Close Menu
Shagun News India
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Thursday, July 2
    Shagun News IndiaShagun News India
    Subscribe
    • होम
    • इंडिया
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • राजस्थान
    • खेल
    • मनोरंजन
    • ब्लॉग
    • साहित्य
    • पिक्चर गैलरी
    • करियर
    • बिजनेस
    • बचपन
    • वीडियो
    • NewsVoir
    Shagun News India
    Home»साहित्य

    हास्य कथा: कवि बौड़म और ठेलुहे की शादी

    By May 8, 2018Updated:May 8, 2018 साहित्य No Comments18 Mins Read
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Post Views: 676

    अरविन्द कुमार ‘साहू’

    ये बात तब की है, जब कवि बौड़म सिर्फ ठेलुहा हुआ करता था। मूल रूप मे ठेलुहा उसे कहते है, जिसे मन से कोई पसंद न करता हो। हर कोई ढंग का आदमी या औरत उसे किनारे ठेल कर निकल लेना चाहता हो। ….. और बाकी बचे लोग या बच्चे किसी न किसी बहाने उसका मज़ाक बनाकर सिर्फ मनोरंजन के लिए ही तत्पर रहते हो। ऐसे ज़्यादातर ठेलुहे लोग कम दिमाग ही होते है या फिर किसी जोड़ – तोड़ के रिश्ते से सारे गाँव के ही चाचा, मामा, फूफा या मौसा होकर रह जाते है। इनकी ज़्यादातर किस्मे अविवाहित ही पायी जाती हैं। विशेष पर्वो, त्योहारों या शादी – विवाह के समारोहो मे बैठे – ठाले इनके किस्से अक्सर कहने – सुनने को मिलते रहते है।

    हमारे गाँव मे भी गाहे – ब – गाहे ऐसे किसी न किसी ठेलुहे का मज़ाक बनता ही रहता था। होली के त्योहार मे चूंकि हँसी – मज़ाक की जबर्दस्त परम्परा होती है, अतः ऐसा कोई न कोई बकरा हलाल होने की पूरी गारंटी होती थी। बचपन मे एक बार होली के अवसर पर हुए ऐसे ही मजाकिया तमाशे की याद हमे अभी तक बनी हुई है। गाँव मे एक जगदीश अग्रहरी थे जिन्हे हम बच्चे प्यार से चाचा कहते थे। चूँकि वे आयु से प्रौढ़ होते जा रहे थे सो धीरे – धीरे बच्चों के साथ ही सारे गाँव के चाचा हो गये। ‘जगत चाचा’ यानी ‘सारी दुनिया के रिश्ते मे चाचा’  गोया अमेरिकन ‘सैम अंकल’। यह रिश्ता ऐसा मशहूर हुआ कि वे अपने से भी ज्यादा बूढ़े दादा और दादियों के भी चाचा होकर रह गये। सिर्फ उनकी सगी बूढ़ी माँ को छोड़कर ।

    ठेलुहों की कैटेगरी मे हमने उन्हे इसलिए भी रख दिया कि सारी विशेषताओं के साथ ही वे चिर कुँवारे भी थे। जगदीश चाचा यूँ तो काफी सम्पन्न एवं धनी माता – पिता के इकलौते चिराग थे। पक्की सड़क पर पक्का मकान, किराने की भरी पूरी दुकान , दसियों बीघे आम की बाग, एक आटा चक्की और बर्फ कैंडी बनाने की छोटी सी फैक्ट्री। वही बर्फ की कैन्डी जो दूध – मट्ठा या सादे पानी मे रंग व सेक्रीन (मिठास का केमिकल) घोलकर बाँस की लंबी – पतली डंडियाँ लगाकर जमा दी जाती थी। जिसे एक नमक – पानी वाली जुगाड़ू वातानुकूलित पेटी मे भरकर बेरोजगार सेल्समैन गाँव – गाँव एक भोंपू बजाते हुए घूमते और एक या दो पैसे के रेट मे बेचकर भीषण गर्मी मे ठंडक का चटोरा अहसास करा जाते थे।

