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    Home»साहित्य

    जब मंदिर बना ज़रिया… और मौन हुई मर्यादा…!

    ShagunBy ShagunJune 16, 2026 साहित्य No Comments9 Mins Read
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    When the temple became the means... and propriety fell silent...!
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    कहानी : चंद्रकांत शिवहरे

    बहुत समय पहले की बात है, एक समृद्ध देश की हरी-भरी वादियों में कौशलपुर नाम का एक सीधा-साधा नगर बसा था। वहां के लोग इतने भोले, मेहनती और धार्मिक प्रवृत्ति के थे कि उनकी सुबह खेतों में पसीना बहाते हुए उगते सूरज को अर्घ्य देने से होती और शाम ढलते ही बरगद के बूढ़े पेड़ के नीचे बैठकर मृदंग की थाप पर प्रभु का भजन करते हुए बीतती थी। उनकी जिंदगी में कोई बड़ा महल तो नहीं था, पर मन में संतोष का एक ऐसा अटूट भंडार था जो किसी भी राजा के खजाने से बड़ा था। इसी नगर में बच्चा नाम का एक किसान रहता था, जिसके पास दो बैलों की जोड़ी, एक छोटा सा खेत और एक टूटा-फूटा मगर खुशहाल घर था। बच्चा अपनी सूखी रोटी में भी प्रभु का प्रसाद समझकर खुश रहता और हर साल अपनी गाढ़ी कमाई का एक छोटा सा हिस्सा किसी भूखे की मदद या धर्म-कर्म के नाम पर एक मिट्टी की गुल्लक में सहेज कर रखता था।

    एक सुनहरी सुबह कौशलपुर की इस शांत जिंदगी में हलचल मच गई। बगल के चमचमाते नगर से कुछ सजे-धजे, रेशमी कुर्ते पहने चतुर लोग ढोल-नगाड़े बजाते हुए कौशलपुर के मुख्य चौक पर आ धमके। उन्होंने पूरे नगरवासियों को इकट्ठा किया और बड़े ही नाटकीय अंदाज में अपनी बाहें फैलाकर कहा, “भाइयों और बहनों! परम सौभाग्य की बात है कि हमारे आराध्य देव मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम का एक ऐसा विशाल और भव्य स्वर्ण मंदिर बनने जा रहा है, जिसकी चमक आसमान को छुएगी। जो भी इस पावन कार्य में अपनी तिजोरी खोलेगा, उसके लिए सीधे स्वर्ग के द्वार खुल जाएंगे और उसकी सात पीढ़ियां धन्य हो जाएंगी।”

    यह सुनते ही बच्चा और कौशलपुर के अन्य सीधे-साधे लोगों की आंखों में अगाध श्रद्धा के आंसू छलक आए। उन्होंने सोचा कि जिस ईश्वर ने उन्हें यह जीवन दिया है, उसके लिए अगर वे अपना सब कुछ भी न्योछावर कर दें, तो कम है। बच्चा दौड़ता हुआ घर गया और अपनी पत्नी के इकलौते सोने के कंगन और इस साल का पूरा अनाज बेचकर मिली पाई-पाई लाकर उन चतुर लोगों की झोली में डाल दी। देखते ही देखते, नगर के अन्य गरीबों ने भी अपनी भूख मारकर, अपनी दवाइयों और बच्चों की पढ़ाई के पैसे दान कर दिए। कुछ ही महीनों में उस पावन स्थान पर संगमरमर और सोने की चमक वाला एक गगनचुंबी मंदिर खड़ा हो गया, जिसके आगे नगर की झोपड़ियां और छोटी दिखने लगीं।

    उस समृद्ध देश के राजा साहब जो ठान लेते हैं वो जरूर करते हैं, फिर वो तर्कसंगत हो या न हो, न्यायसंगत हो या न हो, शास्त्र सम्मत हो या न हो! राजा साहब तो राजा साहब ठहरे! राजा साहब आधे-अधूरे मंदिर में ही भगवान की मूर्ति स्थापित करने की जिद पर अड़ गए, तो उस समृद्ध देश के बहुत से शास्त्र ज्ञाता, पुरोहित और तमाम विद्वजन राजा साहब के सिपहसालारों के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो गए। नगर के पुरोहित बाबा बबलू महाराज ने राजा साहब से कांपती आवाज में कहा, “हुजूर! अभी मंदिर का मुख्य शिखर और छत अधूरी है। शास्त्रों की मर्यादा के अनुसार अधूरे गर्भगृह में भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा नहीं की जा सकती। अपनी जिद के लिए धर्म की मर्यादा मत तोड़िए!” परंतु राजा तो राजा ठहरे। पुरोहित की बात को सत्ता के अहंकार के नीचे ऐसे दबा दिया गया जैसे कुछ हुआ ही न हो। प्राण-प्रतिष्ठा का उत्सव ऐसा धूमधाम से मनाया गया कि मंदिर के भीतर भगवान की मूरत तो बहुत छोटी रह गई, लेकिन राजा साहब की आदमकद तस्वीरें पूरे राज्य के नगर- नगर और गाँव-गाँव की दीवारों में चित्रकारी द्वारा सजा दी गईं। राजा मन ही मन बहुत खुश हुआ कि उसके राज्य की जनता को इस पर कोई ऐतराज नहीं है कि भगवान से बड़ा राजा है!When the temple became the means... and propriety fell silent...!

