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    सही नाम का गलत विरोध

    By March 30, 2018Updated:March 30, 2018 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
    विरोध प्रजातन्त्र की विशेषता है लेकिन विरोध के लिए विरोध से कई बार विचित्र स्थिति बनती है। किसी व्यक्ति का नाम अनेक पारिवारिक और वात्सल्य के मनोभावों से जुड़ा होता है। डॉ आंबेडकर अपने नाम के साथ पिता के नाम को देखकर भावविह्वल होते होंगे। बिडंबना देखिये उनके नाम पर सियासत करने वालों को इस पर भी आपत्ति है। वह उनके नाम उतने शब्द ही देखना चाहते है, जितने उनकी सियासत में फिट बैठते है। जिन्हें उनके नाम के कुछ शब्द पर कठिनाई है, वह उनका पूरा सम्मान कभी नहीं कर सकते। आज की युवा पीढ़ी या बच्चे उनका पूरा नाम जानती भी नहीं थी। इस लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पहल की। इसका जबाब तलाशना होगा कि उनके पूरे नाम को किसकी इच्छा से प्रचलन से बाहर किया गया था।
    कहीं इसके पीछे वह लोग तो नहीं थे जिन्होंने उनसे संबंधित पांच स्थानों को स्मारक नहीं बनने दिया। यह कार्य नरेंद्र मोदी ने किया। वैसे ही लोग आज उनके पूरे नाम से बेचैन दिख रहे है। जबकि राम शब्द में तो निर्गुण का भो बोध है।
    प्रभु राम को केवल सगुण मानने से भ्रम हो सकता है। यह नाम इससे भी बहुत व्यापक है। यह कणकण में विराजमान है। सगुण उपासक अयोध्या में जन्मे राम की आराधना करते है। उन्होंने महाराज दशरथ और कौशल्या के यहां अवतार लिया था। निर्गुण उपासक भी राम का नाम लेते है। लेकिन इसी के साथ वह यह भी कहते है कि वह राम, ‘जाके  माई  न बापू रे ‘!
    अर्थात वह अजन्मा है, निर्गुण है, उनका कोई रूप नहीं है। लेकिन इस नाम में प्रभाव है। ‘ रा ‘ कहने के लिए मुंह खोलना पड़ता है। ‘ म ‘ कहने के लिए मुंह बंद करना होता है। यह किसी दिव्य प्रकाश को ग्रहण करने जैसा है। अनेक निर्गुण संतों ने पुरजोर तरीके से इस नाम का जाप किया। लेकिन उनके राम अजन्मा ही थे। उनका अयोध्या से कोई संबन्ध नहीं था।
     यही हिन्दू धर्म की उदारता और व्यापकता है। आध्यात्मिक विषयों का कोई दायरा नहीं, कोई सीमारेखा नही है। दसरथ नन्दन राम भी आराध्य है, निर्गुण राम भी  कणकण में है। सगुण उपासक भी ऋषि है, सन्त है, निर्गुण उपासक भी उसी प्रकार सम्मानित है। कबीर कहते है -‘निर्गुण राम जपहु रे भाई।’ उनके राम निर्गुण है।
    उपासना का ऐसा व्यापक दायरा दुनिया में कहीं नहीं है। यह हिंदुत्व की ही विशेषता है। जिस पर ब्राह्मणवादी होने का आरोप लगा। लेकिन यहाँ सबसे ऊंचे आध्यात्मिक पद पर आसीन व्यक्ति को भी निर्गुण राम की उपासना रोकने का अधिकार नहीं है। इस उदारता को समझना चाहिए। लेकिन जब अन्य मजहब के आधार पर सोचेंगे तो दुविधा होगी।  सबकी मान्यता अलग है। दूसरे के आधार पर किसी विषय की व्याख्या करने उचित भी नहीं है।
    उत्तर प्रदेश सरकार ने संविधान निर्माता का पूरा नाम क्या लिया राजनीति होने लगी। उनके नाम पर राजनीति करने वाले सर्वाधिक परेशान दिखाई दिए। ऐसा लग रहा है कि यह संविधान निर्माता का नाम अपनी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से चलाना चाहते है। इन्हें उनके नाम का राम शब्द पसन्द नहीं, इस लिए उसका विरोध कर रहे है।
    वस्तुतः पूरे नाम का विरोध करने वाले डॉ आंबेडकर का सम्मान नहीं कर रहे है।जो नाम उनको प्रिय था, उसको अपनी  सुविधा के लिए छोटा किया गया।
