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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    सियासी सौदे में खाली हाथ बसपा

    By March 24, 2018Updated:March 24, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    Post Views: 608
    डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
    बसपा और सपा का घोषित सियासी सौदा फिलहाल तात्कालिक था। इसमें लोकसभा के दो और राज्यसभा की एक सीट को शामिल किया गया था। इस सौदे में सपा को शत प्रतिशत मुनाफा हुआ। उसके लोकसभा व राज्यसभा के तीनों उम्मीदवार विजयी रहे लेकिन बसपा खाली हाथ रही।
    एक दूसरे पर कितना विश्वास था, यह मायावती के बयान से ही जाहिर था। मायावती ने कहा था कि राज्यसभा में उनके एजेंट को वोट दिखाने होंगे। फिर भी कामयाबी नहीं मिली।
    बिडंबना देखिये, बसपा महासचिव सतीशचन्द्र मिश्र ने भाजपा को दलित विरोधी करार दिया है। उनका कहना था कि बसपा उम्मीदवार का नाम भाजपा को पसंद नहीं। जबकि पराजय संबन्धी सवाल तो सपा से करना चाहिए था। गठजोड़ भाजपा से नहीं सपा से था। भाजपा ने तो एक दलित महिला को यहां से राज्यसभा भेजा है। यह वही भाजपा है जिसने गेस्टहाउस हमले के समय मायावती की जान बचाई थी। तीन बार उन्हें कम संख्या के बाद भी मुख्यमंत्री बनाया। जहाँ तक उम्मीदवार के नाम का प्रश्न है, तो पहला जबाब बसपा को ही देना होगा। जब वह अपने उम्मीदवार को राज्यसभा में भेजने की हैसियत में थी, तब उन पर विचार क्यों नहीं किया। अब नाम की बात हो रही है। भीमराव अंबेडकर के नाम पर पांच तीर्थों के निर्माण नरेंद्र मोदी ने ही कराया है। दलितों पर जुल्म के संबन्ध में बसपा नेता सपा पर किस प्रकार के आरोप लगाते थे, उसे भी याद कर लेना चाहिए। दोनों के बीच तल्खी को यहां के लोग भूल नहीं सकते। कुछ महीने पहले तक इनका आपस मे बात करना भी मुनासिब नहीं था।
    बसपा के लिए सपा से गठबन्धन करना आसान नहीं रहा होगा। न जाने कितने दुःस्वप्न आंखों में तैर गए होंगे। न जाने कितनी अमर्यादित टिप्पणी कानों में गूंज गई होंगी। इन सबसे ऊपर दो जून का गेस्ट हाउस कांड, मायावती ने मौत का मंजर देखा होगा। जीवन का अधिकार सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। अन्य सभी बातें इसके बाद आती है। मायावती आजीवन उस घटना को भूल नहीं सकती । उस समय उनके कई समर्थकों ने भी हमले झेले थे। उस दुःस्वप्न से उबरना इनके लिए भी कभी संभव नहीं होगा। मायावती सहित ये सभी लोग भाजपा नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी को भी नही भूल सकते।  जिन्होंने अपनी जान दांव पर लगा कर इन सबकी जान बचाई थी। लेकिन मायावती ने यह साबित कर दिया कि राजनीति में सत्ता, जीत, कुर्सी, सीट यही सब वास्तविक है। यह नहीं तो जीवन व्यर्थ समझिए।
    ऐसा न होता तो सपा से गठबन्धन संभव ही नहीं था। यह कार्य दिल पर पत्थर रख कर ही किया गया। मायावती ही नहीं उनके सभी समर्थकों के लिए यह बड़ी पीड़ा की भांति था। मायावती को तो सत्ता भी मिली, वह राज्यसभा में रहीं, उनको उच्च श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त है। उनके छोटे भाई, माता पिता, सबके जीवन स्तर में जमीन आसमान का अंतर आ गया।  लेकिन गांव तक रहने वाले उनके समर्थकों ने तो सपा शासन में केवल अवहेलना झेली है। इनके लिए मायावती का सपा से समझौता हतप्रभ करने वाला था। वैसे गोरखपुर और फूलपुर में बसपा समर्थकों का सपा के प्रति उत्साह नदारत था। कम मतदान इसका प्रमाण था।
    इतना करने के बाद भी मायावती खाली हाँथ रही। यह उनका समझौता नहीं बल्कि सौदा था। इसी को गठबन्धन कहा गया। मायावती ने सौदे का फार्मूला बताया था। उन्होंने खुद बताया था कि राज्यसभा चुनाव में बसपा को सपा और कांग्रेस समर्थक देगी। बदले में बसपा गोरखपुर और फूलपुर में सपा उम्मीदवारों को समर्थन देगी।
    इस सौदे में केवल सपा को लाभ हुआ, गोरखपुर और फूलपुर में सपा उम्मीदवार जीते। राज्यसभा में भी उसकी उम्मीदवार जया बच्चन विजयी रही। लेकिन इस तात्कालिक सौदे में बसपा खाली हाँथ रही। इतना तो तय हुआ कि  सपा ने राज्यसभा में अपने उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित कराने को ज्यादा प्राथमिकता दी।
    सवाल यह भी है कि बसपा राज्यसभा चुनाव के लिए इतनी परेशान क्यों थी। कुछ दिन पहले मायावती ने राज्यसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया था। उनका आरोप था कि उनको अपनी बात रखने से रोका जा रहा है। यदि मायावती के  आरोप को सही मानें तो बसपा के उम्मीदवार को राज्यसभा भेजने की जरूरत ही नहीं थी। जब मायावती को बोलने नहीं दिया जा रहा था, तब उनके ये उम्मीदवार राज्यसभा पहुंच कर क्या कर लेते। इन्हें तो बोलने का अधिकार ही मायावती ने नहीं दिया था।
    यह सही है कि लोकसभा के दो उपचुनाव और राज्यसभा के एक चुनाव से भविष्य के बड़े निष्कर्ष नही निकाले जा सकते। लेकिन इतना तय है कि सपा और बसपा का गठजोड़ स्वभाविक नहीं है। इसकी यात्रा सकारात्मक नहीं हो सकती। क्योंकि इससे ज्यादा मुश्किल लोकसभा और लोकसभा से बहुत ज्यादा कठिनाई विधानसभा चुनाव में पेश आएगी। उसमें तो नेतृत्व का मुद्दा सामने होगा। उदारता और सदाशयता की परीक्षा तभी होगा। फिलहाल बसपा को चाहिये कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नसीहत पर ध्यान दे। योगी ने कहा है कि खाई में गिरने से अच्छा है कि ठोकर खाकर संभल जाए।
    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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