    हमारे बचपन के जमाने मे यह बर्फ कैन्डी या घिस्सुल बर्फ के गोले बहुत बड़ी चीज होती थी। फिर उसकी फैक्ट्री लगा लेने वाले की हैसियत तो गाँव मे सोची ही जा सकती थी। लेकिन इतने  सम्पन्न घराने के होने के बावजूद जगदीश चाचा की गाँव – जवार मे कोई कदर न थी। क्योंकि सब कुछ होने के बावजूद वो दिमाग से पैदल ही रह गये थे। शक्ल सूरत सामान्य थी और शरीर से भी तंदुरुस्त थे। लेकिन उम्र बढ्ने के साथ – साथ वे बेडौल भी होने लगे तो लोग उन्हे चिढाने के लिए कभी – कभी भैंसा या साँड बोल देते। यूँ भी वे बात – बात मे या तो ठहाका लगाकर हँस पड़ते या बिगड़ैल साँड़ की तरह भड़क जाते। बच्चों को पीटने के लिए दौड़ा लेते तो बड़ों को गंदी – गंदी गालियाँ बकने लगते। फिर आधे गाँव मे ऐसी ही किसी बात को लेकर बड़बड़ाते हुए घूमते रहते। जो ढंग का आदमी टकरा जाता , उसे जबर्दस्ती रोककर चिढ़ाने वाले की शिकायत करने मे जुट जाते तो पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जाता। …..और ये सब तब तक चलता रहता, जब तक कि उनका मन थक कर पूरी तरह शांत न हो जाता या फिर उन्हें कोई दूसरा नया मामला न  मिल जाता।

    कहना न होगा कि इन्ही बेढब आदतों की वजह से अब तक उनकी शादी नहीं हो पायी थी। भला कौन मजबूर माँ – बाप जानबूझ कर अपनी लड़की उनके गले मे लटका देता ? फिर उनके चचेरे ताया – भाया भी चुपचाप यही चाहते थे कि उनकी शादी कभी न हो। ताकि वे बाद मे उनकी लाखों की जायदाद पर कब्जा कर लें। सो, माँ – बाप की तमाम कोशिशों के बावजूद उनका रिश्ता परवान न चढ़ सका। एक बार किसी रिश्तेदार ने एक लप्पू झन्ना औरत को किसी तरह लाकर उनके घर मे उढ़री ( किसी परित्यक्ता या विधवा महिला के साथ कामचलाऊ समझौता या गंधर्व विवाह जैसी रीति ) लाकर बैठा भी दिया। लेकिन शाम तक पागलों की तरह खुशी से नाचते चाचा को देखकर ये चाची उनकी खुशी बर्दाश्त नही कर पायी और शाम को शौच के बहाने घर से कुछ जेवर और मुंह दिखाई के बहाने मिले काफी रुपए लेकर फरार हो गयी। वह चाची दोबारा भूले से भी उनके घर लौटकर न आयी।

    जगदीश चाचा ने सारे गाँव मे घूम – घूम कर महीनों तक इसका ढिंढोरा पीटा कि ‘उनकी’ चाची कहीं भाग गयी है। सारे गाँव के तथाकथित भतीजे उनकी खूब मौज लेते रहे। बहरहाल, वक्त सारे घाव भर देता है, सो धीरे – धीरे जगदीश चाचा भी इस बात को भूलने लगे। इसी घटना के बाद या यूँ कहें कि शायद इसी अफसोस मे उनके बूढ़े पिता जी भी चल बसे। बच गई बूढ़ी माँ , जिसे ठीक से दिखाई भी नहीं पड़ता था। अब रही सही आस भी खत्म हो चुकी थी। लेकिन चाचा के मोटे दिमाग मे यह फाँस हमेशा के लिए बनी रह गई थी कि काश उनकी भी शादी हो पाती या ‘वो चाची’ ही लौटकर आ जाती।

