ का नाम बदलने का एक जोरदार अभियान चलाया था। उनका ऐसा प्रस्ताव था कि अफ्रीका को अंग्रेजी विभाग की जरूरत नहीं है। इसका नाम अफ्रीकन भाषा-साहित्य विभाग होना चाहिए। उनके इस प्रस्ताव के अभियान की दुनियाभर में प्रशंसा होने के साथ ही साथ निंदा भी हुई, लेकिन उनका अभियान रंग लाया और साहित्य के विभाग से अंग्रेजी नाम हटा लिया गया, हालांकि 1970 में इस जीत के कुछ ही दिनों बाद उन्होंने विभाग से इस्तीफा दे दिया था क्योंकि नाम बदलने के बावजूद विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम वही था। जबकि वे चाहते थे कि शेक्सपीयर की जगह पाठ्यक्रम में अफ्रीकी साहित्य और साहित्यकारों को पढ़ाया जाना चाहिए। मातृभाषा एवं देशी साहित्य के प्रश्न पर अपने सृजन-संघर्ष की यात्रा में उन्होंने कई बार ऐसा दोहराया है।
    इस संदर्भ में हमारा देश न्गूगी से क्या ले सकता है? इस पर भारतीय समाज मुखतयः साहित्यकारो, बुद्धिजीवियों एवं राजनीतिज्ञयों को अवश्य विचार करना चाहिए। एसे लोग जो मातृभाषा एवं देशज-जनपदीय साहित्य के बारे में यदा-कदा बोलते तो हैं, लेकिन लेखन, पठन-पाठन और सार्वजनिक वाचन में उसे कभी महत्व नहीं देते। न्गूगी के अनुसार ऐसा तब तक होता रहेगा जब तक कि हम अपने विमर्शों से उस मध्यस्थ को बाहर निकाल नहीं फेंकते, जिसे औपनिवेशिक मानसिक गुलामी कहते हैं। खास तौर पर स्कूल और विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों से जिनमें पाश्चात्य बौद्धिकता का आतंक बुरी तरह से फैला हुआ है।
    अगर आदिवासी साहित्य में आदिवासियों को, दलित साहित्य में दलितों को, स्त्री साहित्य में स्त्रियों को, भोजपुरी में भोजपुरी साहित्य, मैथिली में मैथिली सांहित्य को नहीं पढ़ाया जायेगा तो फिर इसका महत्व ही क्या रह जायेगा। जैसा की कालिदास को हम संस्कृत, हिंदी, बांग्ला एवं तमिल जैसी भाषा में न पढ़ाया जाये। इसी तरह शेक्सपीयर अंग्रेजी में, हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में भी पढ़ाया जाना चाहिए जन साधारण की ज्ञान परंपरा को किसी और का बंधुआ बनाने की बजाय प्रत्येक भाषा-साहित्य की स्वयत्तता तो हो साथ ही साथ उन्हें भाषिक-सांस्कृतिक स्वतंत्रता भी मिले, देश की बहुसांस्कृतिक परंपरा के लिए यह अत्यंत जरूरी है। इन सबों के अभाव में भारत दिनोंदिन असहिष्णु होता जा रहा है। यह स्थिति कितना भयावह है इस बात का इससे अंदाजा लगया जा सकता है जब कि हम सरकार के दो प्रमुख साहित्यिक उपक्रमों नेशनल बुक ट्रस्ट या फिर साहित्य अकादमी के प्रकाशनों पर नजर दौड़ाते हैं।
    स्वदेशी भाषाओं के साहित्य का अर्थ लोकगीत व कहानियों से होने के अलावा कुछ साहित्यकारों की जीवनियों से भी है। आदिवासियों एवं जनपदीय भाषाओं का समकालीन साहित्य एक सिरे से इनके प्रकाशनों में गायब मिलते है। यह स्थिति बहुत चिंताजनक है कि हिंदी एवं अंग्रेजी में पहले से पढ़ा जा चुका साहित्य फिर से संताली, बोड़ो एवं मैथिली में ‘अनुवाद’ के नाम पर पुंनः धड़ल्ले से छापा जा रहा है। कालिदास, शेक्सपीयर, टैगोर आदि विश्वसाहित्य में राजनीतिक-सांस्कृतिक उद्देश्यों के लिए कुछ इस तरह से ‘सुरक्षित’ कर दिए गये हैं कि भोजपुरी के भिखारी ठाकुर और संताली के रघुनाथ मुर्मू दोनों असुरक्षित बने हुए हैं। इसलिए न्गूगी की यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि अब समय आ गया है जब हम अदृश्य को दृश्यगत बनाएं जिससे सम्पूर्ण दुनिया और अधिक महत्वपूर्ण, एवं अर्थवान बने सके।