    कुछ समय बाद जब इस समृद्ध देश में राज परिवारों के बीच चुनाव हुए, तो कौशलपुर के उन लोगों ने, जिनके आशियाने और छोटी-छोटी दुकानें मंदिर के रास्ते को शाही और चौड़ा बनाने के नाम पर बिना किसी मुआवजे के रातों-रात ढहा दी गई थीं, उन्होंने अपने आंसुओं का बदला वोट की चोट से दिया। उन्होंने चुपके से राजा के सबसे चहेते वजीर को चुनाव में हरा दिया। फिर क्या था? जो राजा कल तक कोशलपुर को भाग्य विधाता कह रहा था वो और उसके कारिंदे जगह-जगह चौपालों पर पूरे कौशलपुर गांव को गद्दार, कपटी और विकास विरोधी कहना शुरू कर दिया गया। जो जनता कल तक पूजनीय थी, वह सिर्फ एक वोट न देने पर अचानक व्यवस्था की नजर में खलनायक बन गई। इसके तुरंत बाद, जब राजा साहब ने देखा कि यहां की जमीन खिसक चुकी है, तो वे पलक झपकते ही पड़ोसी सूबे की तरफ चले गए, जहां की जनता किसी दूसरे देवता को मानती थी। राजा ने वहां पहुंचते ही अपना पुराना झंडा उतारा और नए देवता का जयकारा लगाना शुरू कर दिया। वजीरों ने पीछे खड़े होकर आपस में कानाफूसी की, “ये देवता और भावनाएं तो केवल सत्ता की सीढ़ियां हैं, जहां जिससे काम निकल जाए, वही भगवान सबसे बड़ा है।”

    तमाशा यहीं नहीं रुका, सत्ता का अहंकार अभी और रंग दिखाने वाला था। जैसे ही मंदिर के कपाट खुले, कौशलपुर की कहानी का रंग बड़ी तेजी से बदलने लगा। एक सुबह पूरे नगर में कोहराम मच गया कि मंदिर की शाही तिजोरी का ताला टूटा हुआ है और भक्तों के चढ़ावे की भारी-भरकम रकम गायब है। लोग हैरान-परेशान थे कि भगवान के घर में ऐसी दुस्साहसिक चोरी कैसे हो सकती है? अभी लोग सोच ही रहे थे कि नगर के सिपाहियों ने लवलेश नाम के एक मामूली, फटेहाल पहरेदार को जंजीरों में जकड़कर पेश कर दिया। सिपाहियों ने दावा किया कि लवलेश के पास से कुछ धन बरामद हुआ है और जो पहरेदार कल तक फटी कमीज सिलवाने के पैसे नहीं रखता था, वह आज अचानक आलीशान मकान खड़ा कर रहा है।

    बच्चा को यह बात हजम नहीं हुई। वह सीधा पंचायत में गया और वहां बैठे दीवान जी की आंखों में आंखें डालकर पूछा, “मालिक, यह मामूली पहरेदार, जो रात भर लाठी लेकर बाहर घूमता है, वह इतनी बड़ी और सुरक्षित तिजोरी का आधुनिक ताला अकेले कैसे खोल सकता है? इसके पीछे जरूर कोई बड़े रसूखदार और रंगे सियार शामिल हैं।” दीवान जी ने अपनी सफेद मूंछों पर ताव दिया और बच्चा को डांटते हुए बोले, “बच्चा, तुम अपनी औकात में रहो और चुपचाप अपना काम करो। यह मंदिर का अंदरूनी मामला है। राजा साहब ने इस महाघोटाले की जांच के लिए तीन बहुत ही समझदार मंत्रियों की एक विशेष टोली बना दी है, वह सब संभाल लेगी।” बच्चा चुपचाप लौट आया, लेकिन वह समझ गया था कि असली मगरमच्छों को बचाने के लिए इस छोटी सी मछली को चारा बना दिया गया है।