    गाँव के लफंगे उनकी इस कमजोरी का खूब फायदा उठाते। किसी के घर मे शादी – व्याह का आयोजन होता तो जगदीश चाचा भी बेहद खुश होते। लफ़ंगे लोग उन्हे बुलाकर ‘पगलवा डान्स’ करवाते। चाचा भी बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाने की तरह खूब नाचते – पगलाते। इसके अलावा लड़के अक्सर कहते – “चाचा चलो , बाग मे चाची आने वाली है, मिलवा दूँ । लेकिन पके हुए फल खिलाना पड़ेगा।” चाचा झट चल देते। लड़के जमकर आम – जामुन या अमरूद – बेर ( जिस फल का मौसम होता ) छानते घोटते , फिर चुपचाप पतली गली से निकल लेते | इधर चाचा शाम तक इंतजार करते रहते , फिर निराश होकर अपना टूटा- फूटा दिल लिए हुए , कितनों को उल्टी सीधी गालियाँ बकते हुए लौट पड़ते। उनके दिल पर क्या बीतती थी ? ये तो वही जानें , किन्तु बेदर्द लोग उनसे मजा लेने का नया मौका फिर भी ढूँढने मे लगे ही रहते थे।

    ऐसी ही एक होली भी हमारे बचपन मे गुजरी , जिसने जगदीश चाचा की यादों की बारात को यथार्थ मे जिंदा कर दिया था। गाँव मे होली के आगे पीछे हफ्ते भर तक एक से एक पारंपरिक कार्यक्रम चलते रहते थे। फगुआ, बिरहा, चैती गायन, वादन, रंग, कीचड़ , अबीर गुलाल का स्नान , गुझिया पूड़ी, पापड़ चिप्स दही बड़े के पकवान ,हँसी मज़ाक ठिठोली के नाटक – अताई , लंठाधिराज सम्मेलन और उससे भी बढ़कर ठेलुहे की बारात का मजेदार आयोजन। हमे तो कभी भुलाए नहीं भूलता। दरअसल इस परंपरा मे गाँव के ही किसी जगदीश चाचा जैसे ठेलुहे की नकली शादी गाँव मे रहने वाले किसी घर जमाई या रिश्ते के जीजा – फूफा या नचनिया – कुदनिया लड़के के साथ मनोरंजक तरीके से करायी जाती थी जिसका सारा गाँव मिलकर आनन्द उठाता था।

    …….और संयोग की बात कि इस बार इस प्रक्रिया मे सचमुच जगदीश चाचा का ही नंबर लग गया। लफंगों ने सारी योजना के बाद उनके घर जाकर लाल कपड़े मे लिपटा एक सूखा बेकार नारियल और पान – सुपारी प्रदान करते हुए चाचा की शादी तय होने की झूठी खुशखबरी दे दी। चाचा तो पग्गल थे ही। वे सचमुच कुछ आगा – पीछा सोचे बिना ही उसे सच मान बैठे ।….और तो और मजे की बात यह कि उनकी बूढ़ी अम्मा जिन्हे अब ठीक से दिखाई – सुनाई भी नहीं देता था , वे भी लफंगों की बनी – बनाई कहानी और फुसलाने – बहलाने वाली बातों मे आ गई। लब्बों लुआब यह कि उस नेकदिल बुढिया आजी को भी यह सच्चा विवाह का आयोजन लगा और उसने झट हामी भर दी। फिर होना क्या था ? चट मँगनी , पट ब्याह। नकली पंडित हाजिर, फर्जी कुण्डली भी मिलवा दी गई। मुहूरत भी एकदम अर्जेंट वाला निकल आया। उसी दिन शाम छह बजे की बारात, आठ बजे विवाह और नौ बजे विदाई । बड़ा अद्भुद संयोग लगा माँ – बेटे को ।उनकी खुशी का पारावार न रहा।