    कौए का जादू-1: न्गुगी वा थ्योंगो

    मशहूर केन्याई उपन्यासकार न्गुगी वा थ्योंगो के उपन्यास विज़ार्ड ऑफ द क्रो के एक अंश का अनुवाद. अनुवाद: रेयाज़ उल हक़

    आबुरीरिया के आज़ाद गणतंत्र के दूसरे सुल्तान की अजीबोगरीब बीमारी के बारे में कई सारे कयास लगाए जाते थे, लेकिन उनमें पांच कयास ऐसे थे जो अक्सर लोगों की ज़ुबान पर रहते थे।

    पहले कयास के मुताबिक दावा किया जाता था कि उनकी बीमारी किसी वक्त उमड़ने वाले गुस्से का नतीजा है; और वो अपनी सेहत पर इसके खतरों से इस कदर वाकिफ थे कि वो इससे निजात पाने के लिए बस यही कर सकते थे कि वे हर खाने के बाद डकारें लें, कभी कभी एक से दस तक गिनती गिनें और कभी कभी ज़ोर ज़ोर से का के की को कू का जाप करें. कोई नहीं बता सकता था कि वो खास तौर से यही आवाज़ें क्यों निकालते थे. फिर भी उन्होंने मान लिया था कि सुल्तान की बात में दम था. जिस तरह कब्ज़ के शिकार इंसान के पेट में खलबली मचाने वाली हवा को निकालना ज़रूरी होता है ताकि पेट का बोझ हल्का हो जाए, एक इंसान के भीतर के गुस्से को भी निकालना ज़रूरी होता है ताकि दिल का बोझ हल्का हो सके. लेकिन इस सुल्तान का गुस्सा जाने का नाम नहीं लेता था और यह उसके भीतर खदबदाता रहा जब तक यह उनके दिल को खा नहीं गया. माना जाता है कि  आबुरीरिया की यह कहावत यहीं से पैदा हुई कि गुस्सा, आग से भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यह एक सुल्तान की रूह की तक को खा गई।

    लेकिन इस गुस्से अपना जाल कब बिछाया? जब राष्ट्रीय नज़ारे पर पहली बार सांप दिखाई दिए थे? जब धरती के कटोरे का पानी कड़वा हो गया था? या जब सुल्तान अमेरिका गए और ग्लोबल नेटवर्क न्यूज़ के मशहूर कार्यक्रम मीट द ग्लोबल माइटी में इंटरव्यू दे पाने में नाकाम रहे थे? कहा जाता है कि जब उन्हें बताया गया कि उन्हें एक मिनट के लिए भी टीवी पर नहीं दिखाया जा सकेगा, तो उन्हें अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ. वे यह तक नहीं समझ पाए कि वे लोग किस चीज़ के बारे में बात कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें मालूम था कि अपने मुल्क में वे हमेशा ही टीवी पर होते थे; उनका एक एक पल कैमरे में दर्ज होता था: चाहे वो खा रहे हों, पाखाना कर रहे हों, छींक रहे हों या अपनी नाक साफ कर रहे हों. यहां तक कि उनकी जम्हाइयां भी खबरें थीं, क्योंकि वे ऊब, थकान, भूख या प्यास, चाहे जिस भी वजह से आ रही हों, उनके बाद कोई न कोई राष्ट्रीय तमाशा अक्सर ही होता था: उनके दुश्मनों को सरेआम चौराहों पर चाबुक लगाया जाता, पूरे के पूरे गांव मिट्टी में मिला दिए जाते थे या तीर-धनुष वाले दस्ते लोगों को गोद-गोद कर मार डालते. उनकी लाशें सियारों और गिद्धों के लिए खुले में छोड़ दी जातीं।

    ऐसा कहा जाता है कि वो आबुरीरिया के परिवारों में झगड़े पैदा करने और दुश्मनी सुलगाते रहने के माहिर थे, क्योंकि उन्हें दुख भरे नजारों से ही सुकून मिलता था और वे चैन की नींद सो पाते थे. लेकिन अब ऐसा लगता था कि कोई भी चीज उनके गुस्से को बुझा नहीं पाएगी।

    चाहे उसकी आंच कितनी ही गहरी हो, क्या गुस्सा एक रहस्यमय बीमारी की वजह बन सकता है जिसके आगे तर्क और दवाओं के सभी उस्तादों ने हार मान ली हो?

    रचना साभार: http://hashiya.blogspot.in/

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