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    प्रेम के रंगों से सजी होली

    By March 8, 2020 Featured No Comments6 Mins Read
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    फोटो: आज़म हुसैन
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    Post Views: 558
    जी के चक्रवर्ती
    हमारे देश में मनाई जाने वाली विभिन्न त्याहारों में से होली एकदम अलग तरह का है। यह त्यौहार ऐसा है जो सबको रंगों में डुबो कर एक सामान बना देता है। होली भारत के विभिन्न संस्कृतियों का एकाकार कर देने वाला प्यार भरा आनंदित, उल्लास एवं आपस में मेलजोल बढ़ाने और बुराई के अंत का यह त्यौहार बहुत ही रंग रंगीला होता है। हमारे देश में यह त्यौहार विशेषतः हिन्दू धर्म को मानने वाले लोगों द्वारा मनाया जाता हैं। लेकिन हमारा देश एक विविधताओं वाला देश है। यहाँ विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय के व्यक्तियों द्वारा सभी त्यौहारों को आपस में मिल जुल कर मनाने का प्रचलन है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन सभी लोग अपनी समस्त कटुताओं को भुला कर मित्रवत व्यवहार करते है और एक दूसरों के चेहरे पर रंग, अबीर, गुलाल लगाते हैं। रंगों का यह त्यौहार भारत के साथ साथ दुनिया भर में एक ही दिन मनाये जाने से लोगो को यह बरवश अपनी ओर आकर्षित करता है। इस त्यौहार को हमारे देश में कब और क्यों मनाया जाता शायद हम में से बहुत से लोगों को यह पता भी नहीं है?
    क्या है इसका इतिहास और क्यों इस त्यौहार में रंगों का इस्तेमाल होता है? रंगों के इस त्यौहार को कब और क्यों मनाया जाता है? होली भारत वर्ष में बहुत उत्साह एवं उल्लास से बसंत ऋतु में मनाया जाने वाला त्यौहार है। हिन्दू मतानुसार होली फाल्गुन महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है।
    हमारे भारतीय संस्स्कृति में होलिका दहन की कहानी का विशेष महत्व है। जो इस प्रकार से है। प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक राक्षस हुआ करता था।वह बहुत से कुकर्म तरह-तरह से लोगों को डराना एवं जान से मार डालना एवं लोगों पर अत्याचार करता था। उसकी यह प्रवल इच्छा थी कि समाज के सभी लोग उसकी भगवान् की जगह पूजा अर्चना करें। राक्षस हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद ने उसे भगवान की तरह मानने एवं पूजा अर्चना करने से स्पष्ट इंकार कर दिया था। प्रह्लाद ईश्वर का भक्त होने के साथ ही साथ सदैव भगवान का नाम लेता रहता था। उसकी यह बात राक्षस को बिलकुल अच्छी नही लगती थी। उसे ऐसा लगा कि यदि स्वमं उसका अपना ही पुत्र उसे प्रभु मानने से इंकार कर रहा है तो  अन्य लोग भी उसे भगवन मानने से इंकार कर देंगे और उसके बारे में क्या सोचेंगे।
    हिरण्यकश्यप की एक बहन होलिका हुआ करती थी। होलिका ने अपने तपोबल से ईश्वर से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि उसे आग कभी जला नहीं पाएगी। इसलिए उसने प्रह्लाद को मरने के लिए अपने भाई को यह सुझाव दिया की प्रह्लाद को उसकी गोद में बिठा कर आग में जला दिया जाए। जिसमें वह वरदान के कारण बच जाएगी और प्रहलाद का अग्नि में जलने से अंत हो जायेगा। यह विचार कर होलिका और प्रह्लाद को एक साथ बिठा कर जलाया गया तो प्रह्लाद इश्वर का नाम लेता रहा और बच गया। वहीं होलिका अपने वरदान का अनुचित उपयोग करने के कारण जल कर भष्म हो गयी।