    आनन फानन तैयारी हुई। देखते ही देखते बारात सजने लगी। जल्द बाजी मे किसी नाटक कंपनी से दूल्हे का विशेष पीला पहनावा “जोड़ी – जामा” आ गया। गुलाबी ठंडक के दिन थे। सर्दी अभी भी नहाने मे आलस पैदा कर देती थी। वह भी शाम के समय का स्नान। भले ही दूल्हे का जोड़ा पहनने के लिए स्नान जरूरी था , लेकिन कई दिन से नहीं नहाये चाचा को यह अब भी गवारा न हुआ। नकली पंडित ने सलाह दी कि होली के मुहूर्त मे अबीर का सूखा स्नान भी चल जाता है। सो लफंगों ने तमाम रंगों की अबीर से चाचा को रंग डाला। वे किसी नौटंकी कंपनी के जोकर की तरह “ईस्टमेन कलर” हो गये। लेकिन जानबूझकर उन्हे इसका भी रत्ती भर बुरा नहीं लगा। जबकि कोई और दिन होता तो वे अब तक किसी बिगड़ैल साँड की तरह लफंगों को दौड़ा लिए होते।

    बहरहाल , चाचा ने नौटंकी वाला जोड़ा जामा अर्थात दूल्हे का पारंपरिक ड्रेस भी ऊपर से डाल लिया। अब सेहरा और मौर ( दूल्हे का विशेष परंपरागत राजसी मुकुट) की बारी आयी तो जल्दबाज़ी का हवाला देकर जोकरों वाली एक टोपी ही उनके सिर पर चढ़ाकर अंगोछे से लपेट कर बांध दी गई ताकि कहीं झटके से गिर न जाये। अब बारी थी नोटों की वर माला पहनने की। पुत्रवधू के सपनों मे डूबी बूढ़ी आजी भीतर गई और पुराने बक्से से तमाम तुड़ी मुड़ी नोटें निकाल लाई ।लेकिन जगदीश चाचा के लालची पट्टीदारों ने जानबूझकर नोट छीन लिए और कहा कि ऐसे मौके पर फूलों की माला ही होनी चाहिए। बूढ़ी आजी को बरगला दिया कि रात मे चोर – बदमाश रुपए लूट सकते हैं इसलिए उनको अपने पास ही सुरक्षित रख रहे हैं। अब लोग पर क्या कहते ? रंग मे भंग हो सकता था।

    लेकिन लफंगों को एक मौका और मिल गया। कहने लगे – “ फूल नहीं तो क्या हुआ ? फलों की माला भी चल जायेगी।” लेकिन समस्या यह थी कि डूबती शाम और धुँधलके अंधेरे मे बाग से फल तोड़ना उचित नहीं था और घर में इतने फल थे ही नहीं। सो , नकली पंडित ने सुझाया कि यजमान ! अगर फूल या फल न हो तो इस अवसर पर सब्जियों की माला भी दूल्हे की शोभा बढ़ा सकती है।”  बूढ़ी आजी तुरंत मान गई – “यह उपाय भी उत्तम है। भला शुभ काम मे मजबूरी कैसी ? वे फटाक से कुछ लड़कों के साथ भीतर गई और सब्जी की पूरी की पूरी डलिया ही उठा लायी। बस , आनन फानन मे और क्या करते ? आलू प्याज , लहसुन , बैगन गूँथ डाले गये। बीच मे कंठहार की तरह एक छोटा सा कद्दू लटका दिया गया और ठेलुहे की वर माला भी उसके गले मे डाल दी गई।

