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    Home»उत्तर प्रदेश

    सिद्धांतों की बलिवेदी में सत्ता का बलिदान देने वाला जननायक

    ShagunBy ShagunAugust 21, 2026 उत्तर प्रदेश No Comments5 Mins Read
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    (21 अगस्त को हिंदू गौरव दिवस पर विशेष) उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का व्यक्तित्व आज की पद लोलुपता वाली सियासत के लिए आईना

    A people's leader who sacrificed power at the altar of principles.लोधी सत्येंद्र पाल सिंह

    भारतीय राजनीति के मंच पर जननायक तो अनेक आए और चले गए, लेकिन कुछ विभूतियाँ ऐसी होती हैं जिनका व्यक्तित्व सत्ता के मुकुट से नहीं, बल्कि उनके सिद्धांतों के आभामंडल से देदीप्यमान होता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान के पूर्व राज्यपाल और राजनीति के ‘बाबूजी’ कहे जाने वाले स्वर्गीय कल्याण सिंह एक ऐसा ही नाम हैं, जिन्होंने सत्ता को कभी साध्य नहीं माना, बल्कि उसे सदैव जनता की सेवा और अपने वैचारिक नैतिक मूल्यों की रक्षा का साधन मात्र समझा। कल्याण सिंह का संपूर्ण राजनीतिक जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि जब-जब सत्ता और सिद्धांतों के बीच चुनाव का अवसर आया, उन्होंने बिना पलक झपकाए सत्ता के शीर्ष पद को तिनके की भांति त्याग दिया और अपने सिद्धांतों का ध्वज ऊंचा रखा।

    भारतीय लोकतंत्र का इतिहास 6 दिसंबर 1992 की उस ऐतिहासिक घटना को कभी भूल नहीं सकता, जब अयोध्या में रामजन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था। लाखों रामभक्त अयोध्या में एकत्र थे और परिस्थितियां अत्यंत संवेदनशील थीं। एक मुख्यमंत्री के नाते कल्याण सिंह के सामने दो ही रास्ते थे या तो वे निर्दोष कारसेवकों पर गोलियां चलाने का आदेश देकर अपनी सरकार और मुख्यमंत्री की कुर्सी बचा लेते, या फिर कारसेवकों की रक्षा करते हुए नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र दे देते। कल्याण सिंह ने बिना किसी झिझक के दूसरा मार्ग चुना। उन्होंने स्पष्ट आदेश दिए कि किसी भी स्थिति में कारसेवकों पर गोली नहीं चलाई जाएगी, चाहे इसके लिए उनकी सरकार ही क्यों न चली जाए।

    जब ढांचा ढहा, तो उन्होंने किसी अन्य अधिकारी, पुलिस प्रशासन या केंद्र सरकार पर दोषारोपण करने के बजाय संपूर्ण नैतिक जिम्मेदारी स्वयं अपने कंधों पर ली। घटना के कुछ ही घंटों के भीतर उन्होंने राजभवन जाकर अपना त्यागपत्र सौंप दिया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में भी निर्भीकता से कहा था कि जो कुछ भी हुआ, उसकी नैतिक जिम्मेदारी मेरी है। सत्ता के मोह से परे ऐसा त्याग और जिम्मेदारी लेने का साहस आधुनिक राजनीति में दुर्लभ है। उस समय उन्होंने एक ऐतिहासिक पंक्ति कही थी जो उनके व्यक्तित्व को पूरी तरह रेखांकित करती है, “सत्ता तो आती और जाती रहती है, लेकिन अपने राम और अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया जा सकता।”

    कल्याण सिंह की यह निडरता और सिद्धांतवादिता केवल अयोध्या आंदोलन या राम मंदिर के मुद्दे तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि उनके प्रशासनिक फैसलों में भी साफ झलकती थी। 1991 में जब वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में फैले नकल के कैंसर को समाप्त करने के लिए ‘स्वच्छ परीक्षा’ का संकल्प लिया। उन्होंने ‘नकल विरोधी अध्यादेश’ लागू किया, जिसे उस समय राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत जोखिम भरा माना जा रहा था। कई सलाहकारों ने उनसे कहा था कि इस कठोर फैसले से युवा और छात्र वर्ग नाराज हो सकता है और आगामी चुनावों में पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। लेकिन कल्याण सिंह का मानना था कि भावी पीढ़ी के भविष्य और देश की नींव के साथ कोई राजनीतिक समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने सत्ता की चिंता किए बिना शिक्षा में शुचिता और योग्यता को पुनर्स्थापित किया। उनका यह कदम सिद्ध करता है कि वे तात्कालिक चुनावी लाभ के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए राजनीति करते थे।

    प्रशासनिक स्तर पर कल्याण सिंह ने ‘सुशासन’ को नए अर्थ दिए। वे एक बेहद कड़क और पारदर्शी प्रशासक थे, जिन्होंने अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दे रखा था कि कार्य में ढिलाई और भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं होगा। ‘अपराध मुक्त और भय मुक्त उत्तर प्रदेश’ का उनका नारा केवल एक चुनावी वादा नहीं था, बल्कि उन्होंने गुंडाराज और माफिया तंत्र पर जिस निर्भीकता से अंकुश लगाया, उसने आम जनता के मन में कानून के प्रति अटूट विश्वास पैदा किया। वे सत्ता में रहकर भी आम जनमानस की समस्याओं से कभी दूर नहीं हुए। अतरौली की गलियों से निकलकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर दो बार तक पहुंचे कल्याण सिंह अंतिम समय तक अपनी ग्रामीण जड़ों, अपनी मिट्टी और अपनी सादगी से जुड़े रहे।

    राजनीतिक उतार-चढ़ाव और निजी जीवन के संघर्षों के दौरान भी उन्होंने अपने स्वाभिमान और विचारों से कभी समझौता नहीं किया। जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने राजस्थान के राज्यपाल की भी जिम्मेदारी संभाली (2014 – 2019)। 2015 में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का भी अतिरिक्त प्रभार संभाला, तब भी उन्होंने संवैधानिक मर्यादाओं का सर्वोच्च सम्मान किया। वे हमेशा कहते थे कि पद बड़े नहीं होते, व्यक्ति का आचरण और उसके विचार उसे महान बनाते हैं।

    21 अगस्त 2021का दिन देश की सियासत में सिद्धांतों का एक बड़ा रिक्त स्थान छोड़ गया। 21 अगस्त का यह दिन अब “हिंदू गौरव दिवस” के रूप में भी मनाया जाता है।

    आज जब राजनीति में अवसरवादिता, पद-लोलुपता और सिद्धांतों की तिलांजलि देना आम बात हो गई है, तब कल्याण सिंह का जीवन एक प्रकाश स्तंभ की भांति चमकता है। उन्होंने सिद्ध किया कि एक सच्चा जननायक वही है जो सिद्धांतों की बलिवेदी पर सत्ता का सहर्ष बलिदान दे सके। कल्याण सिंह केवल उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल मात्र नहीं थे, वे उस वैचारिक दृढ़ता और राजधर्म के प्रतीक थे, जिसने देश को यह सिखाया कि कुर्सी से बड़ा विचार होता है और सत्ता से बड़े सिद्धांत होते हैं। इतिहास उन्हें एक ऐसे निष्ठावान, स्वाभिमानी और समर्पित जननेता के रूप में सदैव याद रखेगा, जिसने भारतीय राजनीति में सिद्धांतों की महत्ता को पुनर्स्थापित किया।

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