डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
बसपा प्रमुख मायावती सपा से गठबन्धन के प्रति आश्वस्त है, लेकिन इशारों में उन्होंने सपा को नसीहत देने में कसर नहीं छोड़ी। इससे यह भी जाहिर हुआ कि मायावती गठबन्धन में अपनी हनक से समझौता नहीं करेंगी। उन्होंने इसका अहसास भी करा दिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के लिए कहा कि उनको तजुर्बा कम है। वह होती तो गठबन्धन की दूसरी पार्टी के उम्मीदवार को राज्यसभा चुनाव में विजयी बनाती।मायावती के बयान के कई निहितार्थ है। पहला यह कि मायावती का तजुर्बा अखिलेश से अधिक है। इसलिए उनके अनुभव को गठबन्धन में वरीयता मिलनी चाहिए। दूसरा यह कि मायावती ने गेस्ट हाउस कांड से अखिलेश को तो बरी किया, लेकिन मुलायम सिंह यादव आज भी उनके कठघरे में है। मायावती का तर्क ठीक है। उन्होंने कहा कि उस समय अखिलेश सक्रिय राजनीति में नहीं थे। इसलिए उस घटना के लिए वह दोषी नहीं है। मुलायम के प्रति मायावती की कठोरता में कोई कमी नहीं हुई है। मायावती के इस रुख पर भी अखिलेश को चिंतन करना होगा।

मायावती का यह नजरिया उनके पिता के संबन्ध में है। मायावती की अगली टिप्पणी अखिलेश के मित्र रघुराज प्रताप सिंह पर है। इनके अनुसार अखिलेश को रघुराज पर विश्वास नहीं करना चाहिए। रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया के लिए मायावती ने कुंडा की तुकबन्दी से टिप्पणी भी की है। अखिलेश को यह भी मंजूर करना पड़ा। उन्होंने राजा भैया को दिया गया थैंक्स भी वापस ले लिया। इसके अलावा यह मान लें कि अखिलेश को तजुर्बा कम है, तब यह भी मानना होगा कि उन्होंने कम तजुर्बे से सरकार चलाई थी। मायावती ने इसी बहाने सपा के वरिष्ठ नेताओं पर भी निशाना लगाया है।
जिन्होंने अपना तजुर्बा नहीं बताया। इनमे वह लोग है जो मुलायम सिंह यादव के साथ कार्य कर चुके है, ये सपा में आज भी सक्रिय है। जल्दी ही मायावती इनको भी दरकिनार करने की नसीहत जारी कर सकती है। तब अखिलेश को अपने पिता और मित्र की भांति उन वरिष्ठ नेताओं के साथ भी उपेक्षा का व्यवहार करना पड़ेगा। इस प्रकार विधिवत गठबन्धन से पहले अखिलेश को अपने पिता और मित्र दोनों से अधिक दूरी बनानी पड़ी है। यह मायावती का प्रारंभिक प्रभाव है।
सपा के संस्थापक की गठबन्धन में कोई भूमिका नहीं होगी। उनके लिए इसमें कोई सम्मानजनक स्थान भी नहीं रहेगा। सपा संस्थापक पर मायावती को जो टिप्पणी करनी थी वह उन्होंने कर दी। लेकिन बसपा संस्थापक पर कुछ कहने का अधिकार सपा को नहीं है।
जबकि इन दोनों संस्थापकों ने समान रूप से भविष्य में कभी गठबन्धन न करने का फैसला लिया था। लेकिन भाजपा के उभार ने राज्य की राजनीति में जमीन आसमान का अंतर ला दिया है। जिन्होंने भविष्य में कभी साथ न आने की कसम खाई थी, उन्हें हाँथ मिलान पड़ा।
सपा और बसपा के उत्तराधिकारियों ने पार्टी को पच्चीस वर्ष पुरानी स्थिति में पंहुचा दिया है। डेढ़ दशक तक दोनों पार्टियां एक दूसरे के प्रति दुश्मनी के बल पर महत्वपूर्ण बनी रही। अब साथ चलने का प्रयास हो रहा है। एक वर्ष पहले अखिलेश अपनी जनसभाओं में यह कहना नहीं भूलते थे कि बुआ जी पर विश्वास मत करना। ये भाजपा से मिल सकती है। अब मायावती के लिए अखिलेश अच्छे हो गए। भाजपा दलित विरोधी हो गई। जबकि मायावती ने खुद माना है कि सपा की गलत रणनीति से उनका उमीदवार पराजित हुआ है। जया बच्चन की जीत सुनिश्चित करने और बसपा उम्मीदवार को मझधार में छोड़ने वाली सपा दलितों की हमदर्द हो गई, और अपने दोनों दलित उम्मीदवारों को विजयी बनाने वाली भाजपा दलित वीरोधी हो गई। इस प्रकार दलील किसी के गले उतर नहीं सकती।
गठबन्धन में वर्चस्व की कवायद में मायावती कितना सफल होंगी यह भविष्य में पता चलेगा। इसी प्रकार अखिलेश कितनी लचक दिखाएंगे, यह भी समय ही बताएगा। लेकिन मायावती भी अखिलेश को पूरी तरह समझ नहीं सकी है। बहुत संभव है कि मायावती को झटका देने के लिए अखिलेश ने जया बच्चन की ही जीत सुनिश्चित की थी। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने इस पर सटीक टिप्पणी की है। उन्होंने ठीक कहा कि अखिलेश को मायावती कम न समझें। वह अपने पिता को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से और चाचा को कैबिनेट मंत्री पद से किनारे लगा चुके है। जरूरत पड़ने पर उन्हें मायावती के साथ ऐसा व्यवहार करने में संकोच नहीं होगा। इसके मद्देनजर इस गठबन्धन में भीतर ही भीतर दांव पेंच चलते रहेगें।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है