    दूल्हा पूरा कार्टूनमय हो गया। देखने वालों की दबे मुंह वाली हँसी थमने का नाम नहीं ले रही थी। लेकिन चाचा और आजी इस सबसे बेखबर सचमुच मे बेहद खुश थे। इसके बाद हमेशा की तरह नज्जू मियाँ की नखरीली घोड़ी अपने इक्के पर दूल्हे को ले जाने के लिए दरवाजे पर आ खड़ी हुई। बूढ़ी आजी ने चाचा की बलैयां लेते हुए बारात को रवाना किया। बारात दूसरे मुहल्ले की ओर प्रस्थान करने लगी। अब तक अँधेरा पूरी तरह घिर गया था। जल्दी मे रोशनी के प्रबंध के रूप मे एक गैस वाला हंडा दूल्हे के रथ रूपी इक्के पर टांग दिया गया और बाकी रोड लाइट के रूप मे लफंगे लड़के लालटेन, चिमनी, ढिबरी, लैंप, और कुछ ने तो मोमबत्ती ही जलाकर हाथों मे थाम लिया। मानो दूल्हे की बारात नहीं, किसी दिलजले की आत्मा की शान्ति के लिए मार्च निकाल रहे हों।

    बैंडबाजे के रूप मे फगुआ गाने वालों का एक दल ढ़ोल पीटते, झाँझ बजाते हुए चल रहा था। जबकि लफंगे लड़के टीन के खाली कनस्तर पीटते और हो हल्ला मचाते हुए चल रहे थे। उन सबने भी अजीब ओ गरीब कपड़े पहन रखे थे। कुछ ने तो भांग का नशा भी कर रखा था। कुल मिलाकर यह बारात शिव विवाह के पौराणिक वर्णन से भी अजीब लग रही थी। जगदीश चाचा को भी यह कुछ अजीब बारात ही लग रही थी , लेकिन इस दो पल की अनजानी खुशी मानो उनके जीवन भर का दर्द छुपाये ले रही थी। वे खुशी के अतिरेक मे सब कुछ भूल गये थे। कई बार तो वे इक्के पर ही खड़े होकर खुशी मे नाचने की कोशिश भी करने लगते। लेकिन इस सबका पूरा मजा ले रहे लफंगे उन्हे नीचे खींचकर, दबा कर बैठा देते और कहते कि बैठ जाओ। कहीं तुम्हें नाचते देखकर कहीं दुलहनियाँ नाराज न हो जाये।

    …..और कहना न होगा कि इस अचूक रामबाण से, चाचा की बौराई खुशियों से भरा और गर्वीला मन का रावण अपना मन मारकर चुपचाप बैठने को मजबूर हो जाता। फिर इसी तरह धीरे – धीरे नाचते – गाते खुशियों भरा एक घंटे का रास्ता कब बीत गया , ठीक से पता ही नही  चला। पता भी तब चला, जब रिश्ते के ‘जगत फूफा’ के घर पहुँच गए। जहाँ ये नकली बारात पहुँचना तय हुई थी। वहाँ पहुँचते ही छतों से मन मौजियों ने रंगों भरी बाल्टी उड़ेलनी शुरू कर दी। कहने को तो यह होली की बारात का औपचारिक स्वागत था किन्तु ठंडे पानी और रंगों की इस अचानक बौछार से लोगों का नशा उतरने लगा। इसी के साथ ही लफंगों को यह होश आ गया कि बारात अपने गंतव्य तक आ चुकी है।

    पानी की बौछार थमते ही लड़की पक्ष से महिलाओं ने दूल्हे के बारातियों को फूल – बताशों , हल्दी चावल से मारने की रस्म शुरू कर दी। लेकिन यह क्या ? …यहाँ तो फूल – बताशों या रसगुल्लों की जगह आलू – टमाटर की मार चल रही थी। थोड़ी देर बाद बारातियों को होश आया कि यह सचमुच होली वाली बारात ही है। जिसमे आलू टमाटर ही नहीं बल्कि बैगन , कद्दू , लौकी और कटहल की मार भी चल जाती है। तभी दो – चार के ऊपर सचमुच लौकी कद्दू आ गिरे और चोट खाये लोग अपना सिर बचाने की जुगत मे इधर – उधर भागने लगे। कोई बेसुरा होकर चीखा – “मार दियो रे मोहे कटहल घुमाय के ”। कुछ नाच कूदकर या मटक – मटक कर इस स्थिति का भी आनन्द उठाने लगे। कुछ इसे दहेज का माल समझ कर जल्दी – जल्दी जो भी मिला उसे समेटकर , कल से सब्जी की दुकान लगाने का ख्वाब सजाने लगे।