    संविधान की आठवीं अनुसूची में उन्होंने अपना पूरा नाम भीमराव राम जी आंबेडकर लिखा था। इसका मतलब था कि उन्हें इस पूरे नाम से लगाव था। इसमें उनके पिता के प्रति लगाव और सम्मान का भाव भी समाहित था। लेकिन उनके नाम पर वोट बैंक की राजनीति करने वालों को डॉ आंबेडकर की भावनाओं का भी ख्याल नहीं है। इसके लिए विचित्र तर्क दिए जा रहे है। कहा गया कि महात्मा गांधी और नरेंद्र मोदी का पूरा नाम क्यों नहीं लिखा जाता।इसमें दो बात है। एक यह कि यह -क्या महात्मा गांधी और नरेंद मोदी का हर जगह पूरा नाम लिखा जाएगा, तो क्या उनकी राम जी पर आपत्ति दूर हो जाएगी।
    दूसरी बात यह कि डॉ आंबेडकर के पूरे नाम को प्रचलन से दूर करने के पीछे क्या उद्देश्य था। महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहन दास करमचंद्र गांधी देश के बच्चे भी जानते है। इसी प्रकार नरेंद्र दामोदर दस मोदी भी लोग जानते है। दोनों के पूरे नाम प्रचलन में में नहीं है, लेकिन नाम के किसी हिस्से को छिपाने का प्रयास नहीं हुआ । जबकि डॉ आंबेडकर के पूरे नाम से डाक टिकट जारी होने के बाद भी उनके नाम की व्यापक जानकारी लोगों को नहीं हुई। यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने राजकीय अभिलेखों में पूरा नाम लिखने  का शासनादेश जारी किया है। इसका प्रभाव अन्य संवाद पर नहीं होगा। लोगों के ध्यान में उनका पूरा नाम बना रहेगा, यह अच्छी बात है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस कमी को दूर किया है।
    किसी ने कहा कि यह फैसला समझ से परे है। यह अनावश्यक विवाद खड़ा करने की कोशिश है। बाबा साहेब के नाम में कुछ जोड़ने या घटाने की जरूरत नहीं है। मतलब किसी के सही नाम लिखने में ऐसे लोगों को विवाद उतपन्न होता दिखाई दे रहा है। यह ठीक कहा गया कि जिसे उनके पूरे नाम पर आपत्ति है, वह उन महापुरुष का सम्मान क्या करेंगे। यदि डॉ आंबेडकर के प्रति सम्मान है तो उनके नाम के एक एक शब्द के प्रति भी आदर भाव रखना होगा। किसी को यह अधिकार नहीं है कि नाम के आधे शब्द को प्रचलन से बाहर कर दे। जो यह गलती सुधारे, उस पर हमला बोलने लगो। उनके नाम में कुछ भी जोड़ा या घटाया नहीं गया है। बल्कि उनके पूरे नाम के प्रति सम्मान व्यक्त किया गया। ये वही विद्वान है जिन्हें उनके गलत चल रहे सरनेम की भी जानकारी नहीं थी। इस ओर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने ध्यान आकृष्ट किया था। उन्होंने प्रमाणों के आधार पर बताया कि संविधान निर्माता के सरनेम का पहला  अक्षर बड़ा आ होगा। आंबेडकर शब्द सही है। अम्बेडकर शब्द गलत है। इसी प्रकार उन्होनें पूरे  नाम के प्रति भी सुझाव दिया था।
    नाम तो प्रत्येक व्यक्ति का सही ढंग से लिखना चाहिए। महापुरुषों के संबन्ध में और अधिक सावधानी रखनी चाहिए।
    इसलिए नाम को सही करने ,  पूरे नाम से आमजन को अवगत कराने के लिए उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा  होनी चाहिए। इतना ही नहीं राज्य सरकार ने एक  अप्रैल से सरकारी कार्यालयों में डॉ भीमराव रामजी  की तस्वीर लगाना अनिवार्य कर दिया है। इसी प्रकार राजकीय अभिलेखों में उनका पूरा नाम लिखा जाएगा।
    उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले में डॉ आंबेडकर के प्रति सम्मान भाव है। जो इसका विरोध कर रहे है, उन्हें केवल अपनी  राजनीति की चिंता है।
    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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