छोड़कर धरती, गगन की बात करता है शहर।
आचरण में जंगलों को मात करता है शहर।
आग लगवाकर सियासी रोटियाँ ही सेंकना,
ये खुराफ़ातें यहाँ दिन -रात करता है शहर।
हादसों की भीड़ बढ़ती हर गली- हर मोड़ पर,
इस क़दर ज़ख़्मी यहाँ जज़्बात करता है शहर।
बेबसी, कुंठा, घृणा, दूरी, घुटन – मज़बूरियां,
आदमी के नाम ये सौगात करता है शहर।
ये उजालों की क़सम खाकर उजालों का नहीं,
रोज़ थोथी क्रान्ति की शुरुआत करता है शहर।
कमल किशोर ‘भावुक