    अजीब धमा चौकड़ी मच गई थी। ……और जगदीश चाचा किसी किंकर्तव्यविमूढ़ या यूँ कहें कि खुशी से पगलाए बकलोल की तरह नज्जू मियाँ की इक्का – घोड़ी पर बैठे शायद यही सोच रहे थे – “ये कहाँ आ गये हम , यूँ ही साथ – साथ चलते ? ऐ काश ! सब्जियाँ कुछ हम भी बटोर सकते।” यही सब सोचते हुए उनके पग्गल दिमाग मे धीरे से कवि बौड़म की आत्मा भी जागृत होने लगी – “अपनी दुल्हन की छत से बरसात देखते रहे। चोर माल ले गये , वो बारात देखते रहे” …..या फिर “ मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू ? मरी जाये मेरी नानी कब आएगी तू ?”

    अचानक जाने क्यों उन्हें यह भी लगने लगा कि छत पर खड़ी महिलाओं मे, शायद उनकी होने वाली दुल्हन भी है। जो उन्हे देखकर शरमाते हुए गा रही है – “ कभी तू पागल लगता है , कभी दीवाना लगता है।”….और फिर सपनों की चाची को सचमुच घूरता हुआ समझकर चाचा खुद ही शरम के मारे पतले हो गये और फिर शरमाकर ही उन्होने इस सारे घटनाक्रम से थोड़ी देर के लिए अपनी आँखें मूँद ली। वरना ससुराल वाले दूल्हे के बारे मे जाने क्या सोच बैठें ?

    उनकी तंद्रा तब टूटी , जब एक तथाकथित लड़की वाला वहाँ आया और बड़े प्यार से बोला – “चाचा जी , लीजिये गुझिया – पापड़ का नाश्ता कर लीजिये। चाची जी ने बड़े प्यार से आपके लिए भिजवाया है।”

    “आंsssss  हांssss” – चाचा जी को जैसे बिजली का झटका लगा। वे तुरंत होश मे आ गये। चाची का नाम और नाश्ते की बात सुनते ही उन्हे जोश आ गया। बड़ी फुर्ती से नाश्ते की थाल लगभग छीनते हुए ले ली और भकर – भकर किसी बकलोल की तरह गुझिया – पापड़ चबाने लगे। नाश्ता लाने वाला मुँह दबाकर हंसा और बोला – “ये थाली हमे दे दीजिये , चाची ने वापस मंगवाया है।” चाचा ने सारा नाश्ता भक्क से वहीं अपने कपड़े पर ढकेल लिया। लाने वाला थाली लेकर झटके से चलता बना। चाचा का मन हुआ कि चाची को कहला भेजे कि जरा जल्दी विदाई हो जाती तो ठीक रहता , क्योंकि उनके पास ज्यादा टाइम नहीं है। लेकिन दिल की लगी दिल मे ही रह गई। क्योंकि मुँह मे ठूँस कर भरी गुझिया , चबा कर ठाँसे पापड़ और सबसे बड़ी बात यह कि चाची के नाम पर उपजी असली लाज – शरम। इन सबने मानो उनके चपर – चपर चाभते मुँह मे बेबसी की दही जमा दी थी – “काश ! असली चाची भी उन्हे इस समय देख लेती , तो विवाह से पहले ही तू – तड़ाक के साथ उनका इसी समय ‘तीन थप्पड़ तलाक’ हो जाता।