    लूट और अंधेरगर्दी का यह चक्र केवल मंदिर की दीवारों तक सीमित नहीं रहा। राजा साहब ने चुनाव का खर्च निकालने और अपने सबसे चहेते धनी व्यापारी की तिजोरी भरने के लिए कौशलपुर के पास के उस घने और प्राचीन जंगल को कौड़ियों के दाम बेच दिया, जहां सदियों से गरीब आदिवासी प्रकृति की गोद में रहते आए थे। जब उस जंगल में आरे और कुल्हाड़ियां चलीं और सदियों पुराने पेड़ रोते हुए जमीन पर गिरने लगे, तो अपनी मातृभूमि को बचाने के लिए रोते-बिलखते आदिवासियों को तरक्की का दुश्मन और बागी कहकर जेल की काल कोठरियों में डाल दिया गया। पूरा नगर इस विनाश और अन्याय को देखकर अंदर तक दहल गया था। लोगों ने अपनी आस्था भी खो दी थी और अपनी जमा-पूंजी भी।

    तभी एक शाम, जब नगर के लोग पूरी तरह हताश और उदास बैठे थे, नगर के बुजुर्ग और महा ज्ञानी बाबा जिन्हें लोग प्यार से चंदू बाबा कहते थे, बरगद के पेड़ के नीचे आए। उन्होंने सबको सिर झुकाए देखा तो मुस्कुराकर बोले, “अरे पागलों! तुम आज के इस तमाशे पर इतने हैरान और दुखी क्यों होते हो? आस्था और विश्वास के नाम पर ठगहाई का यह आलम तो आदिम काल से चल आ रहा है। सत्ता के मोह में बंधे चालबाजों ने हमेशा भगवान के डर और इंसान की मासूमियत का फायदा उठाकर अपनी जेबें भरी हैं।”

    चंदू बाबा ने सबकी आंखों में देखते हुए एक ऐसा साफ और दिव्य संदेश दिया जिसने कौशलपुर के लोगों के सोचने का ढंग हमेशा के लिए बदल दिया। बाबा ने कहा, “याद रखो, मंदिर की तिजोरी से इंसानों का दिया धन गायब हो सकता है, स्वार्थी लोग, शाही लोग, अपने फायदे के लिए पल भर में नारे और झंडे बदल सकते हैं, और लालची पूंजीपति तुम्हारे जंगलों को काट सकते हैं। परंतु जो सच्चा ईश्वर है, वह किसी शाही पास, सोने के महल या संगमरमर की दीवारों का मोहताज नहीं है।

    संसार के सभी धर्मों की असली और एकमात्र पूंजी सिर्फ मानवता है। किसी भूखे को प्यार से रोटी देना, किसी रोते हुए असहाय के आंसू पोंछना, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और प्रकृति के कण-कण का सम्मान करना ही सच्ची आस्था है। जब तक तुम पत्थरों की बेजान इमारतों में भगवान को ढूंढकर इन पाखंडियों के सामने सिर झुकाते रहोगे, तब तक ये चालाक लोग तुम्हें धर्म का डर दिखाकर ठगते रहेंगे। जिस दिन तुम एक भूखे, लाचार और सच्चे इंसान के भीतर इंसानियत को देखना शुरू कर दोगे, समझ लेना उस दिन तुम्हारे भीतर का सच्चा धर्म जाग गया है।”

    आज भी कौशलपुर के उस भव्य मंदिर के लाउडस्पीकरों पर भजन बहुत ऊंचे और कर्णभेदी सुरों में बजते हैं, लेकिन उस ऊंचे शोर के पीछे अगर कोई ध्यान से सुने, तो चढ़ावे की चोरी की खनक, कटते हुए जंगलों की कराह, जेल में बंद बेगुनाह आदिवासियों की सिसकियां और अपनी गाढ़ी कमाई लुटा चुके आम नागरिक की बेबसी साफ सुनाई देती है। चालाक लोग आज भी नए-नए नारे गढ़कर अपनी जेबें गरम कर रहे हैं, लेकिन कौशलपुर के लोगों के दिलों में अब चंदू बाबा के ज्ञान का दीया जल चुका है। वे समझ गए हैं कि पत्थरों के वैभव में लिपटी सत्ता कभी ईश्वर नहीं हो सकती, और सच्ची आस्था आज भी भव्य महलों से बाहर निकलकर, इंसानी हमदर्दी और न्याय की राह देख रही है।

    Shagun

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