- उप्र सरकार द्वारा 5 जिलों के लिये निजीकरण का लिया गया फैसला नियामक आयोग आदेशों का खुला उल्लंघन।
- नियामक आयोग पहले की कर चुका है आदेश किसी भी क्षेत्र में फ्रेन्चाइजीकरण व निजीकरण से होने वाले उपभोक्ता लाभों व चयन के आधार पर आयोग देना होगा जवाब।
- पूर्व सपा सरकार में 2006 में कैबिनेट निर्णय के आधार पर लखनऊ के ग्रामीण क्षेत्र को सरकार ने दी थी फ्रेन्चाइजी, उपभोक्ता परिषद की याचिका पर आयोग ने लगा दी थी रोक।
लखनऊ, 17 मार्च। यूपी सरकार की कैबिनेट द्वारा लखनऊ सहित गोरखपुर, वाराणसी, मेरठ व मुरादाबाद का निजीकरण करने हेतु लिये गये फैसले के बाद पूरे प्रदेश की विद्युत उपभोक्ताओं में भारी रोष व्याप्त है। पहले उप्र की सरकार ने प्रदेश के ग्रामीण व किसानों की बिजली दरों में 50 से 150 प्रतिशत वृद्धि करायी और अब निजी घरानों को सौंपने का निर्णय लिया गया है। जिसका हर स्तर पर विरोध किया जायेगा।
उप्र सरकार शायद यह भूल गयी है कि इसी तरह सपा सरकार में 2006 में लखनऊ के ग्रामीण क्षेत्र को एक कोआपरेटिव सोसाइटी को मा. मुलायम सिंह कैबिनेट द्वारा फ्रेन्चाइजी के रूप में दिया गया था, जिस पर उपभोक्ता परिषद की एक याचिका पर नियामक आयोग द्वारा अविलम्ब रोक लगा दी गयी थी। उस समय के तत्कालीन ऊर्जा मंत्री श्री शिवपाल सिंह यादव को कार्यक्रम स्थल से बैरंग लौटना पड़ा था। उसके बाद वर्ष 2012 में पुनः सपा सरकार द्वारा गाजियाबाद वाराणसी मेरठ व कानपुर को निजी क्षेत्र में पीपीपी माडल लागू करने का आदेश दिया गया, जिस पर उपभोक्ता परिषद द्वारा पुनः आयोग में याचिका दाखिल की गयी। जिस पर आयोग द्वारा 2 अप्रैल 2013 को पावर कार्पोरेशन के चेयरमैन को यह निर्देश दिये गये थे कि जिन भी विद्युत क्षेत्रों में निजीकरण व फ्रेन्चाइजी करण की भावी योजना है, उससे भविष्य में उपभोक्ताओं को क्या लाभ होगा तथा उसके चयन का क्या आधार होगा, से पहले आयोग को अवगत कराया जाये।
ऐसे में कल कैबिनेट द्वारा 5 जिलों में निजीकरण करने का लिया गया फैसला नियामक आयोग आदेशों का खुला उल्लंघन है। इसी बीच 2014 में जब पावर कार्पोरेशन के प्रबन्ध निदेशक द्वारा पुनः निजी करण का चालू किया गया था। उस पर आयोग द्वारा उपभोक्ता परिषद की शिकायत पर तत्कालीन प्रबन्ध निदेशक को आयोग द्वारा विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 142 के तहत नोटिस दी गयी थी, जिस पर पावर कार्पोरेशन के तत्कालीन प्रबन्ध निदेशक द्वारा पावर कार्पोरेशन को जवाब भेजकर निजीकरण न करने बल्कि पीपीपी माडल का अध्ययन कराने की बात कही गयी थी। का आश्वासन दिया गया था और उप्र राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि विगत दिनों जब 7 सर्किल में इन्टीग्रेटेड सर्किल प्रोवाइडर की निविदा निकाली गयी थी, उसको लेकर उपभोक्ता परिषद ने नियामक आयोग में 5 फरवरी 2018 को पुनः लोक महत्व जनहित प्रत्यावेदन दाखिल कर निजी करण का विरोध किया गया था। मामला अभी भी नियामक आयोग में विचाराधीन है। ऐसे में उप्र सरकार द्वारा जल्दबाजी में निजीकरण का लिया गया फैसला आयोग आदेशों के विपरीत है।
उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष ने कहा कि उप्र सरकार को शायद यह पता ही होगा कि टोरेन्ट पावर व नोएडा पावर कम्पनी निजीकरण के प्रयोग उपभोक्ता विरोधी साबित हुए हैं। टोरेन्ट पावर का जब निजीकरण किया गया उस दौरान भाजपा के नेता आगरा में सबसे ज्यादा विरोध व प्रदर्शन कर रहे थे। आज उनकी नीति कहां चली गयी, सरकार को क्या यह मालूम है कि निजीकरण का पहला प्रयोग नोएडा पावर कम्पनी जो ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में बिजली का काम कर रही है। उस क्षेत्र के अन्तर्गत ग्रामीण इलाकों को आज भी 10 से 12 घण्टे बिजली मिल रही है। जबकि सरकार पूरे प्रदेश में 18 घण्टे बिजली देने की बात कर रही है। क्या नोएडा पावर कम्पनी के अन्तर्गत आने वाले गांवों को केवल 10 से 12 घण्टे ही बिजली मिलेगी। सरकार यह समझ ले कि निजी घराने केवल अपने लाभ के लिये ही काम करते हैं, उन्हें आम जनता से कोई सरोकार नहीं।