    ….और फिर घंटे भर मे नाश्ता के साथ फगुआ गायन , वादन और ‘नाचन’ की रस्म निपट गई। बिना किसी औपचारिकता के ही आखिर विदाई की घड़ी भी आ पहुँची। पहले ही गुप्त रूप से किराए पर बुलाये गये एक नचनिया लड़के को दुलहनिया का ड्रेस पहना कर बौड़म चाचा के साथ विदाई कर दी गई। चाचा ने उसे भी नज्जू मियाँ की इक्के घोड़ी पर बैठा लिया। बारात फिर वैसे ही झूमते नाचते चाचा के घर पहुँची। एक हाथ लंबा घूँघट काढ़े , लाल साड़ी मे सजी इस दुल्हन ने उतरकर बूढ़ी आजी के पैर छुए। आशीष लिया – ‘ जुग जुग जियो दुलहिन। दूधों नहाओ , पूतो फलो।” बूढ़ी आजी उसकी बलैयां लेते हुए भीतर ले गई। जमाने की बुरी नजरों से छुपाने के लिए उसे एक कमरे मे बैठा दिया। बाहर आकर घर लौटे बारातियों को बर्फ की कैन्डी बंटवाने के लिए कह दिया। सब चटखारे लेने लगे।

    इस बीच नकली पंडित ने आजी के पास जाकर साजिशन ज़ोर – ज़ोर से उनके कान मे कहा – “ आजी ! जल्दबाजी की शादी होने कारण लड़का – लड़की के छत्तीसों गुण मिल नहीं पाये है। इसलिए आज घर का कोई भी दुल्हन की मुँह दिखाई नहीं कर सकता। वरना दुल्हन गायब हो जायेगी।” बस इतना सुनना था कि बेसब्रे हो रहे अपने बौड़म याने जगदीश चाचा गुस्से मे पगलाए साँड की तरह भड़क उठे।- “ ऐसे कैसे ऊ ससुरी भाग जायेगी ? उसकी तो ऐसी की तैसी। मैं तो उसका मुँह देख के रहूँगा।” कहकर चाचा भीतर की ओर लपके। पीछे – पीछे चाचा को रोकती हुई आजी भी दौड़ी। – “ अरे रुक नसपीटे ! पंडित की बात मान ले। नहीं तो …..।” उनकी बात अधूरी ही रह गई।

    बिफरे चाचा ने सारा घर छान मारा। लेकिन दुल्हन कहीं हो तो मिले। बौड़म चाचा की गरज – तड़प शुरू होने से पहले ही अपनी लाल साड़ी उतारकर कर लड़के के वेश मे वह घर के बाहर निकल चुकी थी। बारातियों की भीड़ मे चाचा कुछ समझ ही न पाये थे। जब चाची भीतर न मिली तो चाचा गरजते – बरसते बाहर आ गये। चाची से मिलन के पहले ही होने वाली विरह वेदना उनके बर्दाश्त से बाहर हो चुकी थी। उनका गुस्सा बरातियों पर टूट पड़ा। वैसे बहुतों को ऐसी संभावना पहले से ही थी। लेकिन ‘क्लाइमेक्स’ शायद कुछ जल्दी ही आ गया था। सो सारे बाराती अंधेरे और हड़बड़ी मे, जिसको जिधर रास्ता मिला , गिरते पड़ते उधर को भाग निकले। लेकिन पंडित जगदीश चाचा के हत्थे चढ़ गया।फौरन उनकी गर्दन पकड़ ली गयी। वे गिड़गिड़ाते हुए आजी से गुहार लगाने लगे – “ मुझे बचाओ आजी ! मैंने पहले ही चेताया था कि आज मुँह देखना मना है। पर चाचा नहीं माने। अब खुद भुगतें , मैं क्या करूँ ?” आजी ने एक बैगन फेंक कर चाचा को दे मारा – “ उसे छोड़ मुए ! एक दुल्हन को तो पकड़कर रोक न पाया , अब पंडित की जान लेकर रहेगा क्या?”