    उस दिन से ये होली का त्यौहार अस्तित्व में आया। होलिका दहन का प्रचलन आज भी है और होली से एक दिन पहले होलिका दहन की इस परंपरा को लोगों द्वारा आज भी निभाया जाता है। होलिका दहन के बाद एक दूसरे के चेहरे पर विभिन्न रंगों को लगा कर ख़ुशी जाहिर किया जाता है। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के मथुरा में श्री कृष्ण द्वारा होली के दिन राधिकाओं के संग होली खेल कर मनाया गया था जिसकी वजह से आज भी विशेष कर मथुरा में इस रंगों के त्यौहार को विशेष प्रकार से मनाए जाने का परंपरा है। कान्हा कि नगरी में बसंत पंचमी से ही होली का महोत्सव मनना प्रारम्भ हो जाता है। हमेशा की तरह इस वर्ष भी 22 जनवरी 2018 से ही यहां होली का महोत्सव शुरू हो गया था। प्रति वर्ष यहां पर होली की शुरुआत ब्रज के बाबा वृषभानु के गांव बरसाना से प्रारम्भ होती है जो राधा की जन्मस्थली है। यहां पर खेली जाने वाली होली विश्वभर में प्रसिद्ध है। बरसाना के प्रत्येक शहर में अलग-अलग तरह से होली मनाई जाती है। कहीं फूलों की होली तो कहीं पर लड्डुओं की होली खेली जाती है।
    यहां कि सबसे प्रसिद्ध होली, लठ्ठमार होली मानाया जाता है। यह होली खेलने एवं देखने के लिए उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से लोग होली यहाँ पर आते हैं। ब्रजवासी अपने इस त्यौहार को मनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। लठ्ठमार होली केवल आनंद प्राप्ति के लिए ही नहीं बल्कि यह लेकिन कान्हा कि नगरी में बसंत पंचमी से ही होली का महोत्सव शुरू हो जाता है। इस वर्ष भी 22 जनवरी से ही यहां होली का महोत्सव शुरू हो गया है। प्रत्येक वर्ष यहां होली का प्रारंभ ब्रज के बाबा वृषभानु के गांव बरसाना से शुरू होती है जो श्रीराधा जी का जन्मस्थली है। यहां कि होली विश्वभर में प्रसिद्ध है। बरसाना के हर शहर में विभिन्न-विभिन्न प्रकार से होली मनाई जाती है। कहीं फूलों की होली तो कई लड्डुओं की होली मनाई जाती है।
    श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ राधा रानी के साथ होली खेलने के लिए बरसाना में आया करते थे। परंतु राधा रानी अपन सखियों संग मिलकर बांस के लाठियों से उन्हें दौड़ा- दौड़ा कर मरती है। ब्रज में लठ्ठमार की परंपरा प्रचिलत हुई। ऐसा कहा जाता है कि श्रीकृष्ण महिलाओं का सम्मान करते थे और मुसीबत के समय में हमेशा उनकी रक्षा भी किया करते थे, लठ्ठमार होली में श्रीकृष्ण के उसी संदेश को प्रदर्शित किया जाता है। इस होली को खेलते हुए महिलाएं थोड़ी चुलबुली अंदाज में लठ्ठमार होली के माध्यम से अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती हैं।
    बरसाना में इस लठ्ठमार होली को मनाने के एक दिन पश्चात नंदगांव में भी होली मनाई जाती हैं। यहां बरसाना के पुरुष नंदगांव की महिलाओं के साथ रंग खेलने पहुंचते हैं, लेकिन महिलाएं बदले के तौर पर उन्हें लाठियों से मारती हैं। होली के पर्व पर कान्हा की इस नगरी में चारो तरफ उड़ते रंग, गुलाल एवं आनंदित मग्न माहौल में विदेशी लोग भी यहाँ पर होली खेलने के लिए आते हैं।
    Image may contain: one or more people, drink and indoor
    जैसे जैसे समय गुजरता रहा होली को मानाने का अंदाज तौर तरीके में बहुत बदलाव आ चुका है, जिसके कारण समाज के लोगों में आदर्शों में कमी आजाने से पूर्व में लोगों द्वारा पालन करने वाले आचरणों में आधुनिकता का रंग चढ़ जाने के कारण को रंगों को लगाने से लेकर उसके स्तरों तक में कोई न तो जानकारी करता है और नहीं जानना चाहता है जिसके कारण आजकल बाजारों में विकने वाले रंगों के स्तरीय न होने से त्वचा को नुकसान पहुंचाने वाले रंग खेले जाते हैं। यह सरासर गलत है। इस मनभावन त्योहार पर रासायनिक लेप व नशे आदि से दूर रहते हुए इसे मनाया जाना चाहिए एवं विशेष कर बच्चों के प्रति खाश सावधानी रखनी चाहिए। बच्चों को बड़ों की निगरानी में ही होली खेलना चाहिए। दूर से गुब्बारे फेंकने से आंखों में घाव भी हो सकता है। रंगों को भी आंखों और अन्य अंदरूनी अंगों में जाने से रोकना चाहिए। इस प्रकार से होली आनंद पूर्वक मनाना चाहिए।

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