    चाचा जैसे कुछ होश मे आये। उनकी पकड़ ढीली पड़ी तो पंडित की गर्दन छूट गई। वह धम्म से जमीन पर गिर पड़ा। लेकिन जान छूटते ही राकेट की तरह एक ओर को तेजी भाग निकल भागा। जाते – जाते कह गया – “ ये शादी – वादी कुछ नहीं आजी ! सिर्फ होली वाली ठेलुहे की बारात थी।” इस तरह यह होली बहुतों के लिए यादगार हो गई। बौड़म चाचा महीनों तक चाची को ‘मजनू’ की तरह खोजते हुए गाँव के लफंगों को गरियाते रहे। इस तरह सारे घटनाक्रम मे शामिल मेरी यह होली अब तक की सबसे यादगार ‘होली’ हो ली थी।

    मोबाइल – 7007190413

    Keep Reading

    When the temple became the means... and propriety fell silent...!

    जब मंदिर बना ज़रिया… और मौन हुई मर्यादा…!

    3 मिनट की झपकी एक ईमानदार इंसान की इज़्ज़त लगभग छीन लेती

    Many writers are caught in a labyrinth of duties!

    कर्त्तव्यों के चक्रव्यूह में घिरे हैं कई कलमकार!

    When a clever merchant and an innocent king taught a lesson to the forest and the sea...!

    जब चतुर व्यापारी और मासूम राजा ने दी जंगल और समंदर को सीख तब..!

    Raja ka Aaina (The King's Mirror): The King's Mirror is no ordinary mirror.

    राजा का आईना : राजा का आईना कोई साधारण आईना होता नहीं

    Akhilesh Yadav sang the praises of the bicycle in a viral post, highlighting that it is an excellent mode of transport—affordable in price yet immensely useful.

    अखिलेश यादव ने साइकिल की महिमा गाई, पोस्ट वायरल, साइकिल भी है खूब सवारी थोड़े दाम काम दे भारी

    Comments are closed.

    Advertisment
    Google AD
    We Are Here –
    • Facebook
    • Twitter
    • YouTube
    • LinkedIn

    EMAIL SUBSCRIPTIONS

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    About



    ShagunNewsIndia.com is your all in one News website offering the latest happenings in UP.

    Editors: Upendra Rai & Neetu Singh

    Contact us: editshagun@gmail.com

    Facebook X (Twitter) LinkedIn WhatsApp
    Popular Posts

    अयोध्या चंदा चोरी मामले में SIT को मिला अतिरिक्त समय

    July 1, 2026
    CM Yogi launches 'School Chalo Abhiyan' from Saharanpur

    सीएम योगी ने सहारनपुर से किया ‘स्कूल चलो अभियान’ का शुभारंभ

    July 1, 2026
    Panic among traders following the Aliganj fire incident!

    अलीगंज अग्निकांड के बाद व्यापारियों में मचा हड़कंप!

    July 1, 2026
    Ram Mandir offering theft: "Only small fish caught; the big crocodiles are still at large"

    राम मंदिर चढ़ावा चोरी: “सिर्फ छोटी मछलियां पकड़ी गईं, बड़े मगरमच्छ अभी बाकी”

    July 1, 2026
    Akhilesh Yadav's Birthday: A massive turnout of party workers; a 'Green Pledge' fair held!

    अखिलेश यादव का जन्मदिन: कार्यकर्ताओं का जनसैलाब, लगा ‘हरित संकल्प’ का मेला!

    July 1, 2026

    Subscribe Newsletter

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    Privacy Policy | About Us | Contact Us | Terms & Conditions | Disclaimer

    © 2026 ShagunNewsIndia.com | Designed & Developed by Krishna Maurya

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Newsletter
    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading